पुलिस के कुत्ते बनाम सेवा कुत्ते: होटल की रिसेप्शन पर हुआ दिलचस्प सामना
कभी-कभी होटल के रिसेप्शन पर ऐसे किस्से हो जाते हैं कि सुनकर ही हंसी आ जाए, और सोचने पर मजबूर कर दें कि नियम-कानून किसके लिए हैं। आज हम आपको एक ऐसी ही दिलचस्प घटना सुना रहे हैं, जिसमें पुलिस वाले अपने K9 डॉग्स के साथ होटल पहुंचे और वहां जमकर बहस हो गई – किस बात पर? बस, डॉग्स के लिए फीस देनी चाहिए या नहीं!
पुलिस के कुत्ते: सेवा कुत्ते नहीं, कामकाजी साथी!
जिस तरह हमारे देश में पुलिस या सेना में डॉग स्क्वॉड होती है, वैसे ही विदेशों में भी पुलिस के पास खास तौर से ट्रेन किए गए कुत्ते होते हैं, जिन्हें K9 यूनिट कहा जाता है। ये कुत्ते बम-सूंघने, ड्रग्स ढूंढने, या अपराधी पकड़ने में मदद करते हैं। लेकिन क्या ये 'सेवा कुत्ते' (Service Dog) कहलाते हैं?
दरअसल, सेवा कुत्ते वे होते हैं जो किसी व्यक्ति की विकलांगता के कारण उनकी मदद के लिए खास ट्रेनिंग पाते हैं। मसलन, कोई दृष्टिहीन व्यक्ति अपने गाइड डॉग के साथ चलता है, या कोई मूक-बधिर व्यक्ति को आवाज़ या खतरे का इशारा करने वाला डॉग। वहीं पुलिस के K9 डॉग्स का काम पुलिस के साथ अपराध रोकना होता है, न कि किसी व्यक्ति की विकलांगता में मदद करना।
एक कमेंट करने वाले ने बड़ी खूबसूरत बात कही, "ये कुत्ते असल में पुलिस के सहकर्मी हैं, न कि सेवा कुत्ते। दोनों अफसर बिना डॉग्स के भी कहीं जा सकते थे, उन्हें ऑफिस में छोड़ सकते थे।" यानी, ये कुत्ते 'वर्किंग डॉग्स' हैं, न कि 'सर्विस डॉग्स'।
होटल में हंगामा: पुलिस वालों की जिद और नियम की मजबूरी
कहानी कुछ यूं है – दो पुलिस वाले अपने K9 डॉग्स के साथ होटल पहुंचे, और कुत्तों के लिए बाकायदा विजिटिंग कार्ड भी थे! होटल की नीति थी कि डॉग्स के लिए अलग से फीस देनी होगी। पुलिस वालों ने कहा, "हमारे डॉग्स सेवा कुत्ते हैं, हमें फीस नहीं देनी चाहिए।" रिसेप्शनिस्ट ने बड़े प्यार से समझाया कि कानून के मुताबिक ये सेवा कुत्ते नहीं माने जाते।
इसके बाद तो पुलिस वालों ने खूब गुस्सा दिखाया, चीखना-चिल्लाना शुरू कर दिया। रिसेप्शनिस्ट सोचती रही – "भैया, आप तो खुद कानून के रखवाले हैं, तो क्या आपको कानून नहीं मानना चाहिए?"
एक कमेंट में किसी ने लिखा, "ये कुछ वैसा ही है जैसे कोई पुलिसवाला अपनी गाड़ी को विकलांग पार्किंग में खड़ी कर दे सिर्फ इसलिए कि उसे कॉफी लेनी है!" यानी, नियम सबके लिए बराबर हैं, चाहे आप पुलिस में हों या आम नागरिक।
कमेंट्स की महफिल: तर्क, तंज और हास्य
रेडिट की उस पोस्ट पर कमेंट्स की तो जैसे बाढ़ आ गई! कोई कह रहा था, “अगर पुलिस का कुत्ता असली अफसर है, तो फिर कमरे में डबल ऑक्यूपेंसी का चार्ज लगाओ!” एक और ने चुटकी ली, “अगर किसान अपने गाड़ी में बकरियां लेकर आएं, तो क्या उन्हें भी सर्विस एनिमल मान लिया जाएगा?”
किसी ने लिखा, “कानून लागू करने वाले अक्सर मानते हैं कि कानून सिर्फ दूसरों के लिए है, खुद के लिए नहीं!” और एक अन्य कमेंट में कहा गया, “अगर होटल वालों ने फीस माफ कर दी तो कहीं ये रिश्वत न मानी जाए!”
कुछ लोगों ने यह भी कहा कि कई होटल ऐसे पुलिस डॉग्स की फीस माफ कर देते हैं, ताकि रिव्यू खराब न आए। लेकिन होटल कर्मचारी की दुविधा भी समझिए – नियम तोड़ो तो मैनेजमेंट डांटे, और लागू करो तो मेहमान नाराज़!
भारत में ऐसी स्थिति होती तो...
सोचिए, अगर यही किस्सा किसी दिल्ली या मुंबई के होटल में होता! पुलिस वाले आते, अपने डॉग स्क्वॉड के साथ, और रिसेप्शनिस्ट से बहस करने लगते – "हम तो पुलिस हैं, हमें छूट चाहिए!" रिसेप्शनिस्ट बेचारा सोचता, "अब इनसे उलझूं या नौकरी बचाऊं!"
भारत में वैसे भी 'सिफारिश' और 'खास मेहमान' का कल्चर खूब चलता है। कभी रेलवे में टीटी से बहस, कभी होटल में 'मेरे मामा पुलिस में हैं' टाइप डायलॉग! लेकिन नियम तो नियम है, और हर किसी को मानना चाहिए, चाहे वो आम आदमी हो या वर्दी वाला।
निष्कर्ष: कानून सबके लिए बराबर है!
इस कहानी से यही सीख मिलती है कि चाहे आप पुलिस में हों या आम नागरिक, नियम तो सब पर लागू होते हैं। सेवा कुत्ता और कामकाजी कुत्ते में फर्क है – एक विकलांगता की मदद के लिए, दूसरा पुलिस के काम के लिए।
तो अगली बार जब आप कहीं होटल में जाएं, या कोई 'खास' मेहमान बने, तो याद रखिए – नियम-कानून सबके लिए हैं। और होटल वालों को भी सलाम, जो रोज़ ऐसे किस्सों का सामना करते हैं – कभी पुलिस वाले, कभी सेलिब्रिटी, कभी आम आदमी!
आपका क्या अनुभव है? क्या आपने कभी किसी होटल या ऑफिस में ऐसी 'खास सिफारिश' वाली बहस देखी है? कमेंट में जरूर बताएं, और अगर पोस्ट पसंद आई हो तो शेयर करें – ताकि सबको पता चले, "कुत्ता चाहे पुलिस वाला हो या पालतू, फीस तो देनी ही पड़ेगी!"
मूल रेडिट पोस्ट: Police dogs are NOT service dogs