जल्दी मिलेगा' बोल-बोलकर बॉस ने सताया, कर्मचारी ने CEO को ईमेल कर दी झटका!
ऑफिस की दुनिया में 'जल्दी मिलेगा', 'अभी भेजता हूँ', 'बस होने ही वाला है' जैसे वादे सुनना आम बात है। लेकिन जब कोई बॉस ये बहाने बार-बार दोहराए और आपके हक़ का पैसा भी रोके, तब क्या करना चाहिए? आज हम आपको सुनाएंगे एक ऐसी असली कहानी, जिसमें कर्मचारी ने अपने बॉस की 'जल्दी मिलेगा' वाली रट को ऐसी धुलाई दी कि खुद बॉस को अपने वीकेंड का कबाड़ा करवाना पड़ा!
परिचय: जब बॉस की चालाकी पड़ गई भारी
यह किस्सा है कनाडा के एक टेलिकॉम कंपनी के कर्मचारी का, लेकिन यकीन मानिए, इसमें हर भारतीय ऑफिस का अक्स दिखेगा। कहानी कुछ ऐसी है – कंपनी के पूर्वी हिस्से के कर्मचारियों को जनवरी से वेतन बढ़ोतरी मिलनी थी, ताकि वे पश्चिमी हिस्से की यूनियन में शामिल न हो जाएं। मगर हमारे नायक के इलाके के एरिया मैनेजर साहब ने 4-5 महीने तक 'जल्दी मिलेगा' का बहाना बनाकर वेतन बढ़ोतरी को लटकाए रखा।
भारतीय दफ्तरों में भी ऐसे चतुर मैनेजर खूब मिल जाते हैं, जो बोनस, प्रमोशन या इनक्रिमेंट को 'बस आने ही वाला है' कहकर महीनों खींचते रहते हैं। जैसे दिल्ली की ट्रैफिक में ऑटोवाले का 'बस पहुँच गए' – और आप आधा घंटा और फँस जाते हैं!
योजना: एक मेल जो बदल दे कहानी
मई का महीना था, और हमारे कर्मचारी भाई ने ठान लिया कि अब और नहीं। उन्होंने चार पन्नों का जोरदार पत्र लिखा, जिसमें बॉस की सारी चालाकियों, वादों की तारीखें और कर्मचारियों की परेशानी का पूरा ब्यौरा था। लेकिन भेजा नहीं – सही मौके का इंतजार किया।
आखिरकार, शुक्रवार को बॉस साहब बड़े गर्व से बोले, "मैं आज दोपहर मस्कोका के कॉटेज जा रहा हूँ, रास्ता बड़ा सुन्दर है!" बस, ये सुनते ही कर्मचारी ने शाम 4 बजे वह पत्र सीधा कंपनी के CEO और प्रेसीडेंट को ईमेल कर दिया। सोचिए, जैसे किसी ने IPL फाइनल में आखिरी ओवर में छक्का मार दिया हो!
परिणाम: बॉस का वीकेंड और बोनस दोनों गए!
अगली सुबह जब कर्मचारी ऑफिस पहुँचा तो देखा, बॉस साहब रातोंरात मस्कोका से टोरंटो लौट आए हैं – चेहरा उतरा हुआ, आँखों में गुस्सा, पर मजबूरी में माफी मांग रहे हैं। उन्होंने बताया कि सबको जनवरी से रेट्रोएक्टिव वेतन बढ़ोतरी मिलेगी और हमारे नायक समेत सभी को मैक्सिमम इन्क्रीमेंट मिलेगा। बॉस का वीकेंड गया, बोनस गया, और इज्जत का तो पूछिए ही मत!
इस सीन में एकदम बॉलीवुड वाला ट्विस्ट आया – कर्मचारी ने सबूतों के साथ बोला, "आप कह रहे हैं, मैंने पहले बात नहीं की? लीजिए, मेल में सारी तारीखें हैं जब आपने मुझे टरकाया था।" और फिर मीटिंग का अंत भी खुद कर्मचारी ने किया – "अब बात खत्म, मैं दुकान के अंदर जा रहा हूँ। मस्कोका का रास्ता बड़ा सुन्दर है, यात्रा शुभ हो!"
पाठ: जब कर्मचारी ने लिया अपना हक़
Reddit पर लोगों ने इस कहानी को 'अब तक का सबसे बढ़िया बॉस विरोधी बदला' करार दिया। एक टिप्पणीकार ने लिखा, "ऐसे बॉस को तो ऐसा सबक मिलना ही चाहिए था!" वहीं, एक अन्य ने अपने अनुभव साझा किए कि भारतीय कंपनियों में भी बोनस या प्रमोशन के नाम पर महीनों तक 'जल्दी मिलेगा' का बहाना चलता है, और जब हकीकत सामने आती है तो सबका मूड खराब हो जाता है।
कुछ पाठकों ने यह भी कहा कि यह बदला 'छोटा' नहीं, बल्कि 'एपिक' था। 'जल्दी मिलेगा' के चक्कर में कर्मचारियों को लटकाना, फिर जब बात ऊपर तक पहुँच जाए तो अफसोस जताना – यह तो हर जगह की कहानी है। किसी ने मज़ाक में लिखा, "बॉस का बोनस और वीकेंड – दोनों का कबाड़ा! वाह!"
भारतीय दफ्तरों के लिए सबक
इस कहानी में दो बातें सीखने लायक हैं – पहली, जब आपका हक़ रोका जाए, तो चुप न रहें। सबूत इकट्ठा करें, सही मौके पर सही जगह आवाज़ उठाएँ। दूसरी, बॉस हो या मैनेजर – अगर वे अपने फायदे के लिए कर्मचारियों को लटकाते हैं, तो एक दिन उनकी पोल खुल ही जाती है। जैसा कि एक पाठक ने लिखा, "बॉस को लगा कंपनी उन्हीं की है, पर असली शक्ति तो कर्मचारियों में है।"
निष्कर्ष: अपने हक़ के लिए डट जाइए!
क्या आपके ऑफिस में भी किसी ने 'जल्दी मिलेगा', 'देखते हैं', 'अभी भेजते हैं' कहकर आपको परेशान किया है? नीचे कमेंट में अपने अनुभव जरूर साझा करें। हो सकता है, आपकी कहानी किसी और को भी हिम्मत दे दे! और याद रखिए – हक़ की लड़ाई में कभी-कभी एक सधे हुए ईमेल से पूरी कहानी बदल सकती है।
अगर पसंद आई हो तो अपने दोस्तों के साथ शेयर करें, और अगली बार जब आपका बॉस 'जल्दी मिलेगा' बोले तो मुस्कुराकर कहिए – "मैं भी देखता हूँ, कितनी जल्दी!"
मूल रेडिट पोस्ट: He said soon a few too many times, so I went nuclear