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जब स्कूल की नीति बनी 'नीति' का खेल: एक माँ-बेटी की शानदार बदला कहानी

कैप और गाउन पहने एक उच्च विद्यालय के छात्र, शैक्षिक चुनौतियों और सफलताओं पर विचार करते हुए।
एक गर्वित उच्च विद्यालय के स्नातक का अत्यंत यथार्थवादी चित्रण, जो शैक्षिक बाधाओं और विजय की यात्रा का प्रतीक है, चुनौतियों के सामने धैर्य और संकल्प की भावना को पूरी तरह से दर्शाता है।

स्कूल की ज़िंदगी में हर कोई कभी न कभी किसी न किसी 'नीति' या नियम का शिकार हुआ है। लेकिन जब बात अपने बच्चे के भविष्य की हो, तो माँ-बाप किसी भी हद तक जा सकते हैं। आज हम आपको एक ऐसी ही माँ की कहानी सुनाने जा रहे हैं, जिसने अपनी बेटी के लिए स्कूल की सुपरिटेंडेंट को उनकी ही 'नीति' से धूल चटा दी।

कहानी में भरपूर ड्रामा है, गुस्सा है, मासूमियत है और एकदम देसी अंदाज में 'पेटी रिवेंज' भी। तैयार हो जाइए, क्योंकि यह कहानी हर उस अभिभावक को प्रेरित करेगी, जिसने कभी स्कूल की नीतियों से दो-चार होना पड़ा हो।

स्कूल की 'नीति' या सत्ता का दुरुपयोग?

कहानी शुरू होती है अमेरिका के एक हाई स्कूल से, लेकिन इसमें भारतीय स्कूलों जैसा ही रस है। एक माँ की बेटी—जो पढ़ाई में होनहार, चीयरलीडर्स की कप्तान और स्कूल की स्टार थी—को अचानक स्कूल के सुपरिटेंडेंट, डॉ. बारबरा (यहाँ नाम में ही 'बार' है, मतलब रुकावट!), ने सीनियर क्लास से निकालकर जूनियर होमरूम में डाल दिया। वजह? सिर्फ़ दो क्रेडिट्स की कमी, जो बीमारी की वजह से छूट गए थे, और जिनके लिए काउंसलर ने पहले ही आश्वासन दिया था कि फिक्र मत करो, सीनियर में कवर हो जाएगा।

यहाँ ध्यान देने वाली बात है कि भारत में भी अक्सर प्रिंसिपल या हेडमास्टर अपनी मनमर्जी से नियम बदल देते हैं। कई पाठकों को शायद ऐसे अनुभव होंगे जब 'नीति' अचानक 'व्यक्तिगत दुश्मनी' बन जाती है।

'नीति' पर सवाल, और सुपरिटेंडेंट की दोहरी चाल

जब बेटी आँसू में डूबी घर पहुंची, तो माँ-बाप का खून खौल गया। वे सीधे स्कूल ऑफिस पहुँचे, जहाँ सुपरिटेंडेंट मैडम बारबरा ने बड़े ठसके से कहा—"माफ़ कीजिए, यही स्कूल की पॉलिसी है।"

अब यहाँ कहानी ने मोड़ लिया। माँ ने पूछा—"बारबरा जी, स्कूल में स्मोकिंग (धूम्रपान) की क्या पॉलिसी है?" सुपरिटेंडेंट बौखला गईं, और बोलीं, "अपने घर का ध्यान रखिए, मैं अपने ऑफिस का रख लूँगी!" माँ ने जाते-जाते वही सवाल दोहराया—"लेकिन पॉलिसी क्या है, बारबरा?"

यहाँ देसी पाठकों को 'नीति' की आड़ में अपने फायदे के लिए नियम लागू करने वाले दफ्तरों और सरकारी बाबुओं की याद आ गई होगी। जैसे कोई ऑफिसर फाइल अटकाकर खुद ही नियम तोड़ता है, वैसे ही सुपरिटेंडेंट भी स्मोकिंग करती पकड़ी गईं।

कैमरा, धूम्रपान और 'पॉलिसी' की हार

असली ट्विस्ट तब आया जब माँ ने 35mm कैमरा उठाया, और ऑफिस के बाहर जाकर सुपरिटेंडेंट और चपरासी को स्मोकिंग करते हुए, ज़मीन पर पड़े सिगरेट के बट्स के ढेर की तस्वीरें खींच लीं। शाम को जब 'बट' बकेट डस्टबिन में डाला गया, उसकी भी फोटो ले आईं।

अगले ही दिन, बेटी को फिर से सीनियर क्लास, चीयरलीडर कैप्टन और बाकी सभी अधिकार वापस मिल गए।

यहाँ एक कमेंटकर्ता ने बड़ी सटीक बात कही—"असली माँ शेरनी बन गई, दाँत-नाखून निकालकर!" (जैसा कि हमारे यहाँ अकसर माएँ अपने बच्चों के लिए करती हैं)

कम्युनिटी के विचार: गाइडेंस काउंसलर और 'नीति' का सच

रेडिट पोस्ट पर कई यूज़र्स ने अपने अनुभव साझा किए। एक ने कहा—"गाइडेंस काउंसलर तो मज़ाक हैं, मेरी काउंसलर ने कहा था कि मुझसे कुछ नहीं होगा, मैंने सब कॉलेज में दाखिला लिया और सब जगह चुन लिया गया।"

दूसरे ने बताया कि कैसे कुछ सलाहकार छात्रों को जानबूझकर हतोत्साहित करते हैं और प्राइवेट कंपनियों से कमीशन लेते हैं—ये बात हमारे देश में भी कई जगह सुनने को मिलती है, जब करियर काउंसलर कोचिंग या कॉलेजों से कमीशन लेते हैं।

वहीं, एक अनुभवी काउंसलर ने माफ़ी मांगते हुए कहा कि हर जगह सभी बुरे नहीं होते—"मैं हमेशा कोशिश करती हूँ कि बच्चों को प्रोत्साहित करूँ, रास्ता दिखाऊँ।" यह सुनकर भारतीय पाठकों को भी अपने पसंदीदा और नापसंद शिक्षकों की याद आ सकती है।

कहानी का अंत: 'नीति' पर जीत और 'बारबरा' का बाय-बाय

कहानी में सबसे मजेदार मोमेंट तब आया, जब स्कूल बोर्ड के मीटिंग के बाद, माँ ने स्कूल पार्किंग में सिगरेट जलाई, और जब किसी बोर्ड मेंबर ने स्मोकिंग पॉलिसी की याद दिलाई, तो ज़ोर से बोलीं—"बारबरा से बुलवाओ!" बारबरा ने सुनकर भी अनसुना कर दिया।

आखिरकार, एक साल बाद बारबरा का कॉन्ट्रैक्ट रिन्यू नहीं हुआ—यानी 'नीति' की आड़ में दूसरों पर रौब जमाने वालों का अंत हमेशा अच्छा नहीं होता।

भारतीय पाठकों के लिए यह कहानी एक सीख है—जब भी कोई अधिकारी या संस्था 'नीति' की आड़ में अन्याय करे, तो अपने हक के लिए आवाज़ उठाइए। कभी-कभी 'नीति' पर सवाल उठाना ही सबसे बड़ा हथियार होता है।

निष्कर्ष: आपकी 'नीति' का क्या मतलब है?

दोस्तों, स्कूल, कॉलेज, या दफ्तर—हर जगह ऐसे 'नीति-प्रेमी' लोग मिल जाते हैं, जो नियमों की आड़ में अपनों को परेशान करते हैं। लेकिन अगर आप सही हैं और आपके पास हिम्मत है, तो आप किसी भी 'बारबरा' को उसकी जगह दिखा सकते हैं।

क्या आपके साथ भी कभी ऐसी कोई घटना हुई है? क्या कभी किसी 'नीति' ने आपको या आपके बच्चों को परेशान किया? अपनी कहानी नीचे कमेंट में ज़रूर लिखिए—आपकी आवाज़ भी किसी और के लिए प्रेरणा बन सकती है!

तो अगली बार कोई कहे—"ये पॉलिसी है"—तो ज़रा मुस्कुराकर पूछिए, "अरे, असली नीति क्या है?"


मूल रेडिट पोस्ट: but what's the policy?