जब सेना के 'फॉर्मल' विद्रोह ने कमांडर को कर दिया परेशान
क्या आपने कभी किसी सरकारी दफ्तर में फॉर्म भरने की झंझट झेली है? अगर हां, तो आप समझ सकते हैं कि कागज़ी कारवाई की ताकत क्या होती है! लेकिन सोचिए, अगर कोई इस 'फॉर्म संस्कृति' को ही हथियार बना ले और अफसरों को उनकी ही चाल में फंसा दे? आज की कहानी कुछ ऐसी ही है – एक फौजी की 'छोटी सी' बदला लेने की बड़ी कहानी, जो Reddit पर खूब वायरल हो रही है।
फौजी की फॉर्म-युद्ध: कहानी की शुरुआत
ये किस्सा है एलन नाम के एक जवान का (जिन्हें उनके पड़पोते ने Reddit पर साझा किया), जो 40-50 के दशक में सेना में थे। नया-नया भर्ती हुआ जवान, सारे साथी अलग-अलग पोस्टिंग के लिए तैयार थे। एक दिन अफसर ने पूछा – 'भइया, कौन-कौन विदेश में पोस्टिंग चाहता है?' बीस में से चार ने हाथ उठाए। अफसर ने फॉर्म थमाया, 'इच्छा है तो ये भर दो।'
अब गड़बड़ ये हुई कि चार की जगह 16 लोग विदेश चले गए, लेकिन बेचारे एलन वहीं के वहीं! उन्होंने अफसर से पूछा, 'साहब, मैंने भी तो फॉर्म भरा था, मेरा नाम क्यों नहीं?' जवाब मिला – 'सूची में नाम नहीं है, जाओ यहां से!' (जैसे हमारे यहां फाइलें टेबल से टेबल घूमती रहती हैं, वैसे ही सेना में भी चलता है!)
जब धैर्य बन जाए विद्रोह: 'फॉर्मल' बदला
एलन मायूस थे, लेकिन तभी फॉर्म रूम के रिसेप्शनिस्ट ने उन्हें एक सीक्रेट बताया – 'तुम जितने चाहो उतने फॉर्म भर सकते हो, कोई लिखित शिकायत नहीं होगी!' बस फिर क्या था, एलन ने एक और फॉर्म भरा, भेजा, फिर 'DENIED' (अस्वीकृत)। फिर भरा, फिर अस्वीकार। ये सिलसिला चलता रहा।
अब कमांडर का पारा चढ़ गया – 'तुम बार-बार फॉर्म क्यों भेज रहे हो? मेरा वक्त बर्बाद हो रहा है!' धमकी भी दी कि अगली बार लिखित कार्रवाई होगी। लेकिन एलन को तो रिसेप्शनिस्ट की बात याद थी – 'ये तुम्हारा अधिकार है!' तो वे फिर से फॉर्म भरकर भेज आए।
अगले दिन कमांडर ने बुलाया, गुस्से में फॉर्म लहराते बोले – 'अगर इस बार मंजूर कर दूं तो फॉर्म भेजना बंद करोगे?' एलन बोले – 'हां साहब!' और अफसर ने गुस्से में जोर से 'ACCEPT' की मुहर लगा दी।
कमेंट्स का तड़का: जनता ने क्या कहा?
इस किस्से पर Reddit की जनता ने खूब मज़े लिए। एक यूज़र ने लिखा, 'वाह! क्या फॉर्मल बदला लिया है!' (हमारे यहां इसे 'सरकारी बदला' कह सकते हैं)। किसी ने कहा – 'ये तो वही बात हुई, जैसे सरकारी बाबू को चाय के बिना काम नहीं होता, वैसे ही फॉर्म के बिना भी अफसर परेशान हो जाते हैं।'
एक और कमेंट बड़ा मज़ेदार था – 'कागज़ी कार्रवाई से भी विद्रोह किया जा सकता है, ये तो नया ही अंदाज़ है!' (सोचिए, अगर हमारे सरकारी दफ्तरों में भी लोग ऐसे फॉर्म युद्ध करने लगें तो बाबू लोग क्या करेंगे!)
किसी ने कह दिया – 'ये कहानी झूठी लग सकती है, लेकिन जिसने सेना में वक्त बिताया है, वो जानता है कि ऐसी अजीबोगरीब घटनाएँ आम बात हैं।' (जैसा कि हमारे यहां भी दादाजी की कहानियों में सरकारी सिस्टम के किस्से सुनने को मिलते हैं।)
सबसे मजेदार तो एलन की एक और जुगाड़ थी – जब अफसर रात में यूनिफॉर्म की जांच करते, तो हर बार छोटा-सा दोष बताकर वापस भेज देते। एलन समझ गए कि कोई फर्क नहीं पड़ता, वो बस बिस्तर पर जाकर लेट जाते और हर बार वैसे ही लौट आते, आखिरकार अफसर झुंझला कर उन्हें सोने भेज देते! इसे कहते हैं 'पुरखों वाला विद्रोह'!
भारतीय नजरिए से: फॉर्म और अफसरशाही
हम भारतीयों के लिए ये कहानी बहुत ही अपनापन लिए हुए है। सरकारी फॉर्म, बाबूगिरी, अफसरों के नखरे – ये सब तो हमारे खून में है! कितनी ही बार आपने भी सोचा होगा, 'भाई, ये फॉर्मलिटी कब खत्म होगी?' लेकिन यहां एलन ने उसी सिस्टम को अपने फायदे के लिए घुमा दिया।
सोचिए, अगर रेलवे में रिजर्वेशन के लिए बार-बार फॉर्म भरते रहें, या राशन कार्ड के लिए आवेदन पर आवेदन भेजते रहें – एक न एक दिन बाबू भी हार मान जाएगा!
निष्कर्ष: कभी-कभी 'फॉर्म' भी हथियार बन जाता है
एलन की कहानी से एक सीख मिलती है – धैर्य और जुगाड़ से बड़ी से बड़ी अफसरशाही भी घुटने टेक देती है! कभी-कभी सिस्टम को उसकी ही भाषा में जवाब देना पड़ता है।
अब सोचिए, आपके जीवन में ऐसा कौन सा मौका आया जब आपने भी 'फॉर्मल' हथियार उठाया हो? या फिर किसी सरकारी दफ्तर में बाबू को उसके ही नियमों में फंसा दिया हो?
अपने अनुभव नीचे कमेंट में जरूर साझा करें – क्या पता आपकी कहानी भी किसी दिन वायरल हो जाए!
मूल रेडिट पोस्ट: Won't let your soldier overseas, enjoy the paperwork.