जब 'स्थानीय' मेहमानों की दरियादिली ने B&B मालिक को हैरान कर दिया
कहते हैं, "मेहमान भगवान होते हैं" – पर क्या हो जब भगवान खुद अपने घर में मेज़बान के नियम तोड़ने आ जाएं? अगर आप कभी छोटे शहरों या कस्बों में किसी गेस्टहाउस या हॉस्पिटलिटी बिज़नेस के मालिक से मिलें, तो ये किस्सा ज़रूर सुनने को मिलेगा कि सबसे मुश्किल ग्राहक कौन होते हैं – अपने ही मोहल्ले या शहर के ‘स्थानीय’ मेहमान!
आज हम आपको Reddit के मशहूर फोरम r/TalesFromTheFrontDesk से एक ऐसी ही दिलचस्प कहानी सुनाने जा रहे हैं, जिसमें एक छोटे से गेस्टहाउस के मालिक/मालकिन को अपने ही देश के अमीर-औलाद स्थानीय मेहमानों का असली रंग देखने को मिला।
अपने ही घर में, अपने ही मेहमान!
कहानी की शुरुआत होती है एक प्यारे से, सादगी भरे B&B (Bed & Breakfast) गेस्टहाउस से, जो जंगल और वन्य जीवन के बीच बना है। मालिक और उनकी पत्नी दोनों कलाकार हैं और वहाँ वर्कशॉप भी चलाते हैं। उनका मकसद यही है कि हर वो इंसान, जिसे जंगल का अनुभव चाहिए, लेकिन बड़ी-बड़ी रिसॉर्ट्स की भारी-भरकम फीस नहीं दे सकता – उसे भी ये मौका मिले।
इसी बीच, एक ‘स्थानीय’ साहब अपने जन्मदिन पर वर्कशॉप करने की इच्छा लेकर पहुँचते हैं। बात-चीत के दौरान पहले तो सब सामान्य नजर आता है – साहब पूछते हैं, “खुद खाना बना सकते हैं क्या?” जवाब मिलता है, “नहीं, लेकिन आप अपनी पसंद की ब्रेड ला सकते हैं।” बात यहीं तक रहती, तो ठीक था।
सस्ता चाहिए, रुतबा भी चाहिए!
अब असली ट्विस्ट देखिए – ये साहब पूरे खान-पान का सामान खुद साथ लाए, मानो किसी रिश्तेदार के यहाँ गाँव चले आए हों! एक रात बिताने के बाद अगली सुबह बगल के कमरे से ही ईमेल भेज दी – “भाई साहब, आखिरी रात की बुकिंग कैंसिल कर दो और अगर लोकल डिस्काउंट मिल जाए तो बताओ, यहाँ तो बहुत महंगा है!”
अब सुनिए, सबसे मज़ेदार बात – ये साहब पूरे वक्त अपने बिज़नेस की सफलता, समंदर किनारे बने दुसरे घर और खुद के 8 कमरों वाले गेस्टहाउस की बड़ी-बड़ी बातें करते रहे! और खुद ही सस्ती दर की माँग भी कर रहे हैं।
एक Reddit यूज़र ने बड़ा खूबसूरत कमेंट किया, "जो लोग अपनी दौलत का सबसे ज्यादा दिखावा करते हैं, वही असल में सबसे ज्यादा कंजूस निकलते हैं।" मालिक ने भी हँसते हुए जवाब दिया, “यही वजह है कि उनके पास इतना पैसा है – कंजूसी करके!” एक और ने जोड़ा, “और दूसरों का शोषण करके भी।”
लोकल मेहमानों की जुगाड़-बाज़ी: हर जगह एक जैसी!
हमारे देश में भी अक्सर यही देखा जाता है – कोई रिश्तेदार या जान-पहचान वाला होटल में ठहरे, तो सबसे पहली माँग यही – "अपनों के लिए कोई खास रेट?" या फिर, "मुझे तो स्पेशल छूट मिलनी चाहिए, मैं तो अपने ही शहर का हूँ!"
एक पाठक ने अपने अनुभव शेयर किए – “जब स्कूल में चंदा जुटाने घर-घर जाता था, तो सोचा था अमीर लोग ज़्यादा देंगे। लेकिन असल में उन्हीं घरों में सबसे ज़्यादा मोल-भाव और बहाने मिलते थे!” ठीक वैसा ही अनुभव डिलीवरी वालों को भी होता है – बड़ी गाड़ियों वाले लोग टिप देने में सबसे पीछे रहते हैं।
नियम सबके लिए बराबर!
मालिक ने आगे बताया – उनके यहाँ नियम साफ हैं, बुकिंग के कुछ दिन पहले कोई रद्दीकरण या छूट नहीं मिलती। पर लोकल साहबों की सोच अलग – “हम तो अपने हैं, हम पर नियम कहाँ लागू होते हैं!” Reddit पर किसी ने सलाह दी, “छूट माँगना ही रेड सिग्नल है – ऐसे ग्राहक से दूरी ही भली!”
एक और पाठक ने मज़ेदार ताना मारा, “आपको कहना चाहिए था, ‘लगता है आपकी कंपनी का बुरा वक्त चल रहा है!’ ऐसी बात सुनकर बड़े-बड़े अमीरों को सबसे ज़्यादा चुभन होती है।”
अंत में – मेहमाननवाज़ी भी, आत्मसम्मान भी!
इस किस्से से क्या सीख मिलती है? सबसे पहली बात – अपने घर के नियम सबके लिए बराबर होने चाहिए, चाहे सामने वाला कितना भी रुतबा दिखाए। और दूसरा, कभी-कभी 'ना' कहना भी ज़रूरी है। एक पाठक ने तो लिखा, "ना भी एक पूरा वाक्य है!"
तो अगली बार जब कोई ‘स्थानीय’ मेहमान भारी रुतबे के साथ छूट माँगे, तो मुस्कुराकर कहिए – “माफ करिए, हमारे यहाँ सबके लिए एक ही रेट है!” और हाँ, अपने गेस्टहाउस के अनुभव हमें भी ज़रूर बताइए – आपकी कहानी भी किसी को हँसा सकती है, तो किसी को सिखा सकती है।
आपका क्या अनुभव रहा है ऐसे 'स्थानीय' मेहमानों के साथ? कमेंट में जरूर बताएं!
मूल रेडिट पोस्ट: And they wonder why we're not a fan of local guests...