दादाजी, स्नैक्स और अटारी: बचपन की शरारत और मीठा बदला
बचपन के वो दिन, जब जेब में कुछ पैसे हों, मोहल्ले की गलियों में घूमना हो और दादी के हाथ का खाना मिले – ऐसे लम्हे हर किसी के दिल के बहुत करीब होते हैं। पर सोचिए, अगर इसी बचपन की मासूमियत में कोई आपसे आपकी सबसे प्यारी चीज़ – यानी आपकी स्नैक्स वाली पर्स ही छीन ले! क्या करेंगे आप? आज की कहानी ऐसी ही है, जिसमें एक छह साल के बच्चे की मासूमियत, उसके शरारती भाई-बहनों की चालाकी और दादाजी के अनोखे बदले की झलक है।
गाँव की गलियों में बचपन की आज़ादी
ये कहानी है एक छोटे से गाँव की, जहाँ छुट्टियों में जाना वैसे ही किसी मेले में जाने जैसा लगता था। गाँव के चौराहे पर छोटी-छोटी दुकानें, ठंडी बोतलें, चिप्स-नमकीन और चॉकलेट्स की भरमार। हमारे लेखक (u/night_noche) की माँ उन्हें लेकर अपने मायके गई थीं, जहाँ मामा की शादी थी। आज के बच्चों की तरह मोबाइल या टीवी की आदत नहीं, Gen X के बच्चों को तो यही सिखाया जाता था – "बड़ों को मत परेशान करो, बाहर खेलो, घूमो, देखो।"
माताजी और पिताजी तो पैसे देने में कंजूसी करते थे, लेकिन दोनों दादाजी दिल खोलकर जेब में नोट डाल देते – "ले बेटा, जा, मज़े कर।" ऐसे में कौन बच्चा नहीं उड़ेगा! तीस दिन का गाँव प्रवास, हर दिन नई खोज, नई मिठाइयाँ, और जेब में अपने खुद के पैसे!
शरारती भाई-बहनों की चाल और मासूमियत की हार
हर परिवार में एक-दो ऐसे भाई-बहन या कज़िन जरूर होते हैं जो मासूम बच्चों की भावनाओं से खेलना अपना अधिकार समझते हैं। लेखक के दो भाई-बहन – एक दो साल बड़े और दूसरा पाँच साल बड़ा – उन पर मज़ाक करने का कोई मौका नहीं छोड़ते थे। लेखक खुद बताते हैं कि वे "इम्पैथ" टाइप के बच्चे थे – मतलब दूसरों की तकलीफ देखकर खुद दुखी हो जाते, कभी किसी को परेशान करने की सोच भी नहीं सकते। यही कमजोरी उनके भाई-बहनों ने पकड़ ली।
एक दिन दोपहर में खाना खाने के बाद लेखक ने अपनी छोटी पर्स दादाजी के कमरे में बिस्तर पर रख दी। जब लौटे तो पर्स गायब! खोजने पर भी नहीं मिली, ऊपर से किसी के ठहाके सुनाई दिए। दादी और माँ ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया – "जाओ, फिर से ढूँढो!" लेकिन दादाजी को यह बात चुभ गई।
दादाजी का न्याय: अटारी में बंद शैतान
दादाजी लेखक के साथ कमरे में गए, और हँसी की आवाज़ फिर आई। उन्होंने झट से कमरे की खिड़की के पास रखी सीढ़ी और अटारी का लॉक देखा। ज़ोर से आवाज़ लगाई – "कौन है ऊपर?" दोनों शरारती भाई-बहन अटारी में छिपे थे, पर्स और स्नैक्स के साथ। दादाजी ने गुस्से में आकर सीढ़ी हटा दी और अटारी का दरवाजा बाहर से बंद कर दिया – "अब रहो ऊपर, पूरे दिन और रात!"
सोचिए, गाँव के पुराने घर की अटारी – धूल, अंधेरा, डरावनी आवाज़ें! ऊपर से दादाजी की गरजती आवाज़ – "जैसा अंधेरा तुम्हारे मन में है, वैसा ही यहाँ भी है।" दोनों भाई-बहन रोने लगे, गिड़गिड़ाने लगे – "दादाजी, माफ कर दो, डर लग रहा है!" लेकिन दादाजी ने साफ कह दिया – "जैसे तुमने छोटे बच्चे को रुलाया, वैसे ही अब तुम्हें भी समझ आएगा।"
लेखक को दादाजी ने कुछ और पैसे दिए और सलाह दी – "पर्स मत ले जाओ, जेब में पैसे रखो, कुछ लोग दोबारा भी ये कर सकते हैं।" और फिर – "जाओ बेटा, और स्नैक्स ले आओ, रोना नहीं।"
दिल छू लेने वाला सबक और Reddit की चर्चा
इस कहानी ने Reddit पर सैकड़ों लोगों का दिल जीत लिया। एक यूज़र ने मज़ाकिया अंदाज में पूछा – "क्या तुम्हें अपनी पर्स वापस मिली?" लेखक ने हँसी में जवाब दिया – "नहीं, शायद अब भी अटारी में ही होगी!" एक और कमेंट ने कहा – "तुम्हारे दादाजी सच में बहुत अच्छे इंसान थे।" लेखक ने बड़े गर्व से लिखा – "हाँ, वो बिना किसी स्वार्थ के लोगों की मदद करते थे, बिना ब्याज के पैसे देते, औरतों के लिए हमेशा खड़े रहते।"
कुछ लोगों ने ये भी लिखा कि दादाजी जैसे लोग हर किसी की जिंदगी में हों, तो बचपन कितना खूबसूरत हो जाए। एक मजेदार कमेंट था – "मुझे तो सबसे ज्यादा मज़ा इस लाइन में आया – 'मुझे नहीं पता वो ऊपर कितनी देर रहे, मैं तो स्नैक्स लेने निकल गया!' असली प्राथमिकताएँ तो यही हैं।"
बचपन, बदला और दादाजी की सीख
कहानी के आखिर में, लेखक ने बताया कि उनके भाई-बहन कुछ दिनों तक उनसे नाराज़ रहे, लेकिन फिर सब भूल गए। बीस साल बाद जब दादाजी के अंतिम संस्कार पर ये किस्सा दोबारा सुनाया गया, तो वे दोनों खुद को पहचान नहीं पाए – "हमें तो याद भी नहीं!" लेकिन लेखक के लिए दादाजी हमेशा उनके रक्षक रहे।
इस कहानी से हमें यही सीख मिलती है – परिवार में हर किसी को ऐसा कोई चाहिए जो ज़रूरत पड़ने पर हमारे लिए खड़ा हो सके, और शरारत करने वालों को भी सही सबक दे सके। दादाजी की तरह – कभी प्यार से, कभी सख्ती से, लेकिन हमेशा न्याय के साथ।
आपकी क्या राय है?
क्या आपके बचपन में भी किसी बड़े ने ऐसे आपकी हिफाज़त की है? या कभी किसी कज़िन की शरारत ने आपको हँसने-रुलाने पर मजबूर किया? नीचे कमेंट में अपनी कहानी जरूर बताइए। और हाँ, अगर आपके पास भी कोई पुरानी पर्स या स्नैक्स की यादें हैं, तो शायद अटारी में एक बार झाँक लीजिए!
कहानी कैसी लगी? अपने दादाजी, नाना, या बुजुर्गों के साथ बिताए लम्हों को याद करते हुए, अपने अनुभव हमसे साझा करें।
बचपन की ऐसी अनमोल यादें ही तो जिंदगी का असली स्वाद हैं!
मूल रेडिट पोस्ट: Grandpa, snacks, and the attic...