जब समुंदर किनारे उड़ती रेत ने सिखाया ‘पर्सनल स्पेस’ का असली मतलब

सूर्योदय के समय समुद्र तट के दृश्य का कार्टून-3D चित्र, जिसमें रेत हवा में उड़ रही है।
हमारे वार्षिक समुद्र तट की छुट्टी का आनंद लें! यह जीवंत कार्टून-3D कला एक शानदार दिन की शुरुआत से पहले के खेलमय क्षणों को दर्शाती है।

हर साल की तरह इस बार भी हम अपने परिवार के साथ एक सुनसान से कस्बे में, समुद्र किनारे छुट्टियां मनाने पहुंचे। वैसे तो ये जगह इतनी शांत होती है कि लगता है जैसे वक्त भी यहाँ सुस्ताने आ गया हो। समुद्र किनारे की ठंडी हवा, रेत पर नंगे पाँव चलना और चाय की चुस्कियों के साथ सुबह का मज़ा – बस यही हमारी छुट्टियों का असली सुख था।

हम रोज़ाना सुबह अपनी आदत के मुताबिक 8:40 बजे समुद्र तट पर पहुँच जाते थे। इस समय वहाँ सन्नाटा रहता, इक्का-दुक्का लोग ही दिखते। और समुद्र की तेज़ हवा, जो नौ बजे के बाद धीमी हो जाती थी। इसलिए हम सुबह जल्दी पहुँचकर तंबू-छाता लगा लेते, ताकि दिन भर आराम से बैठ सकें।

अब आप सोच रहे होंगे, इसमें नया क्या है? असली मसाला तो तब शुरू हुआ जब एक अनजान परिवार, हमारे सेटअप के ठीक पीछे आकर जम गया – इतना करीब कि अगर कोई देख ले, तो यही समझे कि हम सब एक ही टोली से हैं। उनकी मम्मी ने तो सीधा कह दिया, “अरे, आप लोग तो हमारे लिए बढ़िया वॉटर ब्रेक बन गए!” यानि अब समुद्र की हवा और रेत हम झेलें, और वे हमारे पीछे मज़े करें!

हमने सोचा – चलो, कोई बात नहीं, अपने देश में भी तो कभी-कभी ट्रेन में कोई बगल में आकर बैठ जाता है, भले पूरी बर्थ खाली हो। पर यहाँ तो मामला कुछ ज्यादा ही ‘पर्सनल स्पेस’ का था। फिर भी, हमने ध्यान नहीं दिया, अपने दिन का आनंद लेते रहे।

अब दोपहर हुई, हवा फिर से तेज़ होने लगी। आमतौर पर हम इस समय लौट जाते, लेकिन आज मन किया थोड़ा और रुकें। तभी दिमाग में एक आइडिया आया – बदला लेने का मौका!

हमने अपने सारे तौलिये, चादरें और वो सब चीज़ें जिनमें रेत फँसी थी, उठाईं और रेत पर अच्छी तरह घुमा-घुमाकर साफ करने लगे। हवा पीछे से आ रही थी और हमारी सफाई की पूरी रेत उड़कर सीधी उस परिवार के सिर, मुँह और आँखों में जा रही थी। वहाँ से आवाज़ें आने लगीं – “इतनी रेत उड़ा रहे हैं, मुँह में जा रही है!”, “आँखों में भी पड़ गई।” लेकिन हमने तो मन में ठान लिया था – आज तो इन्हें ‘पर्सनल स्पेस’ का असली मतलब समझाकर ही जाएंगे!

यह नज़ारा देख, Reddit कम्युनिटी में हंसी का तड़का लग गया। एक मज़ेदार टिप्पणी आई – “इनको तो उनका असली ‘डेज़र्ट’ (रेत और मिठाई, दोनों का तंज़!) मिल गया।” और किसी ने लिखा – “काश, मैं भी वहाँ होता और ये सीन लाइव देखता!” कई पाठकों को ये छोटा सा ‘बदला’ इतना सुकूनदायक लगा कि एक ने तो कहा, “आँख में आँसू आ गए... ओह, ये तो रेत है!”

कुछ लोगों ने तो भारतीय ट्रेनों और बसों का उदाहरण देते हुए कहा, “जैसे कोई खाली बस में आकर आपके बगल में ही बैठ जाए – लोग तो जहाँ जगह मिले, वहीं घुस जाते हैं!” एक पाठक ने तो यहाँ तक कह डाला, “अगर इनको रेत पसंद नहीं, तो वापस अपने घर में रहना चाहिए, बीच पर क्यों आए?”

मगर हर कहानी का दूसरा पहलू भी होता है। एक सज्जन ने सलाह दी, “कभी-कभी दिन अच्छा बीते तो उसी को याद रखना चाहिए, छोटी-छोटी बातों का बदला लेने में वक्त और ऊर्जा दोनों ही बर्बाद होते हैं।” लेकिन सच कहूं तो, कभी-कभी ऐसी ‘छोटी सी बदमाशी’ दिल को बड़ी राहत दे जाती है – जैसे गर्मी में ठंडी लस्सी!

इस घटना से एक बात तो साफ है – चाहे मुंबई की लोकल हो या गोवा का बीच, ‘पर्सनल स्पेस’ की कद्र करना जरूरी है। अगर आप किसी सूनसान जगह पर भीड़ लगाते हैं, तो कभी-कभी रेत आपके भी मुँह में आ सकती है! और हाँ, अगली बार जब आप समुद्र किनारे जाएं, तो ध्यान रखें – अपने साथ-साथ दूसरों की सुविधा का भी ख्याल रखें, वरना हवा का रुख कब बदल जाए, कौन जाने!

क्या आपके साथ भी कभी ऐसा हुआ है, जब किसी की बदतमीजी का जवाब आपने बड़े दिलचस्प तरीके से दिया हो? या फिर ‘पेटी रिवेंज’ (छोटी बदला) की कोई मज़ेदार कहानी हो? कमेंट में बताइए, और इस पोस्ट को शेयर कीजिए उन दोस्तों के साथ, जिन्हें ‘पर्सनल स्पेस’ का मतलब बार-बार समझाना पड़ता है!

आखिर में, यही कहेंगे – “रेत हो या रिश्ता, दोनों में थोड़ी दूरी जरूरी है!”


मूल रेडिट पोस्ट: Here is to sand in your eye.