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जब सरकारी दफ्तर की जिद ने कर्मचारी को बना दिया 'साइकलिंग हीरो'!

नदी के किनारे एक खूबसूरत रास्ते पर साइकिल चलाते हुए व्यक्ति का कार्टून 3D चित्र, दूरस्थ कार्य की स्वतंत्रता दर्शाता है।
यह जीवंत कार्टून-3D चित्र एक खूबसूरत नदी के किनारे साइकिल चलाने की खुशी को दर्शाता है, जो दूरस्थ कार्य की स्वतंत्रता को पूरी तरह से व्यक्त करता है। कार्यालय के घंटों को खूबसूरत साइकिल सैर में बदलने का रोमांच अपनाएं!

सरकारी दफ्तरों की कहानियाँ अक्सर बोरिंग लगती हैं, लेकिन भाई साहब, आज जो किस्सा सुनाने जा रहा हूँ, वो एकदम फिल्मी है! सोचिए, एक बंदा अपनी मस्ती में नौकरी कर रहा है, अचानक अफसरों की नई जिद आती है, और फिर क्या—सारे नियम उलटे पड़ जाते हैं!

दफ्तर के नए नियम और कर्मचारी की फुल-ऑन मालिशियस कंप्लायंस

हमारे नायक, जो एक लोकल काउंसिल (यानी नगरपालिका) में नदी के किनारे-किनारे काम करते थे, अपनी नौकरी से बड़े खुश थे। ऑफिस उनके काम की असली जगह से दूर था, लेकिन ज़रूरत पड़ने पर हफ्ते में एक-दो बार वहां जाकर लौट आते थे। उनका कॉन्ट्रैक्ट साफ़ कहता था, 'साहब, आपको सरकारी वैन नहीं मिलेगी, और अपनी गाड़ी लाना ज़रूरी नहीं है।' भई, मस्त जिंदगी थी—कभी ऑफिस, कभी फील्ड, और कभी घर से काम (Work From Home)!

फिर आया अफसरी आदेश: "हर रोज़ ऑफिस आओ, यहीं से ड्यूटी शुरू होगी!" कर्मचारी ने समझाने की बहुत कोशिश की कि उसका असली काम तो ऑफिस से मीलों दूर है, और उसके पास सफर करने के लिए कोई गाड़ी भी नहीं। लेकिन अफसरों की तो 'हमको सब पता है' वाली सोच—न मीटिंग सुनी, न ईमेल देखा। बस नियम थोप दिया।

साइकिल की सवारी, फिटनेस के साथ-साथ सरकारी तकरार

अब भाई साहब क्या करते? गर्मी का मौसम था, तो उन्होंने भी सोचा—'जो कहा है, वही करूंगा!' ऑफिस उनके घर से पूरे 16 मील दूर (यानी करीब 25-26 किलोमीटर)। रोज़ सुबह-सुबह साइकिल उठाई, एक घंटे पंद्रह मिनट में ऑफिस पहुँच गए। वहाँ थोड़ा सा काम, फिर वापस अपनी असली साइट की ओर। वहां एक-दो घंटे काम किया, लंच किया, फिर वापस ऑफिस, और दिन खत्म होते-होते फिर घर!

सोचिए, रोज़ करीब 60 मील (लगभग 100 किलोमीटर!) साइकिल चलाना! शुरू-शुरू में तो टांगें जवाब देने लगीं, लेकिन कुछ समय बाद खुद ही फिटनेस ट्रेनर बन गए। कभी-कभी बस पकड़ी, लेकिन दो बस बदलनी पड़ती थी, जो साइकिल से भी ज्यादा स्लो निकली।

अफसरों की समझ में आई बात — "नियमों का चक्कर, कर्मचारी का चमत्कार"

अब सरकार में बैठे अफसरों को समझ में आया कि ‘भैया, ये काम तो हो ही नहीं पा रहा!’ रोज़ ऑफिस आना, फिर साइट जाना, फिर लौटना—काम के लिए वक्त ही नहीं बचता था। किसी ने तंज कसते हुए कहा, "कंपनी को तो साइकिल का माइलेज भी खर्चे में जोड़ना चाहिए था!" (जैसे हमारे यहाँ 'टीए-डीए' के झगड़े होते हैं!)

आखिरकार, जब महीनों बाद काम पूरा नहीं हुआ, तो अफसरों ने खुद ही माना—'कर्मचारी ने तो वही किया जो हमने कहा!' मगर असल में उन्होंने देखा कि बिना सोचे-समझे नियम बनाना खुद के लिए ही भारी पड़ गया। फिर साहब को चुपचाप कहा गया कि "अब से तुम्हारा बेस वही साइट होगी जहाँ असली काम है।"

मज़ेदार टिप्पणियाँ और जनता का जवाब

इस कहानी पर रेडिट पर भी खूब हंसी-ठिठोली हुई।
एक यूज़र ने लिखा—"सरकारी अफसरों की हठ धर्मिता—हम जानते हैं सबसे अच्छा, इसलिए जो कहा है, वही करो!"
दूसरे ने मस्ती में कहा—"साइकिलिंग के नाम पर पूरा ऑफिस घुमा दिया, बढ़िया कंप्लायंस!"
किसी ने चुटकी ली—"इतनी साइकिल चलाओगे, तो टायर और ब्रेक पैड्स का हिसाब कौन देगा?"
एक साहब ने तो अपनी कहानी सुनाई—"हमारे यहाँ भी एक कंपनी ने बच्चों को गर्मियों में साइकिल पर बिठाकर मोहल्ले में घुमाया था, सबको मज़ा आ गया!"

इसी बहाने लोगों ने सरकारी दफ्तरों की ‘कागज़ी घोड़ा दौड़’ की तुलना हमारे अपने ऑफिस और सरकारी महकमों से भी कर डाली। सबका यही कहना था—जबरदस्ती के नियम बनाओगे, तो ऐसे ही उल्टे पड़ेंगे!

निष्कर्ष – ‘जहाँ चाह वहाँ राह’ और ‘सरकारी दिमाग का चक्कर’

इस किस्से से हमें सीख मिलती है—अगर अफसरों की सोच सिर्फ फॉर्मलिटी तक ही सीमित रह जाए, तो मेहनती कर्मचारियों को भी 'जुगाड़' निकालना आ ही जाता है। साथ ही, ये भी कि कभी-कभी नियम की जिद न सिर्फ काम बिगाड़ती है, बल्कि सबको हंसी का सामान भी दे जाती है।

तो दोस्तों, कभी आपके ऑफिस में भी ऐसे बेहूदा नियम आ जाएं, तो घबराइए मत—शायद आपका भी नंबर आए 'साइकिलिंग हीरो' बनने का! अपनी राय और ऐसे मज़ेदार किस्से नीचे कमेंट में ज़रूर बताइए!


मूल रेडिट पोस्ट: Ok, I will cycle around all day instead of working