नौकरी की तलाश में अनदेखी का बदला: 'Seen' पर छोड़ी गई दोस्ती का जवाब
नौकरी की तलाश में भटकना किसी भी भारतीय के लिए नया नहीं है, खासकर जब आप विदेश में बसने जाते हैं। लेकिन सोचिए, जब आपको सबसे ज्यादा किसी की सलाह की जरूरत हो, और वही इंसान आपको "सीन" पर छोड़ दे? और फिर वही इंसान, वक्त बदलते ही आपसे मदद की उम्मीद लगाए बैठे! आज की हमारी कहानी कुछ ऐसी ही है — इमोशन, मज़ा और सीख से भरपूर।
कहानी की नायिका (आइए इन्हें "सोनल" कहें) अपने पति के साथ यूरोप के एक देश में बसने जाती हैं। पति का तो आईटी सेक्टर में काम मिल जाता है, लेकिन सोनल जिस फील्ड में हैं, उसमें स्थानीय भाषा आना अनिवार्य है। भारतीय जुगाड़ और मेहनत का परिचय देते हुए, सोनल पहले ही भाषा सीखना शुरू कर देती हैं। अब नया देश, नए नियम—और नौकरी ढूंढना तो जैसे लॉटरी जितने जैसा!
सोशल मीडिया के इस दौर में, सोनल ने भी LinkedIn का सहारा लिया। अपने देश की एक महिला "सुषमा" (जिसे हम Susan कहेंगे) से कनेक्ट हुईं, जो खुद इसी राह से गुज़र चुकी थीं। सोनल ने बड़ी उम्मीद से सलाह मांगी, लेकिन सुषमा ने बस इतना कह दिया, "स्थानीय भाषा सीखो, और कुछ मदद नहीं कर सकती।" चलो, मान लिया, सबकी अपनी-अपनी प्राथमिकताएं होती हैं। सोनल ने फिर भी विनम्रता से कॉफी पर मिलने या कॉल करने का प्रस्ताव दिया, लेकिन जवाब आया, "अगले दो महीने बहुत बिज़ी हूँ।"
सोनल ने दो महीने बाद भी कुछ सवाल किए—डिग्री, सर्टिफिकेशन, CV आदि के बारे में—but जवाब? बस 'सीन' पर छोड़ देना! चार महीने तक सोनल ने शुभकामनाएँ भी भेजीं, लेकिन सुषमा की तरफ से सन्नाटा।
यहाँ कई पाठकों को सोनल की जिद्द पर ऐतराज हो सकता है। एक Reddit यूज़र ने भी लिखा कि कई बार लोग वाकई बिज़ी होते हैं, लेकिन इतना भी नहीं कि नए साल की शुभकामनाओं का जवाब न दे सकें! वहीं, एक और कमेंट में कहा गया, "अगर कोई आपकी मदद नहीं करना चाहता, तो आपको भी उनके लिए कुछ करने की मजबूरी नहीं।"
अब ज़रा किस्मत का खेल देखिए—साल भर बाद सोनल ने स्थानीय भाषा में महारथ हासिल की, इंटरव्यू में सबको इम्प्रेस कर लिया और शानदार कंपनी में नौकरी पा ली। कहानी में ट्विस्ट तब आया, जब वही सुषमा बजट कट के कारण अपनी नौकरी गंवा बैठी। और इत्तेफाक से, सोनल की कंपनी में उसी प्रोफाइल के लिए भर्ती चल रही थी!
LinkedIn पर अब सुषमा ने सोनल को मैसेज किया—"आपकी कंपनी की सोच और मिशन बहुत अच्छा है, कृपया मुझे रेफर कर दें।" सोनल चाहती तो सुषमा को भी 'सीन' पर छोड़ सकती थीं, पर भारतीय सभ्यता और अपनी प्रोफेशनलिज़्म दिखाते हुए सिर्फ इतना लिखा, "धन्यवाद सुषमा, आप हमारी वेबसाइट पर आवेदन करें। हम सभी एप्लिकेशन की समीक्षा कर रहे हैं, आपको जल्द ही सूचना मिलेगी। शुभकामनाएँ।"
इस मौके पर एक Reddit यूज़र का कमेंट बड़ा दिलचस्प था, "अगर कोई आपकी मदद नहीं करना चाहता, तो आपको भी उनके लिए कुछ करने की ज़रूरत नहीं। अच्छा किया, कम से कम जवाब तो दिया!" वहीं किसी ने मज़ाकिया अंदाज़ में कहा, "अगर मेरी जगह होते, तो कहता—मुझे रेफर करने में झिझक है, क्योंकि आपने कभी जवाब देने की आदत नहीं दिखाई!" यह बात भारतीय कार्य-संस्कृति में भी सटीक बैठती है—यहाँ भी हर किसी से रिश्ते निभाना आसान नहीं होता, और छोटे-छोटे इशारे भी गहरे असर छोड़ जाते हैं।
इस कहानी में सोनल की प्रोफेशनलिज़्म काबिल-ए-तारीफ़ रही। एक कमेंट में लिखा गया, "मदद करना कोई मजबूरी नहीं, लेकिन विनम्रता से मना करना भी एक कला है।" और सच कहें, तो यही बात हमारे समाज में भी लागू होती है—"बोली का मीठा होना, और व्यवहार में विनम्रता, दोनों मुफ्त में मिलती हैं, लेकिन असर हमेशा रहता है।"
यह भी सच है कि LinkedIn जैसी नेटवर्किंग साइट्स का असली मकसद है—लोगों को जोड़ना और एक-दूसरे की मदद करना। हमारे यहाँ कहावत है, "नेकी कर, दरिया में डाल"—अगर आप किसी की मदद कर सकते हैं, तो जरूर करें, क्योंकि वक्त कभी भी पलट सकता है। सोनल ने भी बाद में दूसरों की मदद की, और कुछ लोग तो दोस्त भी बन गए।
कहानी का सबसे बड़ा सबक? दुनिया गोल है! आज जो 'सीन' पर छोड़ता है, कल उसी के दरवाज़े पर खड़ा हो सकता है। और अंत में, सोनल का जवाब—न सख्ती, न बदला, बस प्रोफेशनल व्यवहार—यही असली जीत है।
दोस्तों, आप क्या सोचते हैं? क्या सोनल ने सही किया? या आपको लगता है कि सुषमा को एक और मौका देना चाहिए था? अपने विचार नीचे कमेंट में जरूर साझा करें। और हाँ, अगर आप भी कभी ऐसी "सीन" वाली स्थिति में फंस गए हों, तो उसकी कहानी भी सुनाएँ—शायद अगली पोस्ट आपकी हो!
मूल रेडिट पोस्ट: Leave me on read when I need job search advice? I can't help you with your job search either