प्रिंटर की आफत और एक ईमानदार इंजीनियर की कहानी
ऑफिस में काम करने वाले ज्यादातर लोग इस बात से सहमत होंगे कि अगर किसी चीज़ से सबसे ज्यादा सिरदर्द होता है तो वो है – प्रिंटर! जी हाँ, वही मशीन जो कभी भी, कहीं भी, किसी भी समय धोखा दे सकती है। आज की कहानी भी एक ऐसे ही प्रिंटर की है, जिसने एक बेचारे टेक सपोर्ट इंजीनियर की नींद हराम कर दी। लेकिन अंत में जो हुआ, वो आपको हँसने पर मजबूर कर देगा।
ऑफिस के माहौल में जहां चाय, गपशप और बॉस की डांट आम बातें हैं, वहीं प्रिंटर भी स्टेटस सिंबल बन चुका था। खुद का प्रिंटर होना यानी ऑफिस में अलग ही ‘रुतबा’। लेकिन भाई, ये रुतबा कई बार महंगा भी पड़ सकता है!
प्रिंटर – ऑफिस की सबसे बड़ी आफत
आप सोच रहे होंगे कि प्रिंटर में क्या खास बात है? लेकिन सच मानिए, टेक सपोर्ट वालों के लिए प्रिंटर किसी ‘कबूतर का खत’ नहीं बल्कि ‘पंडोरा का डिब्बा’ है। कहानी के नायक, एक टेक्निकल सपोर्ट इंजीनियर, के ऑफिस में हर कोई चाहता था कि उनके पास खुद का प्रिंटर हो। कंपनी में ‘बड़े-बड़े’ प्रिंटर होने के बावजूद लोग छोटे, सस्ते लेज़र प्रिंटर को अपनी मेज़ की शान मानते थे।
जैसे ही पुराने प्रिंटर रिटायर हुए, उनकी जगह नए मॉडल आ गए। देखने में तो नए प्रिंटर पुराने जैसे ही थे, लेकिन उनकी करतूतें बिल्कुल नई थीं! अब ये प्रिंटर कभी-कभी प्रिंट आउट के नाम पर ‘कच्चे कोड’ उगल देते – यानि जो छपना चाहिए था, उसकी जगह अजीब-अजीब अक्षर और चिन्ह छप जाते। ये बिल्कुल वैसा था जैसे आप चाय मांगें और वेटर आपको खाली कप पकड़ा दे।
तकनीकी जुगाड़ और बढ़ती सिरदर्दी
कहानी के इंजीनियर ने हर मुमकिन तरीका अपनाया – Windows के नए-पुराने ड्राइवर, चर्चित PCL ड्राइवर, यहाँ तक कि Linux कंप्यूटर से भी कोशिश कर डाली। लेकिन प्रिंटर की जिद्द, ‘ना बाबा ना, मैं तो ऐसे ही चलूंगा।’ टेक सपोर्ट वालों से बात करने पर वही पुराने सुझाव – Windows फिर से डालो, अपडेट करो, कंप्यूटर बदलो। लेकिन जब Linux पर भी वही समस्या आई, तब पता चला कि असली दोष प्रिंटर के फर्मवेयर में है, ना कि कंप्यूटर या ड्राइवर में।
यहाँ एक कमेंट करने वाले ने लिखा, “प्रिंटर और पासवर्ड – मेरी ज़िंदगी की सबसे बड़ी मुसीबत।” एक और मज़ेदार जवाब आया, “इन दोनों आफतों की जड़ है – यूज़र!” भई, जब तक यूज़र हैं, तब तक परेशानियाँ हैं!
असली सच – ईमानदारी की जीत
अब आया असली ट्विस्ट – कंपनी की ओर से एक इंजीनियर आया, जिसे देखकर लगा कि शायद कोई जादू की छड़ी घुमाएगा और सब सही हो जाएगा। लेकिन जनाब ने तो प्रिंटर खोलकर उसका पूरा मदरबोर्ड ही बदल दिया! पाँचों प्रिंटरों में सीधा नए मदरबोर्ड डाल दिए – जैसे पुराने ज़माने में टीवी के खराब पार्ट्स बदल दिए जाते थे।
इंजीनियर से पूछा गया कि भैया, ये फर्मवेयर अपडेट क्यों नहीं हुआ? उसने बड़ी ईमानदारी से कह दिया – “भाई साहब, इन प्रिंटरों में सिक्योरिटी अपडेट की वजह से फर्मवेयर टूल काम ही नहीं करता। ये समस्या कंपनी को पहले से ही पता थी। बस, बोर्ड बदलना ही इलाज है।”
यह सुनकर हमारे टेक सपोर्ट हीरो को मानो राहत की सांस मिली, लेकिन प्रिंटरों के प्रति प्यार और भी बढ़ गया – जैसे बॉलीवुड फिल्मों में नायक-खलनायक की दोस्ती हो जाती है!
प्रिंटरों की दुनिया – सबका दर्द एक सा
रेडिट कम्युनिटी में कई लोगों ने अपनी भड़ास निकाली। एक साहब बोले – “मैं 250 प्रिंटर संभालता हूँ, भगवान कसम, इनसे ज़्यादा नफ़रत किसी चीज़ से नहीं!” किसी ने कहा – “प्रिंटर की जिम्मेदारी जिसपर डाल दो, समझ लो उसकी शामत आ गई!”
एक और कमेंट में बताया गया कि पुराने ज़माने में प्रिंटर असल में मिनी-कंप्यूटर होते थे – अलग मदरबोर्ड, हार्ड डिस्क, PSU, और यहां तक कि Linux ऑपरेटिंग सिस्टम! एक साहब ने तो अपने पुराने प्रिंटर में Minix इंस्टॉल पाया, लेकिन शुरुआती Linux ज्ञान की वजह से उसे हैक नहीं कर सके।
कुल मिलाकर, हर टेक सपोर्ट वाले की एक ही कहानी – प्रिंटर से परेशान, यूज़र से परेशान, लेकिन फिर भी काम करना है। जैसे हमारे देश में बिजली चली जाए तो सब अपने-अपने जुगाड़ पर उतर आते हैं, वैसे ही प्रिंटर खराब होते ही पूरे ऑफिस में हलचल मच जाती है।
निष्कर्ष – आपकी प्रिंटर की कहानी क्या है?
अगर आप भी ऑफिस में प्रिंटरों की आफत झेल चुके हैं, या टेक सपोर्ट वालों की मेहनत को समझते हैं, तो नीचे कमेंट में अपनी कहानी जरूर साझा करें। कौन जाने, आपकी कहानी भी किसी की मुस्कुराहट का कारण बन जाए! याद रखिए, प्रिंटर और किस्मत – दोनों पर भरोसा करने वाले को कभी-कभी बहुत बड़ा झटका लग सकता है।
तो अगली बार जब आपका प्रिंटर रूठ जाए, तो टेक सपोर्ट वाले को धन्यवाद जरूर कहिए – वो भी इंसान है, मशीन नहीं!
मूल रेडिट पोस्ट: At least someone was honest at the end