दो नावों में पाँव रखने वाले बॉस को मिला करारा जवाब: एक मज़ेदार ऑफिस कहानी
ऑफिस की दुनिया में ऐसे बॉस मिलना आम बात है जिनका व्यवहार समझ से परे होता है। कभी-कभी तो लगता है कि बॉस बनने के लिए मेहरबानी या रिश्तेदारी ही काफी है, योग्यता की ज़रूरत ही नहीं! आज हम आपको एक ऐसे ही मशीनिस्ट की कहानी सुनाते हैं, जिसने अपने 'दत्तक' बॉस को उसकी ही चाल में फँसा दिया।
रिश्तेदारी का ‘वरदान’: जब बॉस की योग्यता सिर्फ ‘रिश्तेदार’ होना हो
कहानी के नायक हैं एक मशीनिस्ट, जिन्होंने छह साल तक एक फैक्ट्री में काम किया। उनके बॉस – चलिए उन्हें 'BH' कहते हैं – कंपनी के मालिक के साले थे। यानी, बॉस बनने की सबसे बड़ी योग्यता! अनुभव से कम, रिश्तेदारी से ज़्यादा।
अब BH के तानाशाही किस्से तो कई हैं, पर इस कहानी की शुरुआत उस वार्षिक परफॉर्मेंस रिव्यू से होती है, जिसमें नायक को उनके काम की खूब तारीफ मिली। बिक्री विभाग के एक कर्मचारी ने तो कहा कि उनके आने के बाद कंपनी के मुनाफे में 400% की बढ़ोतरी हुई है। लेकिन जैसे ही बॉस को लगा कि यह तारीफ ज़्यादा हो रही है, उन्होंने तुरंत बात काट दी और सबको चुप करा दिया।
तुगलकी फरमान और बदले की शुरुआत
रिव्यू के बाद BH ने एक अलग कागज़ निकालकर, मशीनिस्ट पर इल्ज़ामों की झड़ी लगा दी – "तुम बहुत बातें करते हो, बहुत बार वॉशरूम जाते हो, डाइट बदलो ताकि ऑफिस के वॉशरूम का कम इस्तेमाल करो!"
यह सुनकर मशीनिस्ट हक्के-बक्के रह गए, क्योंकि उनकी तबीयत और सर्जरी का इतिहास बॉस को पता था। झगड़ा इतना बढ़ा कि मशीनिस्ट ने गुस्से में बोल दिया, "अपना इन्क्रीमेंट रखो, बस अब मुझसे बात मत करना!"
बॉस ने धमकी दी – "अगर वापस नहीं आए तो नौकरी से निकाल दूँगा!" मजबूरी में मशीनिस्ट लौटे, लेकिन अंदर ही अंदर बदला लेने की ठान ली।
जब बॉस के फरमान उलटे पड़ गए
अब असली मज़ा शुरू हुआ: मशीनिस्ट ने ऑफिस में सबसे बातचीत बिल्कुल बंद कर दी। हर वक्त ईयरबड्स लगाकर Audible और Youtube सुनते, किसी से बात नहीं, हँसी-मज़ाक नहीं। जब कोई पूछता, तो सीधा जवाब – "ऑफिस में काम के अलावा कुछ नहीं।"
वॉशरूम के लिए डॉक्टर की चिट्ठी भी ले आए – "यह कर्मचारी जब चाहे वॉशरूम जा सकता है।" HR को जब यह चिट्ठी दिखी, तो वो भी हैरान थी – "ऐसी कोई रोक-टोक है? अरे, वॉशरूम जाना तो मानव अधिकार है!"
फिर क्या था, BH का गुस्सा अब और बढ़ गया। अब उन्हें मशीनिस्ट का ध्यान खींचने के लिए खुद चलकर आना पड़ता, क्योंकि ईयरबड्स में वे सुनते ही नहीं। मशीनिस्ट को तो मज़ा आने लगा – जितना बॉस परेशान, उतना उनका बदला मीठा!
कमेंट्स की दुनिया: विदेशी ऑफिस, देसी सोच
रेडिट पर इस कहानी ने धूम मचा दी। एक यूज़र ने लिखा, "अब मुझे BH के बारे में सबकुछ पता चल गया – ‘अब कंपनी का रिव्यू खत्म, अब तुम्हारे बारे में मेरे नोट्स!’"
दूसरे ने मज़ाकिया अंदाज़ में सुझाव दिया – "अगर बॉस को वॉशरूम से इतनी दिक्कत है, तो डायपर पहनकर ऑफिस आ जाना चाहिए था, फिर देखना HR क्या करता!"
किसी ने भारत-जर्मनी वेतन और छुट्टी के फर्क की बात छेड़ दी – "यहाँ कंपनियाँ छुट्टियाँ और बीमारी का समय एक ही बकेट में डाल देती हैं, वहाँ जर्मनी में अलग-अलग मिलता है।"
दूसरे ने लिखा – "मालिक के रिश्तेदार को मैनेजर बना देना, और फिर उम्मीद करना कि सब बढ़िया चलेगा – यह तो अपने यहाँ भी आम बात है!"
निष्कर्ष: दो नावों में पाँव, गड़बड़ पक्का!
मशीनिस्ट ने पूरे एक साल तक बॉस के तुगलकी आदेशों का पालन किया, न किसी से बात, न हँसी-मज़ाक – सिर्फ काम और ईयरबड्स। जब बॉस ने शिकायत की – "लोग पूछते हैं कि तुम किसी से बात क्यों नहीं करते!" तो मशीनिस्ट ने मुस्कराते हुए कहा – "आपका ऑर्डर है, सर! और देखिए, काम भी ज्यादा हो रहा है।"
यानी, ना बॉस खुश, ना ऑफिस का माहौल। मशीनिस्ट ने आखिरकार सातवें साल पर इस्तीफा दे दिया, और जाते-जाते बॉस को सिखा गए – 'आप दो नावों में पाँव नहीं रख सकते!'
आपकी राय?
क्या आपके साथ भी कभी ऐसा बॉस रहा है? या किसी दोस्त की ऐसी कहानी सुनी है? अपने अनुभव कमेंट में ज़रूर लिखिए! कौन जाने, अगली कहानी आपकी ही हो!
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मूल रेडिट पोस्ट: You can't have it both ways.