पड़ोसी की बदतमीज़ी का बांसूनी इलाज: जब बांस और ब्लूटूथ बना हथियार
हमारे पड़ोस में अकसर झगड़े-फसाद की कहानियाँ सुनने को मिलती हैं, लेकिन जब बात खुद की शांति और सुकून की हो, तो इंसान क्या-क्या नहीं कर जाता! आज की कहानी में एक ऐसे पड़ोसी की दास्तान है, जिसने न केवल अपनी समझदारी से मसला हल किया, बल्कि पूरे मोहल्ले को हँसी का मौका भी दे दिया।
जब पड़ोसी बना सिरदर्द
पाँच साल पहले हमारे छोटे-से मोहल्ले में एक नए साहब अपने बीस साल छोटी गर्लफ्रेंड के साथ आए। मोहल्ले का माहौल तो वैसे भी परिवार जैसा था, लेकिन इनके आने के बाद जैसे कलह का नया दौर शुरू हो गया। उनके खतरनाक कुत्ते बार-बार बाहर भागते, मोहल्ले वालों को घर में घुसने पर मजबूर कर देते। दो बार तो उन्होंने हमारे अपने पालतू कुत्तों पर हमला भी कर दिया! शुक्र है, हमारे कुत्ते बच गए।
इन साहब से बात करना मतलब सिर दीवार से मारना; कभी अपनी गलती मानना तो इन्होंने सीखा ही नहीं। ऊपर से जब एक बिचौलिया उनकी नाव घर के बाहर खड़ी होने की शिकायत कर बैठा, तो इन्होने पूरे मोहल्ले के खिलाफ शिकायती अभियान छेड़ दिया—छोटी-छोटी बातों पर रिपोर्टिंग, जैसे बच्चों ने गलती से बॉल उछाल दी या किसी ने गाड़ी थोड़ी देर गलत जगह खड़ी कर दी।
कुत्तों की करतूत और पड़ोसी की जिद
अब जनाब ने डाशहाउंड नस्ल के कुत्ते पालने शुरू कर दिए। मज़े की बात, हमारे लेखक के पास भी एक डाशहाउंड है, लेकिन पूरी ट्रेनिंग के साथ! उनके कुत्ते बाहर एकदम शांत रहते हैं, लेकिन हमारे 'महान' पड़ोसी के कुत्ते तो जैसे पूरे मोहल्ले को अपने भौंकने से गुंजाए रखते। साहब जब काम पर जाते या बाहर खाना खाने निकलते, अपने कुत्तों को बाहर छोड़ जाते—पूरा दिन लगातार भौंकना! तीन घंटे की रिकॉर्डिंग तक बन चुकी थी, लेकिन पशु नियंत्रण विभाग ने हमेशा वही जवाब दिया—"पानी-छांव है तो दिक्कत क्या है?"
कई बार समझाने की कोशिश की, लेकिन जवाब वही—"जाओ, अपना काम करो!" (या फिर इससे भी अशोभनीय शब्दों में)। मोहल्ले वालों की नींद हराम, लेकिन कोई हल नहीं।
चालाकी से लिया बदला: बांसू-ब्लूटूथ का कमाल
अब यहाँ से शुरू होती है असली 'पेट्टी रिवेंज' यानी छोटी लेकिन मज़ेदार बदले की दास्तान!
हमारे लेखक ने पड़ोसी के स्विमिंग पूल के पास अपनी पुरानी क्रेप मर्टल (Crepe Myrtle) की झाड़ी को और घना कर दिया। यह पेड़ उनके कुत्तों, मुर्गियों और पक्षियों के लिए छाँव भी है। मज़े की बात, पड़ोसी हमेशा इस पेड़ की शिकायत करते रहते थे, लेकिन पेड़ तो पहले से मौजूद था, हटाने का सवाल ही नहीं।
लेकिन इतना ही नहीं, लेखक ने उसी जगह 'क्लम्पिंग बांस' (Clumping Bamboo) लगा दिया—जो फैले तो नहीं, लेकिन दीवार जैसा पर्दा बना दे! और सबसे मज़ेदार हिस्सा—उसी पेड़ की डाल पर लगा दिया ब्लूटूथ स्पीकर, जिसमें हल्की-सी घंटी जैसी आवाज़ लगातार बजती रहती। अब पड़ोसी का पूल तीन हफ्ते से वीरान पड़ा है, क्योंकि वो घंटी उनके सिर में घुस गई है!
अब साहब चाहें तो पुलिस बुला लें, लेकिन खुद उनकी फेंसिंग का परमिट नहीं है। अगर शिकायत करते हैं, तो फौरन रिपोर्ट हो जाएगी। मोहल्ले के लोग बोले, "वाह! क्या दिमाग लगाया।"
कमेंट्स से मिली और भी मज़ेदार राय
रेडिट पर इस कहानी पर लोगों ने खूब मज़े लिए। किसी ने कहा, "बांस और ब्लूटूथ—ये तो जैसे 'सरसों का साग और मक्खन' वाली जोड़ी है!" एक और ने सुझाया, "अगर कभी और मज़ा लेना हो, तो पूल की तरफ पुदीना या नींबू घास भी उगा दो, खुशबू से ही पड़ोसी परेशान हो जाएगा।" एक-दो ने तो मज़ाक में कहा, "बांस तो पीढ़ियों तक बदला लेने का हथियार है, लेकिन भैया, चलो तुम्हारा बांस तो संभला हुआ है!"
कुछ ने अपने अनुभव भी साझा किए—जैसे किसी ने पड़ोसी के कुत्तों की आवाज़ रिकॉर्ड करके उन्हीं पर बजा दी, तब जाकर अक्ल आई। किसी ने कहा, "हमारे यहाँ तो ऐसे लोगों की वजह से मोहल्ला पंचायत में मसला पहुँच जाता है।" वहीं कई लोगों ने इस बात का समर्थन किया कि जानवरों को परेशान करने के बजाय, उनकी देखरेख न करने वाले मालिकों को सबक सिखाना चाहिए।
आखिर में – पड़ोसी हों तो ऐसे!
कहानी से एक बात तो साफ है—जब बात अपने हक और चैन की आए, तो थोड़ी सी चालाकी, हिम्मत और हास्य का तड़का हर मसले को हल्का-फुल्का बना सकता है। "बांसूनी बदला" न सिर्फ मज़ेदार था, बल्कि पूरे मोहल्ले के लिए प्रेरणा भी बन गया।
तो अगली बार अगर आपके पड़ोसी आपको परेशान करें, तो सीधा झगड़ा मत कीजिए, थोड़ा सोचे-समझे, कुछ नया आज़माइए—शायद आपका बदला भी मोहल्ले में मिसाल बन जाए!
आपकी क्या राय है? क्या आपने भी कभी पड़ोसी से ऐसे मज़ेदार बदले लिए हैं? अपने अनुभव नीचे कमेंट में जरूर साझा करें!
मूल रेडिट पोस्ट: Bamboo for you.