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दादीजी, गीज़ और झाड़ू: होटल की रेस में हंगामा

कार्यालय डेस्क पर काम करने वाले से हिरन के लिए शोर मचाती दादी की एनीमे चित्रण।
इस जीवंत एनीमे दृश्य में, एक छोटी दादी ऑफिस कर्मचारी को जंगली हंसों के शिकार के लिए passionately सामना कर रही हैं, चिल्लाते हुए, "तुम हंसों को मार रहे हो!" उनका उत्साही व्यवहार इस क्षण की अराजकता को बखूबी दर्शाता है।

अगर आपको लगता है कि होटल में काम करना बस मेहमानों को चाय-कॉफी पिलाने और चेक-इन करवाने तक सीमित है, तो जनाब, आप बहुत बड़ी गलतफहमी में हैं! होटल का रिसेप्शन असली “फिल्मी ड्रामा” का मंच है, जहां रोज़ नई कहानियाँ जन्म लेती हैं। आज की हमारी कहानी में हैं – एक गुस्सैल दादीजी, कुछ बेलगाम गीज़ (हंस), एक झाड़ूधारी सुरक्षा गार्ड, और पुलिस का तड़का!

तो चलिए, सुनते हैं ये गजब की होटल डायरी, जिसमें जानवर, इंसान और झाड़ू – सबकी अपनी-अपनी ‘एंट्री’ है।

होटल का शांत सवेरा और दादीजी का गुस्सा

सुबह-सुबह होटल के रिसेप्शन पर शांति फैली थी, तभी अचानक दरवाजे से एक दादीजी तमतमाती हुई अंदर घुसीं। मानो किसी हिंदी सीरियल की सास-बहू की तकरार की तरह, दादीजी ने डेस्क पर ज़ोर-ज़ोर से थपथपाना शुरू किया और चिल्लाईं – "तुम लोग गीज़ को मार रहे हो! तुम्हारे गार्ड ने मुझ पर झाड़ू फेंकी, मैं पुलिस बुला रही हूँ!"

रिसेप्शनिस्ट बेचारा अभी-अभी ड्यूटी पर आया था, उसे तो कुछ समझ ही नहीं आया। बड़े ही शांत स्वर में उसने पूछा, "माता जी, क्या हुआ, कब हुआ, किसने किया?" दादीजी बोलीं, “तुम्हारा वो बड़ा काला गार्ड झील के पास गीज़ को मार रहा है। मैंने उसे रोका तो उसने मुझ पर झाड़ू तान दी।”

गीज़ का आतंक और होटल का संघर्ष

अब जरा सा रुकिए, क्योंकि यहाँ की गीज़ कोई मामूली हंस नहीं, बल्कि "कोबरा चिकन" जैसे डरावने नाम से मशहूर हैं। एक कमेंट में किसी ने लिखा – “गीज़ से पंगा मत लेना, ये तो मुर्गे-मुर्गी के भी उस्ताद हैं! काटने के साथ गर्दन भी मरोड़ देते हैं!” सच में, जो लोग गाँव या फार्म हाउस में रहते हैं, वो जानते हैं कि गीज़ का सामना करना बच्चों का खेल नहीं।

होटल वाले बेचारे क्या करें? झील के किनारे गीज़ घूमते हैं, राहगीरों का रास्ता रोकते हैं, और गंदगी भी खूब फैलाते हैं। इसलिए सिक्योरिटी गार्ड W को झाड़ू लेकर गीज़ को डराने भेजा जाता है, लेकिन मारने के लिए नहीं – बस भगाने के लिए! कई पाठकों ने भी मज़ाक में लिखा, "गीज़ तो खुद ही इतने खतरनाक हैं कि इन्हें गार्ड की नहीं, पुलिस की ज़रूरत है!"

पुलिस आई, दादीजी का ड्रामा और गीज़ की खोज

अब आते हैं कहानी के सबसे मज़ेदार हिस्से पर। पुलिस आई – एक अफसर गंभीर, दूसरा हँसी रोकते-रोकते परेशान। दादीजी फिर चिल्लाईं, "ये लोग गीज़ को मार रहे हैं, इनका गार्ड मुझ पर झाड़ू चला रहा है!"

पुलिस ने गार्ड W से पूछा, "क्या आपने वास्तव में कोई गीज़ मारा?" W बोला, "बिल्कुल नहीं, हम तो सिर्फ डराते हैं, ताकि वो पैदल रास्ते से हट जाएँ।" दादीजी से पूछा गया, "क्या आपने गीज़ को मरते देखा?" दादीजी बोलीं, "वो...नहीं, सच कहूँ तो देखा तो नहीं।"

पूरी टीम झील के किनारे ‘मर्डर हुए गीज़’ की खोज में निकल गई। न कोई मरा गीज़ मिला, न दादीजी फिर कभी नजर आईं। रिसेप्शन वाले और गार्ड तो हँसी रोक नहीं पाए – “भई, लंच में क्या है? गूजबर्गर?”

गीज़, रंगभेद और होटल की असलियत

इस कहानी में मज़ाक और ड्रामे के अलावा एक कड़वा सच भी छुपा है – रंगभेद की मानसिकता। कई पाठकों ने इशारा किया कि दादीजी को गार्ड पर शक सिर्फ इसलिए हुआ क्योंकि वो काले रंग के थे। एक ने लिखा, “सिर्फ रंग देखकर किसी को दोषी मान लेना बहुत गलत है।” खुद कहानी के लेखक ने बताया कि W न सिर्फ होटल का सबसे भरोसेमंद आदमी था, बल्कि सेना का पूर्व जवान भी था। स्थानीय पुलिस, सीक्रेट सर्विस – सब उसे अच्छी तरह जानते थे।

इसीलिए, कई बार जो हमें दिखता है, वो सच नहीं होता। और गीज़ – अरे भई, वे तो किसी से कम नहीं! एक पाठक ने लिखा, “अगर दादीजी को सच में गीज़ ने दौड़ा लिया होता, तो आज गार्ड की नहीं, गीज़ की शिकायत करतीं!”

होटल की ज़िंदगी – हर दिन नया तमाशा

होटल की नौकरी में हर दिन एक नया किस्सा लिखता है – कभी मेहमानों की जिद, कभी जानवरों का झमेला, कभी पुलिस की एंट्री और कभी दादीजी जैसा स्पेशल ड्रामा। होटल वाले भी सोचते हैं, “आज क्या नया होगा?”

यह किस्सा हमें सिखाता है – ज़िंदगी में कभी-कभी हमें हँसी-मज़ाक में भी गहरे संदेश मिल जाते हैं। चाहे गीज़ हों या इंसान, सबसे पहले सच्चाई जानना ज़रूरी है। और हाँ, अगली बार अगर किसी होटल में झील दिखे और वहाँ गीज़ नजर आएं, तो संभलकर चलना – कहीं झाड़ूधारी गार्ड आपकी भी शिकायत ना कर दे!

आपकी राय?

क्या आपके साथ भी ऑफिस या मोहल्ले में ऐसा कोई दिलचस्प हादसा हुआ है? या फिर कभी गीज़ जैसे किसी जानवर से पाला पड़ा हो? कमेंट में जरूर बताइए, और अगर आपको ये कहानी पसंद आई हो तो दोस्तों के साथ शेयर करें – क्योंकि असली मज़ा तो तब है जब हँसी सबके साथ बाँटी जाए!


मूल रेडिट पोस्ट: I'm calling the cops!