जब होटल बना खेल का मैदान: बच्चों की शरारतें और माता-पिता की लापरवाही
होटलों में ग्रुप बुकिंग अक्सर किसी जुआ से कम नहीं लगती। कभी तो सब कुछ शांति से चलता है, और कभी ऐसा लगता है जैसे बारात आ गई हो! हाल ही में एक होटल में लगभग एक तिहाई कमरे एक युवा स्पोर्ट्स टीम ने बुक किए। अब सोचिए, 90 के करीब बच्चे और उनके माता-पिता - होटल का हाल क्या हुआ होगा, अंदाज़ा लगाइए।
इस टीम के जाने का दिन जैसे-जैसे करीब आ रहा था, वैसे-वैसे होटल के कर्मचारियों की सांसें भी ऊपर-नीचे हो रही थीं। बतौर नाइट ऑडिटर, जब मैं आखिरी रात आया, तो ईमेल्स और मैसेज देखकर दिमाग घूम गया। इतने कारनामे कि होटल की दीवारें भी शरमा जाएं!
होटल का हाल बेहाल: बच्चे और उनके माता-पिता
कहानी की शुरुआत होती है होटल के लॉबी से, जहां खाना-पीना, मस्ती, और शोर-गुल का समंदर बह रहा था। जरा सोचिए, रात के सन्नाटे में जब सब सोने चले गए, तो लॉबी में पिज़्जा के खाली डिब्बे, मैकडॉनल्ड्स के पैकेट्स, और तली-भुनी चीजों की खुशबू के साथ-साथ शराब की बोतलें बिखरी पड़ी थीं। कर्मचारी ने बताया, “चार बड़े-बड़े कचरे के बैग भरने पड़े, तब कहीं जाकर सफाई का नाम आया!”
सोफे के पास रैंच सॉस के दाग, जिनमें रंग-बिरंगे मिनी M&Ms ऐसे चिपके थे जैसे किसी मेले में खिलौने। मनोरंजन की चीज़ें—पूल स्टिक, मेगा जेंगा—या तो टूटीं, गायब, या फिर इतनी खराब कि पहचान में न आएं।
और माता-पिता? उन्हें होटल की बार में बाहर से शराब लाने से मना किया गया था, लेकिन ‘हम तो ऐसे ही हैं’ वाले अंदाज़ में सब कुछ नजरअंदाज। एक माता-पिता का जवाब था, “क्या करें, बच्चे तो बच्चे हैं!”
"बच्चे तो बच्चे हैं"—बहाने की इंतिहा
अब ज़रा सोचिए, जब बच्चे होटल की गलियों में दौड़ लगाते रहे, दरवाजों पर जोर-जोर से खटखटाते रहे, और बाकी मेहमानों की नींद हराम करते रहे—तो होटल को पैसे लौटाने और पॉइंट्स वापस करने पड़े।
इसी पर एक पाठक ने खूब चुटकी ली—“बच्चे तो बच्चे हैं, लेकिन माता-पिता भी माता-पिता हैं! अगर आप बच्चों को संभाल नहीं सकते, तो फिर होटल आपके लिए नहीं।” एक और कमेंट में सलाह दी गई, “ऐसे ग्रुप्स को भविष्य में बुकिंग ही न दें, वरना होटल का नाम ही खराब हो जाएगा।”
होटल वालों की दुविधा भी कम नहीं थी। मैनेजमेंट को डर था कि कहीं पैसे का नुकसान न हो जाए, लेकिन कम्युनिटी ने समझाया, “अगर शरारती टीमों को मना करेंगे, तो अच्छे मेहमान खुद बखुद आएंगे—और होटल का माहौल भी बढ़िया रहेगा।”
अनुशासन बनाम आज़ादी: सीखने का मौका या बर्बादी?
स्पोर्ट्स टीम होने के बावजूद, बच्चों में अनुशासन की जगह मस्ती और उधमीपन हावी था। एक अनुभवी कोच ने कमेंट में लिखा—“हम बच्चों को होटल में सख्त नियम बताते थे—कर्फ्यू, नियम, बड़ों की निगरानी। कोई शिकायत मिली तो मैदान से बाहर! कभी कोई समस्या नहीं हुई।”
कई पाठकों ने इस पर भी ध्यान दिलाया कि असल समस्या बच्चों में नहीं, बल्कि माता-पिता की लापरवाही में है। एक ने लिखा, “बच्चे बदमाश नहीं, उन्हें अपने किए का फर्क समझाना और रोकना बड़ों का फर्ज़ है। अगर बच्चे सार्वजनिक जगहों पर तांडव मचाएंगे, तो वे बड़े होकर कैसे जिम्मेदार बनेंगे?”
कुछ मेहमानों ने तो मज़ाक में कह दिया, “अगर होटल में भागते हुए बच्चों से परेशान हूं, तो मन करता है टांग अड़ा दूँ... लेकिन फिर लगता है, गलती बच्चों की नहीं, बल्कि उनके पालकों की है।”
जिम्मेदारी किसकी? होटल, माता-पिता या समाज की
होटलों के लिए ऐसे ग्रुप्स सिरदर्द बन सकते हैं। अनुशासनहीनता, नुकसान और बाकी मेहमानों की परेशानी—सबका खामियाजा आखिर होटल को ही भुगतना पड़ता है। कुछ ने सलाह दी, “ऐसी टीमों को स्पोर्ट्स फेडरेशन में रिपोर्ट करो, कॉन्ट्रैक्ट में भारी जुर्माना रखो, ताकि अगली बार सोच-समझकर आएं।”
किसी ने कहा, “होटल तो होटल है, अगर बच्चों को दिन-रात खेलने देना है तो किसी पार्क में जाइए या घर पर पार्टी कीजिए। होटल कोई 24 घंटे का प्लेग्राउंड नहीं!”
निष्कर्ष: मस्ती में मर्यादा ज़रूरी
कहानी यही सिखाती है कि सार्वजनिक जगहों पर मस्ती और शरारत की भी एक सीमा होती है। बच्चों की शरारतें प्यारी हैं, लेकिन जब वे दूसरों के लिए सिरदर्द बन जाएं, तो माता-पिता को जिम्मेदारी लेनी चाहिए।
आपका क्या अनुभव है? कभी किसी होटल, शादी या यात्रा में ऐसी परिस्थिति देखी है? क्या आपको भी "बच्चे तो बच्चे हैं" वाला बहाना सुनकर गुस्सा आता है या हंसी? नीचे कमेंट करके अपनी राय जरूर बताएं।
क्योंकि आखिरकार, "अनुशासन ही असली खेल है"—चाहे मैदान हो या होटल!
मूल रेडिट पोस्ट: 'Kids Will Be Kids'