प्रिंटर की समस्या या जुगाड़ का जादू: जब इनवॉइस प्रिंटर के केबल ने सबको चौंका दिया
ऑफिस में जब प्रिंटर काम करना बंद कर दे, तो समझिए पूरे स्टाफ की सांसें अटक जाती हैं। खासकर जब बात इनवॉइस प्रिंटिंग की हो, तो बॉस की आँखें और चौड़ी, और अकाउंट्स वाले का पारा और चढ़ जाता है। लेकिन क्या हो अगर प्रिंटर की असली दिक्कत सबसे आसान और मजेदार वजह से हो? आज की कहानी ऐसी ही एक तकनीकी सहायता (टेक सपोर्ट) के किस्से पर आधारित है, जिसने न सिर्फ तकनीकी ज्ञान, बल्कि हमारे देसी अंदाज में 'जुगाड़' और 'जिद' का भी मजा दिखाया।
ग्राहक की हड़बड़ाहट और टेक सपोर्ट की धैर्य परीक्षा
कहानी पुराने ज़माने के कंप्यूटरों की है, जब न तो वाई-फाई का जमाना था, न ही हर जगह हाई-स्पीड इंटरनेट। प्रिंटर सीधे केबल से कंप्यूटर से जुड़े रहते थे—वो भी मोटे-मोटे पैरेलल केबल! एक ग्राहक ने फोन घुमाया: "इनवॉइस प्रिंटर काम नहीं कर रहा, तुरंत सही करिए, बहुत जरूरी है!"
अब टेक सपोर्ट वाले भैया (जिन्हें हम सब टीटीएस वाले कहते हैं) भी पुराने जमाने के थे—न कोई रिमोट डेस्कटॉप, न वीडियो कॉल। बस फोन पर बात करना, और ग्राहक की आँखों से देखना—मतलब ग्राहक को हर स्टेप पर गाइड करना! ग्राहक बार-बार बोल रहा, "प्रिंटर उसी कंप्यूटर से जुड़ा है!" लेकिन सिस्टम में प्रिंटर दिख ही नहीं रहा था। धीरे-धीरे ग्राहक की आवाज में चिड़चिड़ाहट आ गई—"अभी चाहिए भाई, जल्दी करो।"
केबल का सच: जुगाड़ या जिद?
टेक सपोर्ट ने बड़े प्यार से कहा, "भाईसाहब, एक बार केबल को फॉलो करिए न, हो सकता है कहीं ढीली हो या खराब हो गई हो।" ग्राहक—"अरे! मैंने देख लिया, वो कंप्यूटर से ही जुड़ा है!" टेक सपोर्ट—"फिर भी, मेरी खुशी के लिए देख लीजिए।"
अब असली ट्विस्ट आया—ग्राहक ने केबल ट्रेस की, तो पता चला केबल तो मेज पर यूंही पड़ी है, कहीं जुड़ी ही नहीं। टेक सपोर्ट वाले भी सोच में पड़ गए—"भाईसाहब, अभी तो आपने बार-बार बोला कि केबल जुड़ी है!" ग्राहक बोले, "अरे, वही कंप्यूटर है जिससे जुड़ती थी, लेकिन वो कंप्यूटर तो रिपेयर में भेज दिया है, इसलिए केबल यूंही रखी है!"
यह सुनकर टेक सपोर्ट का मन तो 'चेहरे पर हाथ मारने' (facepalm) का हो गया। टिप्पणीकारों ने भी खूब मजे लिए—एक ने तो मजाक में कहा, "हर महीने एक ग्राहक पर हथौड़ा चलाने की छूट मिलनी चाहिए!" और एक अन्य ने इसे 'लुज़र अटिट्यूड रीएडजस्टमेंट टूल' (LART) तक कह डाला—यानि जब ग्राहक न माने तो सीधे क्लू-बाई-फोर (लकड़ी की पट्टी) से समझाना चाहिए।
देसी दफ्तरों में ऐसे ही होते हैं किस्से
अगर आप कभी सरकारी दफ्तर या किसी बड़े शो-रूम के सपोर्ट डेस्क पर गए हों, तो ऐसे किस्से आम हैं। हमारे यहाँ अक्सर समस्या बड़ी नहीं, बल्कि हमारी गलतफहमी, जल्दबाजी और "मैंने तो देख लिया" वाली जिद होती है। एक टिप्पणीकार ने तो भारतीय अंदाज़ में मजेदार उदाहरण दिया—"भाभी ने फोन किया, गाड़ी गायब है! मैं कहूं गाड़ी तो ड्राइववे में ही होती है। भाभी कहें—यहाँ नहीं है! आखिर में समझ आया, मैंने गाड़ी आज गली के मोड़ पर पार्क कर दी थी।"
हमारे देश में भी लोग अक्सर पूछते हैं—"कूलर चल नहीं रहा!" पूछो—"प्लग में लगाया है?" जवाब—"अरे! हाँ तो।" फिर पता चलता है, प्लग ही ढीला है या स्विच ऑफ है। ऐसे में टेक सपोर्ट का धैर्य और जुगाड़ ही असली हथियार बनता है।
टेक सपोर्ट की लाचारी और ग्राहक की तानाशाही
टेक सपोर्ट वालों की ज़िंदगी भी किसी युद्ध से कम नहीं। ग्राहक का गुस्सा, जल्दबाजी, और 'मुझे अभी चाहिए' का दबाव—इन सब में भी उन्हें शांत रहना पड़ता है। खुद टेक्निकल एक्सपर्ट (पोस्ट के लेखक) ने लिखा, "हमारे बॉस कभी नहीं चाहते थे कि ग्राहक हमें परेशान करें। एक बार तो एक ग्राहक को साफ कह दिया गया—अगर बदतमीजी की, तो सर्विस बंद!"
कुछ टिप्पणीकारों ने तो ये भी लिखा—"कभी-कभी तो ऐसा लगता है जैसे वायरलेस केबल से डाटा ट्रांसफर हो जाएगा!" और एक ने तो मजाक में कहा—"प्रिंटर को भी कोई खून की बलि चाहिए थी शायद!"
सीख और हँसी—दोनों का मसाला
इस किस्से से हमें दो बातें सिखने को मिलती हैं—एक, कभी भी तकनीकी समस्या में सबसे पहले केबल, प्लग और कनेक्शन देख लें। दूसरा, धैर्य और जुगाड़ से बड़ी से बड़ी समस्या हल हो जाती है। टेक सपोर्ट वालों का धैर्य और उनकी समस्या सुलझाने की कला काबिल-ए-तारीफ है।
तो अगली बार जब आपका प्रिंटर या कोई मशीन काम न करे, एक बार केबल जरूर देख लें—क्या पता आपकी भी कहानी किसी टेक सपोर्ट ग्रुप में वायरल हो जाए!
आपके साथ भी ऐसा कोई मजेदार टेक्निकल किस्सा हुआ है? कमेंट में जरूर बताएं और अपने दोस्तों के साथ ये कहानी शेयर करें। क्योंकि असली टेक्नोलॉजी तो वहीं है जहाँ थोड़ी सी जिद, थोड़ा सा जुगाड़ और ढेर सारी मुस्कान हो!
मूल रेडिट पोस्ट: The (disconnected) invoice printer won't print.