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दादी अम्मा की ‘प्यारी’ बदला नीति: एक अंगूठी, एक झूठ और 30 साल की चुप्पी

एनीमे-शैली में दादी एंजी का चित्रण, जो अपनी चतुर छोटी प्रतिशोध कहानियों के लिए जानी जाती हैं।
यह आकर्षक एनीमे-प्रेरित चित्र दादी एंजी की आत्मा को दर्शाता है, जो एक प्रिय मातृसत्ता हैं, जिनके मजेदार छोटे प्रतिशोध ने परिवार में हंसी और खुशी का संचार किया। हम उनके जीवन और विरासत को याद करते हुए, उनके साझा किए गए हास्य और ज्ञान का जश्न मनाते हैं।

बचपन में हम सभी को कभी न कभी ऐसा उपहार मिला है जो हमारे मन के बिल्कुल अनुकूल नहीं था। कभी कोई रंग-बिरंगी स्वेटर, कभी भारी-भरकम टिफिन, तो कभी ऐसी अंगूठी जो खुद दादी की याद दिला दे! पर क्या आपने कभी सोचा है कि आपके एक छोटे से झूठ का असर आपके रिश्तों पर कितना गहरा पड़ सकता है? आज की कहानी है दादी अम्मा की, जिन्होंने अपनी पोती के एक मासूम झूठ का ऐसा प्यारा बदला लिया, जिसकी गूंज 30 साल बाद तक सुनाई दी।

दादी का ख़ज़ाना और पोती की उम्मीदें

कहानी है कैलिफ़ोर्निया की, लेकिन इसकी मिठास हर हिंदुस्तानी परिवार के लिए जानी-पहचानी है। दादी एंजी, उम्र 106 साल, मस्तमौला और बेमिसाल याददाश्त वाली महिला थीं। उनकी सबसे बड़ी पोती – खुद को गहनों का दीवाना मानने वाली – हमेशा यही मानती रही कि दादी की शादी की अंगूठी उसी को मिलेगी। आखिरकार, दादी के पास वही एकमात्र कीमती गहना था जो पूरे परिवार में हर किसी के लिए खास था।

पर किस्मत ने पलटी मारी। शादी की अंगूठी छोटी बहन को मिली, और बड़ी बहन के हाथ आया – दादी का दिया हुआ एक ‘झिलमिलाता’ कैरोसेल रिंग, जो अपनी बनावट में बिल्कुल किसी मेले के झूले या सर्कस के तंबू जैसा था। और पोती के हिसाब से, “बिल्कुल बेहूदा और हाथ में भारी।”

एक झूठ, और दादी का शातिर जवाब

अब भारतीय परिवारों में ये आम बात है कि दादी-नानी के गहनों को लेकर बहनें-कज़िन्स में मीठी तकरार चलती रहती है। यहाँ भी ऐसा ही हुआ। जब दादी ने अपनी पोती को वो अजीब सी अंगूठी दी, तो उसकी जगह उसने एक जोड़ी बालियाँ चुन लीं – और दादी से झूठ बोल दिया कि ज्वैलर ने साफ़ मना कर दिया, अंगूठी छोटी हो ही नहीं सकती।

लेकिन दादी तो दादी थीं! अगली बार मिलते ही खुद वही अंगूठी पहन आईं और हँसते हुए बोलीं, “मेरे हाथ में तो बिल्कुल फिट है!” अब पोती की बोलती तो बंद, पर सच कबूला नहीं। इसी एक झूठ के बाद, दादी ने अगले 30 सालों तक उसे कोई गहना नहीं दिया – न नाराज़गी दिखाई, न शिकवा किया। बाकी सब कुछ वैसे ही – पढ़ाई में मदद, प्यार-दुलार, सब बराबर। पर गहनों का खज़ाना वहीं बंद!

परिवार, उम्मीदें और कम्युनिटी की राय

हमारे यहाँ भी जब कोई दादी-नानी अपनी चीज़ें बाँटती हैं, तो परिवार में छोटी-मोटी नाराज़गी, हँसी-मज़ाक, कयासबाज़ी आम है। Reddit पर भी लोगों ने यही महसूस किया। एक यूज़र ने तो बड़े प्यार से लिखा – “दादी ने शायद बदला नहीं लिया, बस भरोसा टूट गया था।” किसी ने कहा – “दादी ने वही गहना उसी को दिया, जो उसकी कद्र कर सके।” एक और कमेंट में हँसी-ठिठोली करते हुए लिखा गया – “तुम्हें वही अंगूठी वापस मिल गई, यही सबसे मज़ेदार बदला है!”

कुछ लोगों का मानना था कि दादी ने बहन को अंगूठी इसीलिए दी क्योंकि उसे यकीन था कि वो उसे संभालेगी, बेच नहीं देगी। एक और यूज़र ने तो सलाह दी – “शायद अंगूठी के पीछे कोई गहरी कहानी हो, कभी उसकी असली कीमत या डिज़ाइन पता करो।”

रिश्तों में ईमानदारी और वो ‘कैरोसेल’ रिंग

हमारे समाज में बुज़ुर्गों की भावनाओं की कद्र और उपहारों की अहमियत बहुत गहरी है। कभी-कभी हम छोटी-छोटी बातों में सच्चाई से बच जाते हैं – सोचते हैं कि सामने वाले को बुरा न लगे। पर रिश्तों में ईमानदारी सबसे बड़ा गहना है। दादी ने अपनी पोती को कभी ताना नहीं मारा, न नाराज़ हुईं, बस अपने तरीके से सिखा दिया – “जिसे जो पसंद न हो, उसे झूठ बोलकर नहीं, प्यार से कह देना चाहिए।”

कहानी की नायिका को भी बरसों बाद एहसास हुआ कि दादी का ये बदला कितना मीठा था। अब वो कैरोसेल रिंग उसी के पास है – पहनती नहीं, पर यादों में उसकी चमक सबसे खास है।

आपकी भी कोई ऐसी कहानी है?

इस कहानी में एक बात सबसे सुंदर है – परिवार में प्यार, बराबरी, और वो छोटी-सी शरारत जो रिश्तों को और भी गहरा बना देती है। क्या आपके साथ भी कभी दादी-नानी की कोई ऐसी ‘प्यारी बदला नीति’ चली हो? या आपने कभी उपहार को लेकर कोई छोटी सी चाल चली हो? अपनी कहानी कमेंट में ज़रूर शेयर करें – क्योंकि हर परिवार की यादों का खज़ाना सबसे अनमोल होता है!

अंत में, दादी एंजी की तरह हर बुज़ुर्ग हमें यही सिखाता है – “रिश्तों में सच्चाई सबसे बड़ी विरासत है, और कभी-कभी एक अंगूठी की कहानी, पूरी ज़िंदगी का सबक बन जाती है!”


मूल रेडिट पोस्ट: Grandma Angie's Petty Revenge