बॉस की गलती और कर्मचारी की चालाकी: लचीलापन कैसे बना वरदान!
कहते हैं, "जहाँ ना पहुँचे रवि, वहाँ पहुँचे कवि" — और ऑफिस की दुनिया में ये बात कर्मचारियों पर भी लागू होती है! दफ्तरों में अक्सर बॉस और कर्मचारियों के बीच खींचतान चलती रहती है, लेकिन कभी-कभी ऐसी कहानियाँ भी सामने आती हैं, जो हमें हैरान और मुस्कुराने पर मजबूर कर देती हैं। आज की कहानी भी ऐसी ही है, जिसमें बॉस ने सख्ती दिखाई, लेकिन आखिरकार जीत कर्मचारी की समझदारी और ईमानदारी की हुई।
अगर आप भी सरकारी दफ्तरों की 'समय पर जाने-आने' वाली कहानियों से वाक़िफ़ हैं, तो ये वाक़या आपको खूब मज़ा देगा!
सरकारी दफ्तर की गाड़ी और 'लचीला' टाइम
करीब 13-15 साल पहले की बात है, एक सज्जन ने सरकारी एजेंसी में काम शुरू किया। उनका काम सुनने में तो सीधा-सादा लगता था — दर्जनों गाड़ियों की देखभाल, सर्विसिंग, धोना-साफ़ करना, छोटी-मोटी मरम्मत और हर गाड़ी को फिट रखना। सोचिए, एक-एक गाड़ी को अंदर-बाहर पूरी तरह धोना, सामान चेक करना, पानी-तेल देखना – ये सब करने में कम-से-कम 45 मिनट तो लग ही जाते थे।
शुरुआत में दफ्तर का माहौल बड़ा फैला-फैला और लचीला था। कभी गाड़ी जल्दी निपट जाए तो थोड़ा पहले घर चले जाओ, कभी देर हो जाए तो कुछ मिनट ज़्यादा रुक लो — बस, काम पूरा और दफ्तर खुश!
बॉस का नया फरमान: 'चार बजे के बाद काम नहीं!'
लेकिन, एक महीने बाद बॉस साहब को लगा कि ये कर्मचारी 'लचीले समय' का ज़्यादा फ़ायदा उठा रहे हैं। उन्होंने हुक्म सुना दिया — अब से हर हाल में चार बजे के बाद कोई काम नहीं, चाहे कुछ भी हो जाए!
अब हमारे कर्मचारी ने भी सोचा, "ठीक है, जो बॉस कहें वही सही!" सो, साढ़े तीन के बाद अगर उन्हें लगता कि पूरी गाड़ी धोने का वक्त नहीं बचेगा, तो छोटे-मोटे काम करने लगे — जैसे झाड़ू-पोंछा, सामान सजाना, इधर-उधर थोड़ी मदद कर देना। बड़े काम अगले दिन के लिए छोड़ देते।
कुछ हफ्तों बाद बॉस ने देखना शुरू किया कि गाड़ियाँ पहले से कम धोई जा रही हैं, मरम्मत भी कम हो रही है। मीटिंग बुलाई और वजह पूछी। कर्मचारी ने मुस्कराकर वही बात दोहरा दी — "सर, आपने ही तो कहा था, चार बजे के बाद नहीं रुकना! अब मैं आपका आदेश मान रहा हूँ।"
जब बॉस ने मानी अपनी गलती: 'यूनिकॉर्न' बॉस की मिसाल
यहाँ से कहानी पलटती है! बॉस एक पल को सोच में पड़ गए। फिर बोले, "चलो, पहले जैसा ही करो, जब काम पूरा हो जाए, तभी जाओ — थोड़ा जल्दी, थोड़ा देर से, कोई फर्क नहीं।"
बॉस ने अपनी गलती मानी, माफ़ी मांगी और कर्मचारी की समझदारी को सराहा। ये बात सुनकर Reddit पर लोगों ने खूब मज़ेदार कमेंट किए। एक यूज़र ने लिखा — "अरे वाह! ऐसा बॉस तो यूनिकॉर्न (काल्पनिक जीव) जैसा है, जो अपनी गलती मान ले!"
दूसरे ने कहा — "काश, हमारे दफ्तरों में भी ऐसे बॉस होते, जो सुनते भी हैं और मानते भी हैं।" एक मज़ेदार टिप्पणी थी — "लगता है, बॉस तो जादूगर निकले!"
हमारे देश में तो अक्सर बॉस अपनी गलती मानने की बजाय कर्मचारी पर ही गुस्सा निकाल देते हैं, लेकिन इस कहानी में बॉस ने पुरानी सोच बदलकर टीम वर्क की मिसाल पेश की। Reddit पर एक और यूज़र ने लिखा, "कितने लोग अपने बॉस की तारीफ करते हैं? बहुत कम! ऐसे बॉस को गंवाना नहीं चाहिए।"
लचीला समय: कामयाबी का राज़ या सिरदर्द?
लचीले समय (फ्लेक्सिबल ऑवर्स) पर भी कमेंट्स की बौछार थी। किसी ने लिखा, "असली लचीलापन तो तब है, जब कभी सुबह 10 बजे काम बंद कर दो, कभी रात 10 बजे तक खींच लो!"
हमारे यहाँ भी कई सरकारी दफ्तरों में 'फ्लेक्सी-टाइम' की चर्चा होती है, लेकिन अमल कम ही होता है। एक कमेंट ने बड़ा सटीक लिखा — "अगर काम पूरा हो रहा है, तो टाइम की पाबंदी क्यों? हर जगह ये लागू नहीं हो सकता, लेकिन जहां मुमकिन हो, वहाँ भरोसा दिखाना चाहिए।"
कुछ लोगों ने पुराने जमाने के सख्त बॉस का जिक्र किया, तो कुछ ने लिखा कि ऐसे बॉस बहुत कम मिलते हैं, जो नीचे वालों की बात सुन लें — यही तो असली 'टीम लीडर' है!
निष्कर्ष: अच्छे बॉस से बदलता है माहौल
इस कहानी का सबसे बड़ा सबक यही है — जब बॉस अपनी गलती मान ले और कर्मचारियों की बात सुने, तो ऑफिस का माहौल बदल जाता है। कर्मचारी भी ईमानदारी से काम करते हैं और टीम की ताकत बढ़ जाती है।
तो अगली बार जब आपके ऑफिस में कोई 'नया नियम' लागू हो, तो एक बार खुलकर बातचीत ज़रूर करें। क्या पता, आपका बॉस भी अंदर से 'यूनिकॉर्न' निकले!
आपका क्या अनुभव है — क्या कभी आपके बॉस ने गलती मानी है? या आपको भी 'फ्लेक्सिबल ऑवर्स' का कोई मजेदार किस्सा याद है? नीचे कमेंट में जरूर साझा करें; आपकी कहानी भी किसी के चेहरे पर मुस्कान ला सकती है!
मूल रेडिट पोस्ट: No more taking advantage of flexible hours your day ends att 4:00 PM from now on!