विषय पर बढ़ें

फैक्स मशीन का फितूर: जब टेक्नोलॉजी पुराने ज़माने की रुलाई बन गई

लंबी दूरी के फैक्सिंग समस्याओं से परेशान ग्राहक, जो निराशा की सजीव छवि प्रस्तुत करता है।
इस सजीव चित्रण में, हम फैक्सिंग की निराशाजनक दुनिया में उतरते हैं, जहाँ तकनीकी समस्याएँ ग्राहकों को असहाय महसूस कराती हैं। आइए एक ग्राहक के साथ मिलकर लंबी दूरी के फैक्स विफलताओं और इसके बाद की आरोप-प्रत्यारोप की अराजकता को समझते हैं।

आजकल जब हर कोई WhatsApp, ईमेल और क्लाउड स्टोरेज का दीवाना है, सोचिए कोई आपको कहे – “भाई साहब, मेरा फैक्स काम नहीं कर रहा!” तो आप क्या सोचेंगे? लेकिन हकीकत यही है, भारत हो या अमेरिका, दफ्तरों में आज भी कहीं न कहीं वो पुरानी ‘फैक्स मशीन’ धूल फांकती मिल ही जाती है।

एक तकनीकी सहायता इंजीनियर की ताज़ा कहानी सुनिए, जिसने साबित कर दिया कि फैक्स मशीन जितनी पुरानी है, उतनी ही ज़िद्दी भी!

फैक्स मशीन: आधुनिक दफ्तर का पुराना भूत

कहानी शुरू होती है एक ग्राहक की शिकायत से – “हमारा फैक्स long-distance पर न भेज पा रहा है, न रिसीव!” ग्राहक पहले अपने फैक्स वेंडर के पास गया, वेंडर बोला – “फोन कंपनी की गलती है।” अब फोन कंपनी वाले बेचारे इंजीनियर के पास मामला आया, और साहब जी ने शुरू कर दी छानबीन।

स्थानीय फैक्सिंग सही, आउटबाउंड फैक्सिंग भी सही। यहां तक कि इंजीनियर ने खुद ग्राहक के लिए लॉन्ग डिस्टेंस सर्विस प्रोवाइडर से बात की – सब ठीक! फिर भी समस्या जस की तस। ग्राहक की बातों में भी उलझन – कभी कहते भेज नहीं सकते, फिर कहते भेज सकते हैं, फिर कहते शायद रिसीव कर रहे हैं!

तीन घंटे बाद असली पेंच खुला – असल में फैक्स आ रहे थे, लेकिन पहला पेज ठीक, दूसरा पेज बार-बार या अधूरा प्रिंट होता। इंजीनियर को फौरन याद आया – ECM (Error Correction Mode) का retry loop! सेटिंग्स में जाकर ECM डिसेबल किया और सब चंगा हो गया!

फैक्स मशीन: दो तरह के लोग, दो तरह की मुसीबतें

एक मज़ेदार कमेंट में किसी ने लिखा – “दुनिया में दो तरह के यूज़र हैं: एक जिन्हें फैक्स का नाम सुने ज़माना हो गया, और दूसरे जो आज भी उसी पर जिंदा हैं। कुछ बीच में नहीं है!” सोचिए, अब भी भारत के सरकारी दफ्तरों में, मेडिकल और इंश्योरेंस सेक्टर में, फैक्स मशीन वही पुराना ‘विश्वासपात्र’ बनी हुई है। एक यूज़र ने बताया, “हमारे दफ्तर में छह महीने तक लाइन बंद रही, किसी ने नोटिस ही नहीं किया, जब तक किसी को पर्सनल डॉक्युमेंट भेजना नहीं पड़ा।”

एक और साहब का किस्सा – “हमारे यहां ई-फैक्स की सुविधा है, लेकिन कुछ विभाग इतने पुराने ढर्रे पर हैं कि ईमेल प्रिंट करके, स्कैन करके, फिर ERP में अपलोड करते हैं!” यानी टेक्नोलॉजी बदल गई, मशक्कत वही पुरानी।

ग्राहक की गफलत और टेक्निकल टीम की फजीहत

हमारे इंजीनियर भाई के साथ जो हुआ, वह भारत के किसी भी टेक्निकल सपोर्ट बंदे को अपना सा लगेगा – ग्राहक अधूरी-अधूरी जानकारी देता रहा, वेंडर बार-बार फोन कंपनी को दोष देता रहा, और आखिर में जब सेटिंग्स बदलीं तो सब ठीक! न ग्राहक ने धन्यवाद कहा, न माफ़ी मांगी। उल्टा वेंडर ने अफवाह फैलाई – “हमने तो फोन सर्विस के बारे में बहुत शिकायतें सुनी हैं!”

एक यूज़र ने चुटकी ली – “आपने प्रॉब्लम सुलझा दी, इसका मतलब सब आपकी ही गलती थी!” यही तो हमारे यहां भी होता है – जब तक आप जादुई छड़ी नहीं घुमाते, सब आपकी गर्दन पर ही आता है।

फैक्स मशीन: तकनीक या तकलीफ?

फैक्स मशीन आज भी कई जगह ‘जरूरी’ मानी जाती है – खासकर सरकारी दफ्तर, मेडिकल, बीमा कंपनियों में। लेकिन सच्चाई ये है कि अब इसका वक्त पूरा हो चुका है। एक कमेंट में बताया गया कि जापान जैसे देश ने भी 2022 में फैक्स को अलविदा कह दिया। और हमारे यहां? शायद अभी भी कई सरकारी बाबू “फैक्स भेजो!” की जिद पर अड़े हैं।

कुछ ने तो इस तकनीक को “डायल-अप प्रिंटर” से भी बदतर बताया – यानी ना इधर के रहे, ना उधर के। सबसे ज्यादा दिक्कत तब, जब ग्राहक खुद नहीं जानता कि असल समस्या क्या है, और टेक्निकल टीम को हर कोना छानना पड़ता है।

अंत में – फैक्स मशीन का श्राप!

तो भाइयों-बहनों, अगर आपके दफ्तर में अब भी कोई फैक्स मशीन टंगी है, तो समझ लीजिए – वो तकनीक नहीं, सिरदर्द है! टेक्निकल सपोर्ट वालों के लिए ये किसी श्राप से कम नहीं। और ग्राहकों से गुज़ारिश – जब भी कोई तकनीकी समस्या आए, पूरी सच्चाई बताइए, ताकि सबका वक्त और दिमाग दोनों बचे।

क्या आपके साथ भी कभी ऐसी कोई फैक्स मशीन वाली अजीब घटना घटी है? नीचे कमेंट में जरूर बताएं – हो सकता है आपकी कहानी किसी और को मुस्कुराने का मौका दे दे!


मूल रेडिट पोस्ट: Fax is cursed.