प्रोम के टिकट के लिए मेरिट्स का खेल: जब शिक्षकों ने प्रशासन को कर दिया चित
स्कूल की पढ़ाई तो सबको याद रहती है, लेकिन आखिरी साल के जश्न, दोस्ती के किस्से और प्रोम पार्टी जैसी यादें उम्रभर साथ रहती हैं। वैसे तो प्रोम का चलन भारत में उतना आम नहीं, पर विदेशों में इसकी धूम है। अब सोचिए, अगर प्रोम में जाने के लिए आपको 'अच्छे कामों' के मेरिट्स इकट्ठा करने हों, और वो भी मास्टरजी के मनमाफिक — तो क्या होगा? चलिए, आज एक मजेदार विदेशी किस्से से जानते हैं कि कैसे बच्चों, शिक्षकों और स्कूल प्रशासन के बीच मेरिट्स का खेल बना हंसी का कारण!
प्रोम का चक्कर: जब टिकट के लिए मेरिट्स की शर्त लग गई
यूके के एक स्कूल में, 11वीं के छात्रों के लिए प्रोम पार्टी का आयोजन हुआ। प्रोम यानी एक शानदार पार्टी, जहां आखिरी साल के छात्र खूब सजधज कर आते हैं, नाचते-गाते हैं और स्कूल की यादों को सेलिब्रेट करते हैं। अब इस बार स्कूल प्रशासन ने नया नियम बना दिया — प्रोम के टिकट के लिए बच्चों को 'मेरिट्स' कमाने होंगे! यानी अच्छे व्यवहार, मेहनत या टीचर्स की तारीफ पाने पर नंबर मिलेंगे, और एक तय संख्या तक मेरिट्स जुटाने पर ही टिकट मिलेगा।
यह सुनकर छात्रों में हलचल मचना तो तय था — अरे भई, किसी की तबीयत खराब हो गई, किसी को कम मेरिट्स मिले, तो वो अपने दोस्तों के साथ प्रोम में नहीं जा पाएगा? कई छात्रों ने विरोध किया, लेकिन स्कूल प्रशासन अपनी जिद पर अड़ा रहा।
शिक्षकों की चालाकी: "तुम्हारे बाल अच्छे हैं, एक मेरिट ले लो!"
अब यहां असली मजा आया। स्कूल के मास्टर साहबों को भी ये नियम कुछ रास नहीं आया। उन्होंने खामोशी से अपनी ही तरकीब निकाल ली — बच्चों को अजीब-अजीब वजहों से मेरिट्स देने लगे! किसी को बाल अच्छे लगने पर मेरिट, किसी को दोस्त को हाई-फाइव देने पर, तो किसी को बस दरवाजा सही तरीके से खोलने पर ही मेरिट्स मिल गया। जैसे भारत में कभी-कभी मास्टरजी 'तुम्हारी पेन अच्छी है, एक नंबर मिल गया' कह देते हैं — वैसे ही!
एक छात्रा की मां ने बताया, "मेरी बेटी को तो एक ही दिन में तीन-चार मेरिट्स मिल गए — बस यूं ही!" दूसरे बच्चों के साथ भी यही हुआ — मेरिट्स की बारिश हो गई, जैसे होली में रंग उड़ाए जाते हैं। आखिर में सभी बच्चों के पास प्रोम के लिए पर्याप्त मेरिट्स आ ही गए।
कम्युनिटी का जलवा: पाठकों ने क्या कहा?
इस कहानी पर Reddit पर खूब चर्चा हुई। एक पाठक ने तो सलाह दी, "अगर स्कूल इतनी शर्तें लगा रहा है, तो बच्चे खुद ही अपनी पार्टी ऑर्गनाइज़ कर लें, स्कूल को किनारे कर दो!" एक और मज़ेदार टिप्पणी थी — "हमें तो जंगल में ही पार्टी कर लेनी थी, कोई खर्चा नहीं, बस मस्ती करो!"
किसी ने भारतीय स्कूलों की तरह कहा — "कभी-कभी तो नियम बस दिखावे के लिए होते हैं, असल में तो सबको मौका मिलना चाहिए जश्न का!" एक और ने चुटकी ली — "लगता है मास्टरजी भी प्रशासन से नाराज हैं, वो चुपचाप बच्चों की मदद कर रहे हैं।"
कुछ ने ये भी बताया कि प्रोम जैसी पार्टियां असल में छात्रों का मनोबल और व्यवहार सुधारने के लिए शुरू की गई थीं। पुराने जमाने में स्कूल के आखिरी दिनों में बच्चों की शरारतें बढ़ जाती थीं, तो स्कूलों ने जश्न का तरीका निकाल लिया — जिससे पढ़ाई का अंत भी खूबसूरत यादों के साथ हो।
हमारी सोच: आनंद भी, सीख भी
यह कहानी हमें यही सिखाती है कि कभी-कभी नियम तोड़ने से नहीं, बल्कि उसे अलग नजरिए से निभाने से भी बहुत कुछ बदल सकता है। मास्टरजी ने जहां नियम का पालन किया, वहीं बच्चों के मन का भी ख्याल रखा। आखिरकार, स्कूल का मकसद भी यही है — बच्चों को खुशी मिले, और यादें बनें।
हमारे देश में भी जब-जब कोई नया नियम आता है, लोग उसमें अपनी जुगाड़ ढूंढ ही लेते हैं। चाहे ऑफिस की देर से आने की पॉलिसी हो, या स्कूल का यूनिफॉर्म — हम भारतीयों की सबसे बड़ी ताकत है, हर नियम में मस्ती का रास्ता खोज लेना!
निष्कर्ष: आपकी राय क्या है?
तो दोस्तों, अगर आपके स्कूल में भी कभी ऐसे अजीब नियम बनें, तो आप क्या करेंगे? क्या मास्टरजी की तरह सबको खुश कर देंगे, या फिर कोई नई जुगाड़ निकालेंगे? नीचे कमेंट में जरूर बताइए कि आपके स्कूल के मजेदार किस्से क्या रहे! और हां, जिंदगी में कभी-कभी नियमों से ज्यादा जरूरी है — खुश रहना और दूसरों को भी मुस्कुराने का मौका देना।
आखिर में, "बिलकुल सही कहा किसी ने — जिन्दगी जीने के लिए मेरिट्स नहीं, मुस्कान चाहिए!"
मूल रेडिट पोस्ट: Need merits to go to prom? Let me help.