जब होटल की नौकरी ने सिखाया—कभी-कभी 'ज़हर' हम नहीं, मैनेजमेंट होता है!
कभी-कभी हमारी पहली नौकरी हमें जिंदगी की सबसे बड़ी सीख दे जाती है—वो भी बिना किसी नोटिस के! सोचिए, आप पूरे मन से अपने काम में लगे हों, हर किसी की मदद कर रहे हों, और अचानक एक दिन आपको 'ज़हरीला' और 'दुश्मन जैसा' बताकर निकाल दिया जाए। जी हां, यही हुआ हमारे आज के किस्से के हीरो (या शिकार?) के साथ, जो पहली बार होटल की रिसेप्शन डेस्क पर काम कर रहे थे।
होटल की दुनिया: बाहर से चमक, अंदर से सिरदर्द!
होटल का नाम सुनते ही ज़्यादातर लोगों को एयर कंडीशनर, मुस्कुराते चेहरे और बढ़िया मेहमाननवाज़ी याद आती है। मगर सच्चाई ये है कि होटल की रिसेप्शन डेस्क पर बैठना मतलब—हर दिन नए नाटक, नए झंझट और कभी-कभी तो सीधे बॉस के गुस्से का सामना! हमारे नायक ने भी यही सोचा था कि 'काम आसान है, बस लोगों को चेक इन/आउट कराना है', लेकिन किसे पता था कि असली सिरदर्द मेहमान नहीं, बल्कि खुद मैनेजमेंट ही बन जाएगा।
ये होटल कोई पाँच सितारा होटल नहीं था, बल्कि एक ऐसा बजट होटल था जो हाइवे के बगल में था—जहाँ ट्रक ड्राइवर, सेल्समैन और स्कूल की स्पोर्ट्स टीमों का आना-जाना लगा ही रहता था। यानी होटल में सारा दिन 'चलती फिरती बारात' जैसा माहौल!
'फल की टोकरी' ने बनाया दुश्मन!
कहानी में ट्विस्ट तब आया जब एक 'VIP मेहमान'—यानि होटल चेन का वफादार ग्राहक, अपनी बेटी की शादी की पहली रात के लिए कमरे की बुकिंग कर गया। उसने चाहा कि होटल वाले उसकी बेटी के कमरे में कोई खास तोहफा—जैसे फल की टोकरी या मिठाई रख दें। अब हमारे नायक तो नियम-कायदे वाले इंसान, उन्होंने साफ समझ लिया कि ये फैसला उनके बस की बात नहीं, ये तो मैनेजमेंट का काम है। उन्होंने बड़े सलीके से सारे ईमेल और फोन कॉल्स एक-एक कर के अपने बॉस, सुपरवाइज़र और सेल्स मैनेजर तक पहुँचा दिए।
मगर जैसा कि एक कमेंट में लिखा था, "अक्सर जब एक काम को कई मैनेजर तक भेजा जाता है, तो वो काम कभी होता ही नहीं!" (ठीक वैसा ही जैसे एक बाल्टी को चार लोग पकड़ लें, तो कभी कुएं से पानी नहीं निकलता।)
मैनेजमेंट की चाल—'बलि का बकरा' बनाओ!
जब 'VIP क्लाइंट' की शिकायतें बढ़ती गईं, तो हमारे नायक ने सेल्स मैनेजर से सीधा पूछ लिया—"आख़िर कोई तो जवाब देगा या सब यूं ही चलता रहेगा?" बस, इसी के बाद अचानक बुलावा आया—"शिफ्ट के बाद मैनेजमेंट ऑफिस में आना!" वहाँ पहुँचते ही सुनाया गया—"आप पर आरोप है कि आप 'ज़हरीला' और 'दुश्मन जैसा व्यवहार' कर रहे हैं। इसलिए आपको नौकरी से निकाल रहे हैं।"
अब भला, जो बंदा सबको खुश रखने की कोशिश करे, वो कब और कैसे 'ज़हरीला' बन गया? एक कमेंट ने सही ही लिखा—"भैया, आपने तो गोली खाने से बच गए! ऐसी जगह से निकल जाना ही बेहतर था।"
कम्युनिटी की राय और सीख
रेडिट पर बहुत से लोगों ने ये महसूस किया कि ये सिर्फ़ 'बलि का बकरा' बनाने वाली चाल थी। एक कमेंट में सलाह दी गई—"ऐसे मामलों में बेरोजगारी भत्ते के लिए अपील करनी चाहिए, क्योंकि असली वजह मैनेजमेंट की सुस्ती थी, आपकी नहीं।"
एक और कमेंट में किसी ने मज़ाकिया लहज़े में कहा, "रात की शिफ्ट में काम करने वालों के लिए थोड़ा 'ज़हरीला' होना ज़रूरी भी है, वरना सर्वाइवल मुश्किल है!" (वैसे, हमारे यहाँ भी कहते हैं—'सीधा पेड़ पहले काटा जाता है'!)
खुद कहानीकार ने बताया कि इस घटना के बाद उन्हें जल्द ही दूसरी होटल की नौकरी मिली—जहाँ कम से कम मैनेजमेंट सिरदर्द नहीं था! एक और पाठक ने चुटकी ली—"कम से कम अब आप जानते हैं कि किसे ईमेल भेजना है और किसे नहीं!"
अनुभव की बात—हर जगह 'बॉस' ही समस्या नहीं
हमारे यहाँ अक्सर कहा जाता है—"मजबूत छत के बिना दीवार टिकती नहीं।" इसी तरह, किसी भी ऑफिस या होटल में सही मैनेजमेंट का होना बहुत जरूरी है। कई बार कर्मचारी पूरी मेहनत करते हैं, मगर मैनेजमेंट की राजनीति या लापरवाही की वजह से उनकी बलि चढ़ा दी जाती है।
इस कहानी से एक बात सबक के तौर पर लेनी चाहिए—दफ्तर की राजनीति हर जगह है, लेकिन अपने आत्म-सम्मान की कीमत पर कभी समझौता मत कीजिए। और हाँ, गलती आपकी नहीं है तो कभी डरिए मत—जैसे एक कमेंट में सलाह दी गई, "ऐसे हालात में हमेशा अपनी बात मजबूती से रखिए, चाहें सामने बॉस ही क्यों न हो!"
निष्कर्ष: क्या आपके साथ भी हुआ है ऐसा?
अगर आपके साथ भी कभी ऑफिस की राजनीति, बॉस की मनमानी या मैनेजमेंट की चालबाज़ी हुई हो, तो अपनी कहानी ज़रूर साझा करें। आखिर, काम की दुनिया में हर किसी के पास कहने-सुनने लायक किस्से होते हैं—कभी हँसाने वाले, कभी सिखाने वाले!
तो अगली बार जब आपका बॉस आपसे कहे—'तुम्हारे व्यवहार में ज़हर है', तो मुस्कुरा कर कहिए—'ज़हर नहीं साहब, सिस्टम का इलाज कर रहा हूँ!'
आपकी राय और अनुभव नीचे कॉमेंट में लिखना न भूलें—शायद अगली कहानी आपकी हो!
मूल रेडिट पोस्ट: Apparently I'm hostile and toxic