जब स्कूल की रजिस्ट्रार ने बायोलॉजी को बना दिया मज़ाक: नाम और नाता की उलझन
स्कूल में बच्चों का एडमिशन कराना वैसे तो हर माता-पिता के लिए थोड़ा सिरदर्दी भरा काम होता है, लेकिन सोचिए अगर स्कूल की रजिस्ट्रार ही बायोलॉजी के बेसिक नियमों से अनजान हो तो? जी हाँ, आज की कहानी है एक ऐसी 'केवीना' की, जो नाम और खून के रिश्ते के बीच का फर्क ही भूल बैठीं।
सोचिए, आप अपने चार बच्चों का स्कूल ट्रांसफर करवा रहे हैं, सारी फॉर्मैलिटी ऑनलाइन पूरी कर चुके हैं, और अचानक आपको स्कूल से फोन आता है – “क्या आपके पति, बॉब, सच में आपके चारों बच्चों के जैविक पिता हैं?” ऐसा सवाल सुनकर किसी का भी माथा ठनक जाए!
नाम, सरनेम और रिश्ते: भारतीय समाज में भी है यह उलझन
हमारे देश में भी अकसर ऐसा देखा जाता है कि परिवार के सदस्यों के सरनेम अलग-अलग हों तो लोग फौरन शक की निगाह से देखने लगते हैं। गाँव-शहर, हर जगह लोग पूछ ही बैठते हैं—“अरे, बेटे का नाम शर्मा और बाप का नाम वर्मा? मामला क्या है?” लेकिन अमेरिका में तो मामला एक कदम और आगे बढ़ गया!
यहाँ कहानी की माँ ने बताया कि उनके दो बड़े बच्चों का सरनेम उनका (माँ का) है और दो छोटे बच्चों का उनके पति का। वजह बड़ी सीधी थी—पहले शादी नहीं हुई थी, तो बच्चों को माँ का सरनेम मिला, बाद में शादी हुई तो छोटे बच्चों को पिता का। इस पर केवीना नाम की रजिस्ट्रार ने फरमान सुना दिया—“अगर सरनेम अलग है तो बॉब दो बड़े बच्चों के जैविक पिता नहीं हो सकते!”
अब भारतीय नजरिए से सोचिए—क्या नाम बदलने से खून बदल जाता है? यहाँ तो लोग मुहावरे में भी कहते हैं, 'नाम में क्या रखा है?' लेकिन लगता है केवीना ने ये कहावत कभी सुनी ही नहीं थी!
तर्क-वितर्क और बायोलॉजी की बैंड: जब लॉजिक की छुट्टी हो जाए
माँ ने केवीना को समझाया—"आपके पास बच्चों के जन्म प्रमाणपत्र की कॉपी है, देखें, पिता का नाम साफ-साफ लिखा है।" केवीना ने देखा भी, मान भी लिया...लेकिन बस दस मिनट के लिए।
फिर दूसरा सवाल—“सबसे छोटे बच्चे के बर्थ सर्टिफिकेट पर पिता का नाम क्यों नहीं है?” माँ ने बताया—कोविड के दौरान उनके पति कैंसर ट्रीटमेंट के कारण साथ नहीं रह सके, इसलिए उनका नाम नहीं जुड़ सका। लेकिन डीएनए टेस्ट की कोर्ट ऑर्डर है।
अब यहाँ केवीना का नया तर्क—"आपका डीएनए टेस्ट 2021 का है, हम एक साल से पुराने दस्तावेज़ नहीं मान सकते!" माँ ने झट से जवाब दिया—“बड़े बच्चों के बर्थ सर्टिफिकेट तो 2011 के हैं, वो कैसे मान लिए?”
केवीना का जवाब सुनिए—"लेकिन वो बर्थ सर्टिफिकेट है!" माँ ने फेर से समझाया—"ये कोर्ट ऑर्डर है, बच्चा 2021 से अभी तक नया जैविक पिता कैसे पा सकता है? बायोलॉजी ऐसे थोड़ी बदलती है!"
लेकिन केवीना के लॉजिक के आगे विज्ञान भी हार मान गया—"कौन जाने, दस्तावेज़ पुराने हो गए तो कुछ बदल गया हो!"
एक नजर समुदाय के विचारों पर: हँसी, गुस्सा और तजुर्बा
रेडिट कम्युनिटी में इस पोस्ट पर खूब चर्चा हुई। एक यूज़र ने लिखा—"शायद केवीना के जॉब डिस्क्रिप्शन में समझदारी शामिल नहीं है, उम्मीद है टीचिंग भी उसकी जिम्मेदारी न हो!" किसी ने अपने स्कूल के दिन याद किए—"हमारे स्कूल में तो फुटबॉल कोच ही हिस्ट्री पढ़ाते थे, बस किताब पढ़ते रहते थे।"
एक और मज़ेदार कमेंट था—"मुझे तो शक है, केवीना को साइंस छोड़कर सीधा पौराणिक कथाएँ पढ़नी चाहिए थी, जहां हर साल कोई नया रिश्ता बन जाता है!"
कई लोगों ने यह भी सवाल उठाया कि आखिर स्कूल को इतना बायोलॉजी में जाने की जरूरत ही क्या थी? एक भारतीय संदर्भ में सोचें तो यहाँ एडमिशन के वक्त बस माता-पिता का नाम, पता और बच्चों की उम्र पूछी जाती है, डीएनए का झंझट तो दूर-दूर तक नहीं!
मूल पोस्ट की लेखिका ने भी मज़ाकिया अंदाज में बताया कि उन्होंने हर रजिस्ट्रार को ईमेल कर दिया, ताकि केवीना को समझ में आ जाए कि दस्तावेज़ सही हैं। आखिरकार, किसी और रजिस्ट्रार ने उनका काम कर दिया और माफ़ी भी मांगी। इस पर किसी ने तंज कसा—"आजकल तो बुनियादी काम करवाने के लिए भी सौ चक्कर लगवाते हैं, बढ़िया किया आपने!"
क्या शिक्षा प्रणाली में तर्कशक्ति की कमी है?
इस पूरी घटना के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था भी ऐसे ही नियम-कायदों में उलझ कर रह गई है? एक कमेंट में किसी ने लिखा—"आजकल तो बड़ों-बड़ों को खुद से सोचना ही नहीं आता, सब चेकलिस्ट के हिसाब से चलते हैं।"
किसी ने सुझाव दिया कि जैसे पुराने जमाने में 'तर्क और विवेक' पढ़ाया जाता था, वैसे ही आज भी स्कूलों में 'क्रिटिकल थिंकिंग' ज़रूरी विषय होना चाहिए।
कहानी की माँ ने भी माना कि अलग-अलग सरनेम होने पर सवाल उठना आम बात है, लेकिन जब सारे दस्तावेज़ सामने हों, तब भी किसी को बायोलॉजी समझानी पड़े, तो वाकई चिंता की बात है।
निष्कर्ष: नाम में नहीं, सोच में रखा है फर्क!
हमारे देश में भी बहुत बार नाम, जात, धर्म को लेकर उलझनें पैदा हो जाती हैं, लेकिन इस कहानी ने तो अलग ही स्तर का हास्य और सीख दी है। बायोलॉजी, लॉजिक और तर्क—तीनों की धज्जियाँ उड़ती देखना किसी हास्य नाटक से कम नहीं था।
तो अगली बार जब आप किसी सरकारी दफ्तर या स्कूल में दस्तावेज़ लेकर जाएँ और सामने वाला तर्कशक्ति की बजाय चेकलिस्ट पकड़ ले, तो इस कहानी को याद कर मुस्कुरा लें। आखिर, "नाम में क्या रखा है?"... असली फर्क सोच में होता है!
क्या आपके साथ भी कभी ऐसा कोई अजीब अनुभव हुआ है? नीचे कमेंट में जरूर बताएँ—क्योंकि कहानियाँ बाँटने से ही तो असली मज़ा आता है!
मूल रेडिट पोस्ट: Kevina Doesn't Understand Basic Biology