दो स्क्रीन, एक उलझन: टेक्निकल सपोर्ट की झंझट भरी कहानी
आजकल ऑफिस में दो स्क्रीन यानी ड्यूल मॉनिटर का क्रेज़ वैसे ही बढ़ता जा रहा है जैसे शादी-ब्याह में दो-दो मिठाइयाँ परोसने का। लेकिन जरा सोचिए, अगर आपकी मेहनत और ग्राहक की फरमाइशें आपस में टकरा जाएँ तो क्या हाल होता है? आज मैं आपको ऐसी ही एक मजेदार और थोड़ी सिरदर्द देने वाली टेक्निकल सपोर्ट की कहानी सुनाने जा रहा हूँ, जिसमें दो कंप्यूटर, दो स्क्रीन और कई उलझनें शामिल हैं। इस कहानी में सीख भी छुपी है, मजा भी, और वो सबकुछ जो एक भारतीय ऑफिस में अक्सर देखने-सुनने को मिलता है।
ग्राहक की पहली फरमाइश: कंप्यूटर A को बने दो स्क्रीन वाला राजा
किसी एमएसपी (Managed Service Provider) कंपनी में काम करते हुए, एक ग्राहक—मान लीजिए नाम है ‘जीन’—ने फरमाइश की कि उनके ऑफिस के कंप्यूटर A में ड्यूल स्क्रीन सेटअप लगवाना है। मतलब, अब एक स्क्रीन से काम नहीं चलने वाला, दिल मांगे दो! हमारी टीम ने भी झटपट एक नया मॉनिटर, ड्यूल मॉनिटर आर्म और एक घंटे की लेबर का कोटेशन बनाकर भेज दिया। जीन ने कोटेशन स्वीकार किया, तारीख तय हुई, और मैं तय दिन पर काम करने पहुंच गया, जब जीन ऑफिस में नहीं थीं।
एक अजनबी की सलाह, और गेम पलट गया!
काम लगभग पूरा हो चुका था, सामान समेटने ही वाला था कि अचानक कोई ऑफिसकर्मी कमरे में घुस आया। बोला—"अरे वाह, दूसरा स्क्रीन आ गया! लेकिन असल में ये स्क्रीन तो कंप्यूटर B पर लगना था।"
मैंने उसे ऑर्डर की डिटेल्स दिखाईं कि जीन ने कंप्यूटर A के लिए ही रिक्वेस्ट की थी। उस भाई साहब ने बड़े इत्मीनान से कहा—"जीन और मैं डिस्कस कर रहे थे, अब हमें लगा कंप्यूटर B पर ज्यादा फायदा होगा। जीन से गलती से A बोल गया होगा। आप प्लीज़ B पर लगा दो।"
जीन उस दिन ऑफिस में नहीं थीं, तो मैंने सोचा, चलो भाई, ग्राहक का ही भला सोचते हैं। फिर से सब उल्टा-पुल्टा करके कंप्यूटर B पर ड्यूल स्क्रीन सेटअप लगा दिया। काम में डेढ़ घंटा लग गया, लेकिन चार्ज सिर्फ एक घंटे का किया, जैसे तय हुआ था।
अगले दिन की आफत: जब ग्राहक का ईमेल आया
अगले ही दिन जीन लौटती हैं और सीधा ईमेल ठोक देती हैं—"अरे, कंप्यूटर B पर दो स्क्रीन क्यों? मैंने तो कंप्यूटर A बोला था!"
बॉस ने मुझसे पूछा, मैंने भी सच्चाई बताई कि किसी अनजान कर्मचारी ने बोला था, नाम-पता नहीं लिया (यही मेरी सबसे बड़ी गलती थी)।
हमने जीन को बताया कि किसी और की सलाह पर काम हुआ। जीन गुस्सा हो गईं—"मैंने तो साफ-साफ कंप्यूटर A का ऑर्डर दिया था, बिना पैसे लिए सही करो!"
कंपनी की इज्जत और ग्राहक की खुशी के लिए मैंने फिर से 90 मिनट तक मेहनत की, सब उल्टा करके ड्यूल स्क्रीन वापस कंप्यूटर A पर लगा दी। बॉस थोड़ा खफा हुए, लेकिन समझ गए कि ऐसी मस्ती कभी-कभी हो जाती है।
ऑफिस की राजनीति और 'गैरेज इन, गैरेज आउट' का सबक
इधर मामला शांत ही हुआ था कि कुछ दिन बाद जीन का फिर ईमेल आया—"मुझे पता चला है कि रोजर ने आपको बताया था कि स्क्रीन B पर लगनी चाहिए थी। अब जब आप जानते थे, तो फिर A पर क्यों लगाया? अब फिर से B पर लगाइए, और पैसे में कोई चार्ज नहीं लगेगा!"
बॉस ने भी आखिरकार भारतीय जुगाड़ दिखाया—दो ऑप्शन थमा दिए: 1. हाँ जी, हम फ्री में बदल देंगे, लेकिन पिछली बार जो 90 मिनट फालतू लगे, उसके पैसे पहले दो। 2. हमने जैसा लिखित में ऑर्डर आया था, वैसा ही किया। अब बदलवाना है तो नया ऑर्डर डालिए, 90 मिनट का चार्ज लगेगा।
जीन ने ‘तीसरा रास्ता’ चुना—चुप्पी साध ली! मामला वहीं खत्म।
एक कमेंट में किसी ने बड़ी गहरी बात कही—"सर्विस रिक्वेस्ट हमेशा लिखित में लो, बिना दस्तावेज़ के किसी की बात पर भरोसा मत करो। नहीं तो ऐसी ही गड़बड़ियाँ होंगी।"
दूसरे कमेंट में एक दिलचस्प जुमला पढ़ा—"गैरेज इन, गैरेज आउट" यानी जैसा डाटा दोगे, वैसा ही रिज़ल्ट मिलेगा। ये बात ऑर्डर, कोडिंग, यहाँ तक कि जीवन में भी लागू होती है।
एक और पाठक ने चुटकी ली—"अगर काम में बदलाव चाहिए, तो पहले लिखित में लो—खून से भी चलेगा!"
इसीलिए, दोस्त, ऑफिस की राजनीति में जो दिख रहा है, वही सच नहीं होता। और सर्विस इंडस्ट्री में तो हर चीज़ का सबूत रखना जरूरी है, वरना बेवजह की मेहनत और ग्राहक की नाराजगी दोनों झेलने पड़ सकते हैं।
सीख: सबूत है तो फिक्र नहीं!
इस कहानी से क्या सीखें?
भले ही ऑफिस हो या घर, कोई भी फरमाइश लिखित में लेना ही सबसे बेहतर है। ऑफिस में 'कहानी बदलने वाले' बहुत मिलेंगे, लेकिन सबूत का पलड़ा हमेशा भारी रहता है। अगली बार कोई बोले—"भैया, ऐसे नहीं, वैसे कर दो", तो हंसते हुए कहिए—"जी, बस एक ईमेल या व्हाट्सएप भेज दीजिए!"
अंत में...
मित्रों, क्या आपके साथ भी कभी ऐसी गफलत हुई है, जब किसी की बात मानकर फंस गए हों? या कोई ग्राहक/बॉस पल में पलट गया हो? कमेंट में बताइए, आपकी कहानी सुनने का हमें भी इंतजार रहेगा।
और हाँ, अगली बार जब भी ऑफिस में कोई नया काम हो, "पेपर पर दस्तखत" या "ईमेल पर हाँ" लेना मत भूलिए—वरना ये दो स्क्रीन वाली उलझन आपके साथ भी हो सकती है!
मूल रेडिट पोस्ट: A tale of 2 screens