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थीम पार्क के पास होटल में लेट चेक-इन की जुगाड़: मेहमानों की फरमाइशों का मेला

क्या आप कभी ऐसे होटल में रुके हैं, जो किसी बड़े थीम पार्क के पास हो? अगर हाँ, तो आप जानते होंगे, वहाँ कमरा मिलना लॉटरी लगने जैसा है! और अगर आप देरी से चेक-इन करने जाएँ, तो फिर तो किस्मत ही भरोसे। आज हम आपको सुनाने जा रहे हैं एक ऐसे ही होटल के रिसेप्शनिस्ट की कहानी, जो रोज़ाना लेट-चेक-इन वाले ‘विशेष’ मेहमानों से दो-चार होते हैं।

देर से आने वालों की फरमाइशें: "भैया, कमरा चाहिए... लेकिन ऐसा-वैसा नहीं!"

होटल रिसेप्शन पर बैठे हमारे नायक की कहानी कुछ यूँ शुरू होती है – थीम पार्क के पास उनका होटल हमेशा ठसाठस भरा रहता है। ऐसे में रात 11 बजे जब कोई मेहमान बड़े-बड़े अरमान लेकर आता है – “मुझे एलिवेटर से दूर वाला कमरा चाहिए”, “आइस मशीन की आवाज़ ना आए”, “टॉप फ्लोर पर नहीं चाहिए” – तो उनकी मुस्कराहट के पीछे की बेचैनी कोई नहीं समझ सकता।

अब सोचिए, कोई सुबह पार्क घूमने गया, फिर समंदर किनारे घूम आया, रिश्तेदारों से मिला और जब पूरी दुनिया सोने की तैयारी कर रही है, तब होटल पहुँचा... और उम्मीद करता है कि उसकी हर ज़िद पूरी हो जाए! भाई, होटल कोई आलू-प्याज़ की दुकान तो है नहीं कि रात को भी ताज़ा माल मिल जाए।

बुकिंग का टाइम, कामन सेंस और 'तीसरे पक्ष' की तकदीर

यहाँ एक कमेंट करने वाले ने बड़ा सही कहा, “पहले चेक-इन करो, फिर घूमें-फिरें! अकलमंदी इसी में है। अगर देर से आओगे, तो जो बचा-खुचा मिलेगा, उसी में काम चलाना पड़ेगा।”
एक और पाठक ने चुटकी ली, “जिस जगह घूमने जा रहे हैं, वहाँ की भीड़ देखकर तो नहीं लगता कि ज़्यादा समझदारी साथ लाए होंगे!”

असल में, होटल में पहले बुकिंग कराने, समय पर पहुँचने और रिसेप्शनिस्ट से विनम्रता से बात करने वालों को प्राथमिकता दी जाती है, खासकर जो लॉयल्टी प्रोग्राम वाले होते हैं – यानी ‘हीरे-जवाहरात’ जैसे कस्टमर। तीसरे पक्ष (यानी OYO, MakeMyTrip जैसी वेबसाइट्स से बुक करने वाले) और वो भी लेट चेक-इन वाले, बस जो बचा-खुचा है, उसी से संतोष करें।

एक कमेंट में किसी ने मज़े से कहा, “इतनी रात गए, वो भी इतने मशहूर टूरिस्ट प्लेस पर, और वो भी थर्ड पार्टी से बुकिंग करके... भई, कमरा मिल गया, उसी में खुश रहो!” सच कहें तो, ‘मांगने में क्या जाता है’ की तर्ज़ पर कई मेहमान तो ऐसे हैं, जो सुबह के 2 बजे भी आकर कहते हैं – “नीचे का कमरा मत दीजिए, बाहर ट्रक की आवाज़ बहुत आती है।” अब रिसेप्शनिस्ट क्या करे, जब वही कमरा बचा हो!

ग्राहक सेवा: ‘जैसा करो, वैसा भरो’

हमारे यहाँ कहावत है, “जैसा बोओगे, वैसा काटोगे।” एक समझदार पाठक ने लिखा, “मुझे अच्छी सर्विस इसलिए मिलती है, क्योंकि मैं अच्छा ग्राहक हूँ।”
होटल वालों का भी यही हाल है – जो शांति से, विनम्रता से अपनी बात रखते हैं, उनकी मदद करना आसान होता है। लेकिन देर से पहुँचकर, ज़िद और गुस्सा दिखाने वालों को सिर्फ़ ‘जो है सो है’ वाला जवाब ही मिलता है।

एक और रिसेप्शनिस्ट ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा, “मैं थीम पार्क के पास नहीं, मगर टूरिस्ट टाउन में काम करता हूँ। रात में देर से आने वाले अगर ऊपरी मंज़िल, शांत कमरा, और खास लोकेशन माँगते हैं, तो मन करता है बोल दूँ – ‘भैया, पहले आ जाते, तो सब कुछ मिलता!’”

होटल का असली रोमांच: रिसेप्शनिस्ट की आँखों से

सोचिए, होटल में भीड़ है, कमरे बुक हैं, और रिसेप्शनिस्ट की निगाहें कमरे के चार्ट पर टिकी हैं। तभी कोई मेहमान पहुँचा, “भैया, मुझे ‘आइस मशीन’ से दूर कमरा चाहिए, एलिवेटर की आवाज़ ना आए, और अगर हो सके तो ऊपरवाले कमरे से...” रिसेप्शनिस्ट सोचता है – "भैया, अब तो जो बचा है वही मिलेगा, आपकी फरमाइशों की झड़ी बाद में लगाना!"

कभी-कभी तो मेहमान पूछ बैठते हैं, “अच्छे कमरे क्यूँ नहीं हैं?” अब रिसेप्शनिस्ट क्या बोले – “भैया, देर आए, दुरुस्त आए, लेकिन कमरे तो कब के चले गए!”

निष्कर्ष: "समय की कद्र करें, रिसेप्शनिस्ट की भी!"

अगर अगली बार आप किसी बड़े टूरिस्ट प्लेस के पास होटल बुक करें, तो याद रखिए – जितनी जल्दी चेक-इन करेंगे, उतना बढ़िया कमरा मिलेगा। और अगर देर से पहुँचें, तो जो मिले उसमें खुश रहिए, रिसेप्शनिस्ट पर गुस्सा मत निकालिए।
आखिरकार, होटल का स्टाफ भी इंसान है, कोई जादूगर नहीं!

क्या आपके साथ होटल में कुछ ऐसा हुआ है? या आपने कभी लेट चेक-इन किया और मज़ेदार अनुभव रहा? कमेंट में ज़रूर बताइए – आपकी कहानी अगली बार यहाँ शामिल हो सकती है!


मूल रेडिट पोस्ट: Late Check ins