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जब सहकर्मी ने चाँद और सूरज में फर्क नहीं किया: दफ़्तर की हँसी-ठिठोली की कहानी

लेडी केविन सुबह की सैर के दौरान साफ नीले आसमान में चंद्रमा और तेज धूप के बीच उलझी हुई हैं।
इस फोटो में लेडी केविन एक सुंदर सुबह की सैर का आनंद ले रही हैं, जहां वह चमकती धूप और चंद्रमा की अद्भुतता पर मुग्ध हैं, जो प्रकृति की सुंदरता और एक साधारण भ्रम में छिपे हास्य को दर्शाता है।

हमारे दफ़्तर में रोज़ कुछ न कुछ नया होता है, लेकिन कुछ किस्से ऐसे होते हैं जो सालों तक याद रहते हैं। एक सुबह की बात है, जब मैं अपने सहकर्मी—जिन्हें हम आज 'लेडी केविन' कह सकते हैं—के साथ दफ्तर जा रहा था। आसमान बिल्कुल साफ़ था, एक तरफ़ सूरज अपनी पूरी चमक बिखेर रहा था, और दूसरी ओर आधा निकला चाँद शरमाता सा दिख रहा था। तभी उन्होंने एक ऐसा सवाल पूछा कि मेरा तो दिमाग घूम गया!

चाँद और सूरज का फर्क—इतना भी मुश्किल?

जैसे ही हम आगे बढ़े, लेडी केविन ने चाँद की ओर इशारा कर पूछा—"ये चाँद है या सूरज?"
अब आप सोचिए, हमारे देश में तो बच्चे भी ये सवाल सुनकर हँस पड़ें! मैंने मुस्कुरा कर सूरज की ओर इशारा किया—"उस चमकदार रोशनी वाले को सीधे मत देखना, वो सूरज है।"
उन्होंने नाक सिकोड़ी—"अरे! वो तो मुझे पता है! मैं तो इस दूसरे वाले की बात कर रही थी।"

ऐसे सवाल सुनकर तो अपने देश में भीड़ में से कोई चुटकी ले लेता—"बहनजी, सूरज पर तो तिलक लगाने का टाइम शाम को ही मिलता है!" लेकिन यहाँ, दफ्तर के माहौल में मैंने हँसी दबा ली।

ज्ञान का सागर—कहाँ है वेटिकन?

कहानी यहाँ खत्म नहीं होती। बस पाँच मिनट बाद ही सवाल आया—"वो पोप कहाँ रहते हैं?"
मैंने समझाया—"वेटिकन सिटी में।"
"वो कहाँ है?"
"रोम में।"
"वो कहाँ है?"
"इटली में।"
"इटली कहाँ है?"

अब आप ही बताइए, अगर किसी गाँव की पान की दुकान पर कोई बच्चा पूछ ले तो लोग कहेंगे, "अरे बेटा, दुनिया घूमी नहीं, पर घूमने का शौक़ ज़रूर है!" लेकिन ये सवाल वो भी पूछ रही थीं जो यूरोप में ट्रैवल इंडस्ट्री में काम करती हैं!

कम्युनिटी की चटपटी प्रतिक्रियाएँ

रेडिट पर इस कहानी को पढ़कर कईयों ने मज़ेदार टिप्पणियाँ कीं। एक पाठक ने तो यहाँ तक कहा—"कुछ लोग तो ऐसे हैं, जैसे उन्हें सांस लेना भी याद दिलाना पड़े!"
दूसरे ने चुटकी ली—"मुझे तो अपने हाथ पर 'सांस लो' और 'सांस छोड़ो' का टैटू बनवाना पड़ेगा।"
किसी ने पूछा—"ऐसे लोग हर रोज़ कपड़े कैसे पहन लेते हैं?"
इन टिप्पणियों में भारत की परिचित ठिठोली की झलक दिखती है—जैसे गांव में कोई कह दे, "अरे, खुद कपड़े पहन लिए, ये भी चमत्कार है!"

एक यूज़र ने पूछा—"दुनिया में सबसे बुद्धिमान कैसे बन गए हम, जब इतने लोग ऐसे हैं?"
ऐसे सवाल पर अपने यहाँ भी कोई ताऊ कह देता—"बेटा, भगवान की माया है!"

दफ़्तर के किस्से, हँसी और सीख

ऐसी घटनाएँ दफ़्तर की चाय-चर्चा का हिस्सा बन जाती हैं। कोई कहेगा—"यार, ऐसे लोगों के भरोसे दुनिया चल रही है?"
एक पाठक ने साझा किया—"मेरी सहकर्मी ने एक बार पूछा था—'लास वेगास अमेरिका में है क्या?' फिर कभी पूछा—'इटली में समुद्र तट है या नहीं?'"
भारत में तो हम अक्सर सुनते हैं—"आप अफ्रीकी भाषा बोलना सीखना चाहती हैं?" यह सुनकर सब ठहाके लगाते हैं!

असल में, ये सब बातें हमें ये सिखाती हैं कि ज्ञान सिर्फ किताबों से नहीं, आस-पास की दुनिया देखने-समझने से भी आता है। और कभी-कभी, हँसी मज़ाक में ही हम बहुत कुछ सीख लेते हैं।

निष्कर्ष: क्या आपने भी ऐसे सवालों का सामना किया है?

हमारे समाज में भी ऐसे लोग मिल जाते हैं—कभी-कभी हम खुद भी ऐसे सवाल पूछ बैठते हैं कि बाद में खुद ही हँसी आ जाती है।
इसलिए अगली बार जब कोई सहकर्मी या दोस्त 'चाँद-सूरज' जैसा सवाल पूछे, तो झुंझलाइए मत—शायद वो दिन की शुरुआत हँसी के साथ करने की कोशिश कर रहा है!

आपके साथ भी कभी ऐसा कोई मज़ेदार किस्सा हुआ हो तो कमेंट में ज़रूर शेयर करें—आखिर हँसी और ठिठोली तो हमारी संस्कृति का हिस्सा है!


मूल रेडिट पोस्ट: Lady Kevin can't tell between moon and sun