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पीएचडी वाले 'केविन' की आफ़िस में दास्तान: डिग्री बड़ी या काम की समझ?

क्लिनिकल रिसर्च सेटिंग में भ्रमित दिख रहे, पीएचडी धारक बुजुर्ग आदमी की एनीमे चित्रण।
इस मजेदार एनीमे शैली के चित्रण में, हम केविन से मिलते हैं, जो हमारे रहस्यमय पूर्व सहकर्मी हैं और महामारी विज्ञान में पीएचडी धारक हैं। आइए, मैं आपके साथ उनके साथ बिताए अजीब अनुभव साझा करता हूँ!

क्या आपने कभी ऐसे किसी सहकर्मी के साथ काम किया है जिसकी डिग्री सुनकर तो आप दंग रह जाएँ, लेकिन असल काम में उसका हाल 'नानी याद आ जाए' जैसा हो? आज की कहानी है एक ऐसे ही 'केविन' साहब की, जिनके पास शानदार पीएचडी थी, लेकिन कंप्यूटर के 'रेड एक्स' का भी पता नहीं था!

केविन साहब: डिग्री तो महाराजा, लेकिन कंप्यूटर पर फिसड्डी

केविन लगभग सत्तर साल के थे, डिग्री थी एपिडेमियोलॉजी में पीएचडी। सुनने में तो लगता था – "वाह! क्या विद्वान आदमी है।" मगर आफ़िस में उनकी हालत ऐसी थी जैसे कोई आलू 'बिरयानी' में गलती से पड़ गया हो। उन्हें क्लीनिकल रिसर्च मॉनिटर की नौकरी मिली थी, लेकिन असलियत में वे कंप्यूटर और टेक्नोलॉजी के मामले में बिल्कुल 'अनाड़ी' थे।

मीटिंग्स में केविन साहब बार-बार बोलते थे – "माफ़ कीजिए, मैं ज़ोर से बोल रहा हूँ क्योंकि मेरा कंप्यूटर बहुत दूर है।" अब भाई, कंपनी ने हेडफोन, मॉनिटर सब कुछ दिया था, फिर भी कंप्यूटर को ऐसे रखते जैसे कोई डायनासोर हो! और जब स्क्रीन शेयर करने की बारी आई, तो उनके ब्राउज़र में इतनी सारी टैब्स खुली थीं कि देखकर लगता था – "ये आदमी रिसर्च कर रहा है या कुंभ का मेला खोल रखा है?"

सबसे मज़ेदार तो तब हुआ जब उनसे कहा गया – "भाई साहब, ये टैब्स बंद करो।" अब केविन साहब को समझ ही नहीं आया कि टैब कैसे बंद करें! उन्हें समझाना पड़ा – "ऊपर दाहिने कोने में जो लाल रंग का क्रॉस है, उस पर क्लिक करो।" सोचिए, इतने साल की पढ़ाई और 'रेड एक्स' का पता नहीं!

ट्रेनिंग का तमाशा और ऑफिस का सरदर्द

कंपनी में नई ट्रेनिंग हो रही थी, केविन और उनके साथी दोनों को एक साथ ट्रेन किया जा रहा था। केविन साहब हर बात पर सवाल पूछते, कभी-कभी उसी मुद्दे पर जो अभी-अभी बताया गया था। ट्रेनिंग में वे खुद ही शिकायत करते – "कितना टाइम लग रहा है!" लेकिन जब स्क्रीन शेयर की बारी आई, तो इतने टैब्स खुले कि ट्रेनर भी सर पकड़ ले।

एक बार फिर से 'रेड एक्स' कहाँ है, ये बताना पड़ा। अब ऑफिस में हर किसी को लगने लगा कि पीएचडी की डिग्री से काम नहीं चलता, असली हुनर ज़रूरी है। एक कमेंट करने वाले ने लिखा – "हमारे यहाँ भी ऐसे कई प्रोफेसर केविन हैं, जिनके लिए 'स्टेप बाय स्टेप' गाइड बनानी पड़ती है, वरना वो कहीं से कहीं पहुँच जाते हैं!"

उम्र, तकनीक और 'सीखने की चाह': बड़ों का क्या हाल?

अब सवाल उठता है – क्या ये उम्र का असर है या सीखने की इच्छा की कमी? कई पाठकों ने इस पर चर्चा की। एक ने लिखा – "बड़े लोगों को कंप्यूटर सीखना मुश्किल लगता है, लेकिन मेरे दादाजी ने 90 की उम्र तक C++ प्रोग्रामिंग सीखी थी!" वहीं, किसी ने यह भी कहा – "शायद केविन को डिमेंशिया या भूलने की बीमारी हो सकती है।"

कई बार देखा गया है कि हमारे देश में भी बुजुर्ग लोग स्मार्टफोन या कंप्यूटर से दूर भागते हैं। कोई कहता है – "अब इस उम्र में क्या नया सीखें?" लेकिन तकनीक तो अब जीवन का हिस्सा बन चुकी है। एक पाठक ने तो मज़ाक में लिखा – "हमारे यहाँ पीएचडी का मतलब है – 'पकड़ो, यहाँ दबाओ!'"

डिग्री से नहीं, सीखने की लगन से बनती है पहचान

सबसे दिलचस्प बात यह है कि कई बूढ़े लोग तकनीक में माहिर भी होते हैं। एक पाठक ने बताया – "मेरे दादाजी इंजीनियर थे, कंप्यूटर के आने से पहले के जमाने के। लेकिन उन्होंने अपनी मेहनत से सब कुछ सीखा, खुद को अपडेट रखा।" वहीं, कुछ लोग सिर्फ इसलिए पीछे रह जाते हैं क्योंकि वे सीखना ही नहीं चाहते।

हमारे दफ्तरों में भी अक्सर ऐसे 'केविन' मिल जाते हैं। एक सहकर्मी को कॉफी बनानी सिखाने के लिए फोटो गाइड देनी पड़ी, फिर भी वो गड़बड़ कर बैठा। एक महिला ने अपने पति को दुकान का नक्शा बनाकर दिया, फिर भी तीन चीज़ें लाने में फोन करके पूछना पड़ा – "ब्रेड कहाँ है?"

निष्कर्ष: डिग्री है, पर समझ भी होनी चाहिए!

तो साथियों, केविन की कहानी हमें यही सिखाती है कि डिग्री, उम्र या अनुभव अपनी जगह हैं – लेकिन बदलते जमाने के साथ खुद को अपडेट रखना और सीखते रहना असली हुनर है। वरना ऑफिस में लोग मुहावरा बना देंगे – "डिग्री तो केविन जैसी है, लेकिन काम...!"

क्या आपके ऑफिस में भी कोई 'केविन' है? या आपने कभी ऐसे किसी इंसान के साथ काम किया है? कमेंट में अपने अनुभव ज़रूर लिखें – हो सकता है आपकी कहानी अगली पोस्ट में शामिल हो जाए!


मूल रेडिट पोस्ट: Kevin might have a PhD, but he can't actually do anything