जब IT सलाहकार ने 'सिर्फ दो लोगों से बात करो' का आदेश जमकर निभाया
कंपनियों में राजनीति और दफ्तर की चाय वाली गपशप तो आम बात है, लेकिन कभी-कभी ये खेल इतने अजीब मोड़ ले लेते हैं कि सुनने वाले भी हक्का-बक्का रह जाते हैं। सोचिए, अगर आपको दफ्तर में ये आदेश मिले कि "भैया, अबसे आप बस दो ही लोगों से बात करेंगे, बाकी किसी से भी नहीं!" क्या आप मानेंगे कि आगे चलकर वही आदेश आपकी जिंदगी को बचा लेगा?
'सिर्फ दो लोगों से बात करो' — आदेश या आफत?
ये कहानी है एक आईटी सलाहकार की, जो एक बहुत ही विशेष फार्मा कंपनी में प्रोडक्शन सपोर्ट का काम कर रहे थे। कंपनी इतनी "निश" थी कि गिनती के लोग ही उसके बारे में जानते थे। एक दिन बॉस की तरफ से ईमेल आया, जिसमें साफ-साफ लिखा था कि बस दो ही लोगों से बात करनी है: एक तो कंपनी का आईटी हेड और दूसरा उसका जूनियर। बाकी किसी से भी बोलचाल नहीं — ना फोन, ना मेल, ना स्माइली भेजना!
पहले तो हमारे सलाहकार को ये बात अजीब लगी। बाद में पता चला कि आईटी हेड को डर था कि बाहर से आई टीम उसके पद पर खतरा बन सकती है। इसलिए, अपने पद की रक्षा के लिए उसने ये दीवार खड़ी कर दी। दफ्तर की राजनीति में ये सब कोई नई बात नहीं, "अपना बचाव करो, बाकी जाए भाड़ में" — यही सोच थी उस हेड की।
जब आदेश ने ही बचाई इज्जत
महीनों तक सलाहकार चुपचाप लॉग चेक करते, गड़बड़ियों की छानबीन करते, और फिर दोनों 'मान्य' लोगों को ईमेल भेज देते — जरा भी इधर-उधर नहीं। लेकिन फिर एक दिन बवाल मच गया! डायरेक्टर ने बुलाया और कहा, "क्लाइंट भड़क गया है, पूछ रहा है आप सारा दिन क्या करते हैं।"
सलाहकार ने समझाने की कोशिश की कि रोजाना रिपोर्ट भेजता हूं, पर डायरेक्टर तो जैसे सुनने के मूड में ही नहीं था। उल्टा, उन्हें 'परफॉर्मेंस इम्प्रूवमेंट प्लान' पर डाल दिया — यानी नौकरी खतरे में!
अब आया असली पेंच। एक मीटिंग बुलाई गई, जिसमें खुद कंपनी के आठ-आठ उपाध्यक्ष (VP) आ बैठे — जैसे कोई पंचायत! सबकी नजरें उस सलाहकार पर, मानो कोई बड़ा अपराध कर दिया हो।
लेकिन जैसे ही सलाहकार ने वह ईमेल दिखाई जिसमें साफ लिखा था, "सिर्फ दो लोगों से संवाद करो", और फिर भेजी गई सारी रिपोर्ट्स की कॉपी दिखा दी — सबकी बोलती बंद! अब सबका गुस्सा आईटी हेड पर निकल गया, जिसने जानबूझकर मामला खराब किया था।
पर्दे के पीछे की राजनीति: असली साजिश
हफ्ते भर बाद खबर आई — वही आईटी हेड अपने कॉलेज दोस्त को ठेके दिलवाने के लिए ये सारा खेल रच रहा था। सोचिए, उसने खुद ही अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली! सिक्योरिटी वाले उसे दफ्तर से बाहर तक छोड़कर आए।
यहां एक कमेंट करने वाले ने बड़ा मजेदार तंज कसा — "आईटी में रहते हुए भी ये शख्स ये नहीं समझ सका कि हर मेल का डिजिटल रिकॉर्ड रहता है।" इसी तरह, एक और पाठक ने लिखा, "हमेशा अपनी बातों का प्रूफ संभालकर रखो।"
किसी ने तो यहां तक कह दिया, "हमारे देश में भी दफ्तर की राजनीति में ऐसे लोग मिल जाएंगे, जो अपने फायदे के लिए दूसरों की बली चढ़ा देते हैं — लेकिन सच आखिर सामने आ ही जाता है!"
दफ्तर की दुनिया: सीख और हंसी-मज़ाक
इस कहानी में एक और पहलू दिखा — दफ्तरों में अक्सर ऊंचे ओहदे वाले लोग (जैसे 8 VP!) इतने व्यस्त रहते हैं कि असलियत जानने से पहले ही किसी को बलि का बकरा बना देते हैं। एक पाठक ने चुटकी ली, "जब गलती हो, तो आठ लोग अलग-अलग आकर सुनाएंगे — जैसे हमारे यहां हर गली में दस सलाहकार मिल जाते हैं!"
एक और कॉमेंट में लिखा था, "कभी-कभी, कंपनी के सबसे बड़े पद वाले ही सबसे ज्यादा मनोरंजन का साधन बन जाते हैं — उनके पासवर्ड से लेकर मीटिंग में छोड़ी गई चाबी तक, हर चीज़ में गड़बड़ी!"
सबसे बड़ी सीख यही है — चाहे आदेश कितना भी अजीब लगे, काम का सबूत संभालकर रखना चाहिए। दफ्तर की राजनीति में कब किसको कबा बनी बना दिया जाए, कोई भरोसा नहीं!
निष्कर्ष: आपके अनुभव क्या कहते हैं?
तो दोस्तों, ये थी एक आईटी सलाहकार की कहानी, जिसने कंपनी के "मूर्खतापूर्ण" आदेश को निभाकर खुद को मुसीबत से बचा लिया — और असली गुनहगार को बेनकाब कर दिया।
क्या आपके साथ भी कभी ऐसा हुआ है कि किसी दफ्तर की राजनीति में आप फंस गए हों? या कभी किसी आदेश ने आपको मुश्किल में डाल दिया हो? अपने अनुभव नीचे कमेंट में ज़रूर बताएं।
और हां, अगली बार जब कोई बॉस बोले — "बस दो लोगों से बात करो", तो मुस्कुराकर सबूत संभाल लेना न भूलें!
मूल रेडिट पोस्ट: I was told I can only communicate with 2 people. Ok then