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पड़ोसी की शोरगुल पर घर बैठे बदला – ओज़ी औसबोर्न स्टाइल में पड़ोस युद्ध!

1990 में एक अपार्टमेंट में युवा वयस्क, नीचे पड़ोसियों द्वारा तेज़ संगीत से परेशान।
यह फ़ोटोरियलिस्टिक छवि 1990 में अपार्टमेंट जीवन की कठिनाइयों को दर्शाती है, जब एक युवा वयस्क रात भर शोर मचाते पड़ोसियों से जूझ रहा है।

क्या कभी आपके आस-पास ऐसे पड़ोसी रहे हैं जिनकी वजह से आपकी नींद हराम हो गई हो? वो जो रात दिन बिना वजह शोर मचाते रहें, और जब भी आप समझाने जाएँ, तो उल्टा आपको ही ताना दें? अगर हाँ, तो आज की ये कहानी आपको न सिर्फ हँसाएगी, बल्कि शायद आपको भी कोई नया आइडिया दे दे, अगली बार शोरगुल वाले पड़ोसियों से निपटने के लिए!

अपार्टमेंट की जिंदगी में शांति मिलना वैसे ही लॉटरी जीतने जैसा है। 1990 में, जब इस कहानी के नायक (Reddit यूज़र hexuss1) पहली बार अपने फ्लैट में रहने आए, तो कुछ महीने बाद ही नीचे एक ‘झमेलेबाज़’ पड़ोसी परिवार आ धमका। और फिर शुरू हुआ – ऊँची आवाज़ में बेहूदा संगीत, वो भी चौबीसों घंटे!

शांति की उम्मीद और पड़ोसी की हेकड़ी

शुरुआत में हमारे नायक ने पूरी तहज़ीब के साथ नीचे वालों से दो बार गुहार लगाई – “भैया, आवाज़ थोड़ी कम कर लीजिए।” मगर, जवाब में हेकड़ी ही मिली। पुलिस भी बुला ली, पर जैसे ही पुलिस गई, शोरगुल और बढ़ गया। हद तो तब हो गई जब वो लोग डंडा लेकर छत (यानी ऊपर वाले का फर्श) पीटने लगे – कुछ तो मानो कह रहे हों, “अब तो और सुनाओ!”

यहीं से शुरू होता है असली ‘पेटी रिवेंज’ – यानी छोटी सी, मगर दिलचस्प बदले की कहानी।

“जैसे को तैसा”: ओज़ी औसबोर्न का कमाल

जैसे हर भारतीय मोहल्ले में पड़ोसियों की एक टोली बन जाती है, यहाँ भी ऊपर वाले फ्लैट्स के लोग एकजुट हो गए। सबका दिमाग चकरा चुका था। सबको पहले ही बता दिया गया कि अब अगली बार इन ‘झमेलेबाज़ों’ की छुट्टी पक्की।

पता चला कि नीचले वाले दोपहर में चुपचाप सोते हैं। बस, यही मौका था! सुबह 10 बजे दो विशाल स्पीकर फर्श पर उल्टे रख दिए, और लगा दी ओज़ी औसबोर्न की कैसेट – ‘Bark at the Moon’। रिपीट मोड में संगीत ऐसा बजा कि नीचे वालों की नींद हराम हो गई। छत पर डंडों की आवाज़, गालियाँ, दरवाज़ा पीटना – सब होने लगा, पर ऊपर वाले तो जैसे कान में तेल डाल बैठे थे।

1 बजे तक संगीत चला, फिर स्पीकर बंद कर दिए। अगली बार जैसे ही नीचे वाले ने अपना शोर चालू किया, ऊपर से ‘ओज़ी’ फिर से बजने लगा। अबकी बार नीचे वालों को समझ आ गया – उनकी ही भाषा में जवाब मिला है! आवाज़ तुरंत धीमी हो गई।

एक कमेंट में किसी ने लिखा, “कमाल है, दूसरों को शोर बर्दाश्त नहीं, पर खुद जब सुनाए तो गज़ब!” यही हमारे मोहल्लों में भी होता है – दूसरों का गाना हमेशा बेसुरा लगता है, अपना तो ‘आत्मा का संगीत’ होता है!

“पेटी रिवेंज” के किस्से: हर कोई बना जुगाड़ू

रेडिट पर इस किस्से के नीचे तमाम लोगों ने अपने-अपने अनुभव साझा किए। किसी ने बताया कि उसने पड़ोसी की बत्तियाँ ही काट दी थीं ताकि पार्टी बंद हो जाए, तो किसी ने ‘1812 ओवर्चर’ वाले तोप-गोलों वाले क्लासिकल म्यूजिक से पड़ोसी की नींद उड़ा दी। एक मज़ेदार कमेंट आया – “अगर 1990 में ‘बेबी शार्क’ वाला गाना होता, तो वही बजाता – एक ही बार में सबकी अकल ठिकाने आ जाती!”

एक और यूज़र ने लिखा, “मैंने अपने पड़ोसी को सबक सिखाने के लिए स्पीकर दीवार से सटा दिए और टैंक वाले वीडियो गेम की आवाज़ इतनी तेज़ चलाई कि उनकी दीवार से फोटो गिरने लगी!” सोचिए, हमारे यहाँ अगर कोई ऐसा करे तो मोहल्ले की सारी आंटियाँ एक साथ पुलिस बुला लें।

कई लोगों ने ये भी कहा कि अब तो टेक्नोलॉजी इतनी आगे है – बस मोबाइल से सबवूफर जोड़कर, 5-9 हर्ट्ज़ की ऐसी आवाज़ चला दो कि दीवारें खुद बोल उठें, “बस कर, भाई!”

हमारी संस्कृति में “बदला”: कभी मीठा, कभी मसालेदार

भारतीय समाज में भी ‘जैसे को तैसा’ का जुगाड़ हर किसी के पास है। कभी ऊपर वाले पड़ोसी की झाड़ू से जवाब, तो कभी नीचे वाले की सिलबट्टे की आवाज़। यहाँ भी एकता में बल है – जब मोहल्ले वाले एक हो जाएं, तो सबसे बड़ा ‘शोरगुल’ भी दो दिन में शांत हो जाता है।

रेडिट पर इस पोस्ट को पढ़ने के बाद यही लगा – चाहे अमेरिका हो या भारत, हर जगह पड़ोसी की नोच-खसोट एक जैसी है। फर्क बस इतना है कि वहाँ ‘ओज़ी औसबोर्न’ बजता है, यहाँ ‘ढोलकी’ और ‘भजन’!

निष्कर्ष: आप क्या करते?

तो भैया, अगली बार अगर आपका कोई पड़ोसी चैन की नींद हराम करे, तो शांति से समझाइए, नहीं माने तो अपनी ‘ओज़ी औसबोर्न’ या ‘लता मंगेशकर’ चालू कर दीजिए! वैसे, ध्यान रहे – बदला हमेशा मीठा ही होना चाहिए, वरना मोहल्ले में आपकी ही बुराई होने लगेगी।

आपके पास भी कोई ऐसा मज़ेदार अनुभव है? नीचे कमेंट में ज़रूर बताइए – कौन सा गाना, कौन सा जुगाड़ आपके यहाँ चला? और हाँ, याद रखिए – पड़ोसी से दुश्मनी हो, तो भी हँसी-मज़ाक में ही हल निकालिए, क्योंकि “पड़ोसी बदलते नहीं, बस आदतें बदलती हैं!”


मूल रेडिट पोस्ट: Apartment living at its worst