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जब होमोफोबिक अंकल को मिला 'कुकी' वाला जवाब – प्यार से दी गई मीठी बदला

एक फोटो-यथार्थवादी कुकी जो पूर्वाग्रह और समर्पण के बारे में व्यंग्यात्मक संदेश देती है।
यह फोटो-यथार्थवादी कुकी समलैंगिकता के प्रति पूर्वाग्रह का सामना करने की मीठी विडंबना का प्रतीक है। यह याद दिलाती है कि दया और समझ अक्सर थोड़े व्यंग्य के साथ आती है, खासकर जब पुरानी धाराओं का सामना करना हो।

हमारे समाज में अक्सर ऐसी कहानियाँ सुनने को मिलती हैं जहाँ किसी की पहचान, पसंद या जीवनशैली पर सवाल उठाए जाते हैं। लेकिन क्या हो अगर कोई आपको नफ़रत से देखे और आप उसका जवाब मिठास से दें? आज की कहानी में आपको मिलेगा एक ऐसा ही मजेदार, दिलचस्प और सोचने पर मजबूर कर देने वाला किस्सा, जिसमें एक लड़की ने पुराने जमाने की सोच रखने वाले अंकल को ऐसा मीठा सबक सिखाया कि वो भी सोच में पड़ गए – ‘भई, कुकी में भी बदला छुप सकता है क्या?’

कट्टरता बनाम कुकी – कहानी की शुरुआत

कहानी है अमेरिका के एक दक्षिणी इलाके के 'पैट्रिक अंकल' की, जो लगभग 50 साल के हैं और पुराने खयालात के पक्के। उनकी सोच कुछ वैसी ही थी जैसे हमारे यहाँ के कुछ ताऊ या चाचा – "लड़के-लड़कियाँ अलग, अपनी मर्यादा में रहें, और जो थोड़ा अलग दिखे, वो तो समाज के लिए खतरा है!"

अब कहानी में एंट्री होती है उनकी बेटी की सबसे अच्छी दोस्त की – 18 साल की एक शांत, समझदार लड़की (अब वो 22 साल की और नॉनबाइनरी हैं)। वो पैट्रिक अंकल को शुरू-शुरू में बहुत पसंद आईं क्योंकि उनका व्यवहार अच्छा था, और वो 'सामान्य' दिखती थीं। अंकल को पता था कि वो क्वीर (यानी LGBTQ+) हैं, लेकिन जब तक उनकी शक्ल-सूरत से ये नहीं झलकता था, तब तक सब ठीक था।

लेकिन जब उस लड़की ने अपने बाल छोटे करवा लिए, तो पैट्रिक अंकल के लिए जैसे आसमान टूट पड़ा। अब वो अपनी बेटी से बार-बार कहते, "इससे दोस्ती मत रखो, ये तुझे बिगाड़ देगी! देखो, बाल छोटे करवा लिए, अब लड़कियों को ही पसंद करेगी!"

जब पुराने खयालात से लड़ाई हो – बिना लड़ाई के

अक्सर हमारे यहाँ भी कुछ चाचाजी या मौसीजी ऐसे होते हैं जो अपने बच्चों की संगत पर नज़र रखते हैं – "अरे, वो लड़का थोड़ा अजीब है," या "वो लड़की जींस पहनती है, उससे दूर रहो।" लेकिन इस कहानी की नायिका ने सीधे टकराव की बजाय एक अलग ही रास्ता चुना।

वो पैट्रिक अंकल के बेटों की अच्छी दोस्त बन गई – सबसे बड़े को शांति से समझाया, दूसरे के साथ गेम खेली और सबसे छोटे के साथ मजाक-मस्ती की। यहाँ तक कि पत्नी यानी 'आंटीजी' से भी दोस्ती गांठ ली। अब घर में सब उसके पक्ष में थे, बस अंकल अकेले पड़ गए।

दरअसल, ये "खिलाफत में भी खुद के लिए माहौल बना लेना" वाली बात हो गई, जैसे बॉलीवुड में हीरो का पूरा मोहल्ला उसके साथ हो और विलेन अकेला रह जाए!

बदला – मिठास के साथ!

अब असली ट्विस्ट आता है पैट्रिक अंकल के जन्मदिन पर। उन्हें एक खास तरह की चॉकलेट चिप कुकी बहुत पसंद थी, जो उनके शहर से 40 मिनट दूर एक दुकान से ही मिलती थी। लेकिन हमारी नायिका ने अपनी कुकिंग क्लास का फायदा उठाकर वही कुकीज घर पर बना डाली – और वो भी 48 बड़े-बड़े!

सोचिए, घर में सब ने वाह-वाह की, आंटीजी खुश, बच्चे खुश, और अंकल...अब क्या बोले? जो सबके सामने किसी की बुराई करता था, अब उसी ने सबसे मीठी चीज़ खाई।

रेडिट की कम्युनिटी में एक यूज़र ने मज़ाकिया अंदाज में लिखा – "अगर इसी तरह बदला लेना है, तो मुझे भी तुम्हारा दुश्मन बनना है, मुझे तो पीनट बटर कुकीज पसंद हैं!" एक और ने तो इसे 'कुरुप्टर कुकीज' का नाम दे दिया – यानी "बिगाड़ने वाली कुकीज"!

मज़ेदार बात ये भी है कि जैसे हमारे यहाँ कहते हैं "मिठाई से मुंह मीठा करो, बात भूल जाओ", वैसे ही यहाँ कुकीज ने पैट्रिक अंकल की नकारात्मकता पर जैसे परदा डाल दिया।

कम्युनिटी के जवाब – मीठी जीत

रेडिट पर तो जैसे मीठे बदले की बाढ़ आ गई! किसी ने कहा, "ये तो वही बात हो गई – 'हमारी तरफ आओ, यहाँ कुकीज हैं!'" एक और यूज़र ने चुटकी ली – "भाई, अब तो ये बदला नहीं, ये तो दया से मार डालना हो गया – किलिंग विद काइंडनेस!"

कुछ ने ये भी कहा कि लोग सोचते हैं, किसी क्वीर इंसान के साथ रहने से आप खुद वैसे बन जाएंगे – जैसे हमारे यहाँ कहते हैं, "अरे, उस मोहल्ले में मत जाओ, वहाँ सब अजीब हैं!" लेकिन असल में, हर इंसान की पहचान उसकी अपनी होती है, साथ में रहने भर से कोई बदल नहीं जाता।

एक यूज़र ने तो बड़ा प्यारा कमेंट किया – "तुमने उनके स्तर तक गिरने की बजाय, उनके चारों ओर एक बेहतर माहौल बना लिया।"

सीख – बदला जरूरी नहीं हमेशा तल्ख हो

कहानी से हमें ये भी समझने को मिलता है कि हर लड़ाई तलवार या झगड़े से ही नहीं लड़ी जाती। कभी-कभी, चाय की प्याली या घर की बनी कुकी से भी आप किसी का दिल जीत सकते हैं, या फिर उसके गलत रवैये को सबके सामने उजागर कर सकते हैं।

सोचिए, अगर हमारे समाज में भी लोग कट्टरता का जवाब इसी तरह की मिठास से देने लगें, तो शायद नफ़रत खुद ही पिघल जाए।

निष्कर्ष – आपकी राय?

तो दोस्तो, आपको क्या लगता है – क्या 'कुकी' जैसी छोटी-छोटी चीज़ों से भी बड़ी सोच बदल सकती है? क्या आपने भी कभी किसी को बिना झगड़े के, प्यार से सबक सिखाया है? अपने अनुभव नीचे कमेंट में जरूर साझा करें! और हाँ, अगली बार जब कोई आपको ताने मारे, तो एक प्लेट मिठाई सामने रख देना – देखना, असर जरूर होगा!


मूल रेडिट पोस्ट: So you wanna be homophobic? Here, have a cookie.