जब ‘स्वाद’ चमक में गुम हो गया: रसोईघर की एक मजेदार कहानी
भारतीय दफ्तरों और होटलों में अकसर बॉस के आदेश और कर्मचारी की समझ के बीच गजब की जुगलबंदी देखने को मिलती है। कभी-कभी ऐसे आदेश आ जाते हैं, जिनका अंजाम बॉस भी नहीं सोच सकता! आज की कहानी भी ऐसी ही है—जहां एक नौजवान कर्मचारी ने "आदेश का पालन" करते-करते स्वाद ही गुम कर दिया, और सबका दिमाग हिल गया।
आदेश, चमक और स्वाद – कहानी की शुरुआत
इस कहानी के नायक हैं एक युवक, जिनकी उम्र कोई 19-20 साल रही होगी। ये किसी आलीशान रिज़ॉर्ट में डिशवॉशर की नौकरी कर रहे थे—वो भी दूसरी बार! हमारे यहाँ भी तो कई बार लोग एक ही जगह बार-बार नौकरी पकड़ लेते हैं, क्योंकि "कर्म ही पूजा है", और कभी-कभी "मजबूरी का नाम महात्मा गांधी" भी।
एक दिन रिज़ॉर्ट में हवाईयन लुआऊ (Hawaiian Luau) का आयोजन हुआ। भई, हमारे यहाँ तो शादी-ब्याह या तीज-त्योहार की दावतें मशहूर हैं, पर वहाँ पूरा सुअर भूनने वाली पार्टी हो रही थी। इसके लिए खास तौर पर एक बड़ा सा स्पिट रोस्ट (pig cooker) किराये पर मंगवाया गया—जिसमें दो-दो सुअर समा जाएँ! अब हमारे नायक को खाना खाने का मौका तो नहीं मिला, पर सफाई की जिम्मेदारी जरूर मिल गई।
बॉस के आदेश और कर्मचारी की “निष्कपट आज्ञापालन”
अब आते हैं असली मसले पर। एक शेफ (जो अच्छे वाले नहीं, बल्कि "हुक्म चलाने" वाले थे) गोल्फ कार्ट से आए, सिगरेट पीते हुए बोले—"इसे चमका दो।" हमारे नायक ने झाँककर देखा, तो pig cooker का हाल बिल्कुल हमारी ट्रेन के टॉयलेट जैसा था—गंदगी की हद नहीं।
"साफ तो कर दूँ, पर कहाँ से शुरू करूँ?" पूछने पर जवाब मिला—"मुझे फर्क नहीं पड़ता, बस चमकना चाहिए!"
कहानी यहीं से मजेदार हो जाती है। हमारे नायक को समझ आ गया कि ये तो क्लासिक 'बलि का बकरा' बनाने का मामला है—कुल जमा तीन घंटे में इतना बड़ा pig cooker "नया जैसा" चमकाना! परंतु, भारतीय जुगाड़ू भावना जाग उठी—सप्लाई क्लोसेट से नया ब्रश, तेज केमिकल, गार्डन होज़... सब जुटा लिए। चार डिब्बे डिग्रीज़र, पेंट स्क्रेपर, स्कॉच पैड... और फिर घंटों घुटनों के बल बैठकर सफाई।
यहाँ एक कमेंट करने वाले ने कमाल की बात कही—"मैं तो पूरी कहानी पढ़ते-पढ़ते यही सोच रहा था कि कहीं ये गोल्फ कार्ट को तो नहीं चमका रहा था!" (वैसे, भारतीय शादी में भी कई बार दूल्हे की कार ज्यादा चमकाई जाती है, घोड़ी से भी ज्यादा!)
स्वाद बनाम चमक: जब 'सीजनिंग' का मोल समझ आया
घंटों सफाई के बाद, ऑफिस वाला, शेफ और किराये की मशीन का मालिक आ धमके। मशीन के मालिक का तो गुस्सा सातवें आसमान पर—"तुमने तो पूरा स्वाद ही साफ कर दिया! ये 'सीजनिंग' थी!" हमारे नायक हक्का-बक्का—उस वक्त 'सीजनिंग' का मतलब जानते ही नहीं थे (भाई, हमारे यहाँ भी तो तवे-करछुल की 'जमी जली' को स्वाद समझते हैं)।
शेफ भी कम नहीं—"क्या कर दिया, कॉमन सेंस नहीं है?" अब नायक ने भी दो टूक कह दिया, "आपने बोला था, जैसे भी हो, नया जैसा चमकाओ!"
कुछ पल के लिए सन्नाटा, फिर गुस्से की बौछार—"अब HR में शिकायत होगी, नौकरी गई समझो!" पर तभी दूसरा डिशवॉशर, एक कमेंट करने वाले की भाषा में कहें तो "गीले तौलिए वाला योद्धा", आकर बोला—"भाई, आपने साफ-साफ बोला था, मैं भी गवाह हूँ!"
आखिरकार सफाई यहीं रोक दी गई, मशीन को बस धोकर छोड़ दिया गया। डिपॉज़िट गया पानी में, पर नायक की नौकरी बच गई। और शेफ की जमकर फजीहत हुई।
कम्युनिटी की मजेदार बातें और भारतीय तड़का
रेडिट कम्युनिटी ने भी इस पर खूब मजे लिए। किसी ने लिखा—"ये 'मैलिशियस' कमप्लायंस कम, 'भोलाभाला' पालन ज्यादा है!" तो किसी ने सवाल उठाया—"असली स्वाद तो अंडरग्राउंड ओवन में बनता है, स्पिट रोस्ट में नहीं।" (वैसे हमारे यहाँ भी असली स्वाद मिट्टी के तंदूर या चूल्हे में बनता है, न?)
एक और पाठक ने मजाक में पूछा—"तुमने कहीं पिग के बजाय गोल्फ कार्ट तो नहीं धो दिया?" किसी ने 'सीजनिंग' पर तंज कसा—"तवे या कढ़ाई में तो समझ आता है, यहाँ तो बहाना है न धोने का!" और सच कहें, भारतीय घरों में भी पुरानी कढ़ाई को मां जैसे संभालती हैं—कई बार तो नया नौकर गलती से स्क्रबर चला दे, तो घर में बवाल ही मच जाता है!
नतीजा – आदेश का पालन, लेकिन दिमाग लगाकर!
इस कहानी से एक सीख मिलती है—बॉस का आदेश मानना जरूरी है, लेकिन कभी-कभी दिमाग का इस्तेमाल भी उतना ही अहम है। 'चमकाना' कहो तो स्वाद भी चला जाता है! और सबसे जरूरी बात—कर्मचारी भी इंसान है, जादूगर नहीं।
कैसी लगी आपको ये कहानी? आपके साथ भी कभी ऐसा मजेदार वाकया हुआ है, जब बॉस के आदेश का नतीजा उल्टा पड़ गया हो? नीचे कमेंट में जरूर बताइए। और हां, अगली बार जब घर में कोई तवा या कढ़ाई साफ करें, तो मम्मी को पहले पूछ लीजिए—वरना स्वाद के साथ घर का 'शांति' भी चला जाएगा!
मूल रेडिट पोस्ट: Really seals in the flavor