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जब साइंस टीचर ने 'सिर्फ एजुकेशनल सप्लायर से खरीदो' की पॉलिसी को दिया करारा जवाब

कक्षा में विज्ञान कैटलॉग से शैक्षिक सामग्री की जांच करता शिक्षक।
इस दृश्य में, एक पूर्व विज्ञान विभाग के प्रमुख शैक्षिक सामग्रियों की खरीद में आने वाली चुनौतियों पर विचार करते हैं, जो शिक्षा में बजट आवंटन के महत्व को उजागर करता है।

स्कूल लाइफ में आपने कई बार सुना होगा – "नियम तोड़ना गलत है!" लेकिन क्या हो जब कोई टीचर नियमों का इतना ईमानदारी से पालन कर दे कि खुद नियम बनाने वालों के होश उड़ जाएं? आज हम आपको एक ऐसी ही सच्ची घटना सुनाने जा रहे हैं, जिसे पढ़कर आप हँसी भी रोक नहीं पाएंगे और सोच में भी पड़ जाएंगे कि हमारे सिस्टम में आखिर गड़बड़ कहाँ है।

सिर्फ 'एजुकेशनल सप्लायर' से खरीदो – नियम या नौटंकी?

हमारे कहानी के हीरो हैं एक पूर्व साइंस टीचर, जिन्होंने सालों तक स्कूल के साइंस डिपार्टमेंट की जिम्मेदारी संभाली थी। स्कूल वालों ने आदेश दिया – "अब से हर चीज़, चाहे वो पेपर टॉवल हो या विज्ञान की कोई किट, केवल दो खास एजुकेशनल कैटलॉग्स से ही खरीदनी है। न अमेजन, न किराना दुकान, न कोई और वेबसाइट।" वजह? "पेपर ट्रेल" यानी हर खरीद का पक्का हिसाब-किताब रहे।

अब भला आठवीं क्लास के बच्चों के साथ साइंस का काम – इसमें पेपर टॉवल तो ऐसे उड़ते हैं जैसे गर्मी में आम के पत्ते। किराना दुकान में जो पेपर टॉवल ₹80 में मिल जाता, वही एजुकेशनल सप्लायर से ₹350-₹400 का! और ज़रूरत थी 30 टुकड़े। हिसाब लगाइए, ₹2,400 की जगह ₹12,000 खर्च हो गए – सिर्फ पेपर टॉवल पर!

जब सिस्टम खुद ही अपने जाल में फँस गया

टीचर साहब ने नियमों का अक्षरशः पालन किया, ऑर्डर डाला, बिल पास हुआ, और देखते ही देखते स्कूल के बजट का बड़ा हिस्सा सिर्फ पेपर टॉवल पर उड़ गया। बस फिर क्या था! स्कूल प्रशासन के होश ठिकाने आ गए। सबका माथा ठनका – "इतना खर्चा कैसे हो गया?"

यहाँ एक कमेंटेटर ने बड़े मज़ेदार अंदाज़ में कहा, "यह तो वही बात हो गई – अपनी ही बनाई पॉलिसी से खुद के पैर पर कुल्हाड़ी मारना!" आगे चलकर, स्कूल वालों ने फटाफट एक 'ग्रोसरी स्टोर बजट' बना दिया और अमेजन से भी खरीदारी की इजाज़त मिल गई। यानी जब तक जेब पर मार न पड़े, तब तक अक्ल कहाँ आती है!

शिक्षकों की जद्दोजहद – दिल से भी, जेब से भी

एक और टीचर ने कमेंट किया, "साइंस का मल्टीमीटर अमेजन पर ₹500 में, वही कैटलॉग में ₹1,200 का! बजट वैसे ही तंग, ऊपर से ये महंगाई। कई बार तो अपनी जेब से पैसे लगा दिए, बच्चों की पढ़ाई के लिए।"

यह दर्द सिर्फ अमेरिका का नहीं, भारत के हर सरकारी या प्राइवेट स्कूल का भी सच है। हमारे यहाँ भी टीचर्स अक्सर अपनी जेब से चार्ट पेपर, पेन, या एक्स्ट्रा सप्लाई ख़रीद लेते हैं – ताकि बच्चों की पढ़ाई न रुके। लेकिन एक अनुभवी टीचर ने सही कहा, "जब तक टीचर खुद से पैसे देते रहेंगे, सिस्टम उन्हें हमेशा हल्के में लेगा। सबको मिलकर आवाज़ उठानी होगी ताकि भविष्य में कोई और टीचर मजबूर न हो।"

सरकारी सिस्टम की देरी और बेमतलब का कागज़ी झंझट

एक और मज़ेदार घटना – एक स्कूल में साइंस की जरूरत के लिए 'वर्मिकुलाइट' यानी पौधों की मिट्टी का ऑर्डर देना था। लेकिन वाइस प्रिंसिपल ने गलती से 'वर्मीचेली' पास्ता ऑर्डर कर दिया! अब बताइए, पास्ता से पौधे कैसे उगेंगे? यहाँ लोग कहते हैं, "हमारे यहाँ तो सरकारी दफ्तर में इतनी फाइलें घूमती हैं कि काम होने की जगह चाय ज़्यादा पी जाती है!"

कई कमेंट्स में लोगों ने कहा कि सिस्टम में ये सख्त नियम कभी-कभी भ्रष्टाचार रोकने के नाम पर बनाए जाते हैं, लेकिन उसका खामियाजा ईमानदार लोगों को उठाना पड़ता है। जैसे हमारे यहाँ सरकारी खरीद में 'गोपनीयता' और 'टेंडर' की इतनी परतें होती हैं कि सस्ती चीज़ महंगी पड़ जाती है।

हल है… लेकिन समझदारी चाहिए

कुछ लोगों का सुझाव था कि अगर स्कूल को ट्रैकिंग की चिंता है, तो टीचर्स को 'स्मार्ट कार्ड' या ग्रोसरी स्टोर की 'क्लब मेंबरशिप' दे दी जाए – हिसाब भी बना रहेगा, और खरीदारी भी सस्ती पड़ेगी। लेकिन अक्सर, सिस्टम ऐसी सीधी बात सुनता कहाँ है?

एक और उपयोगकर्ता ने कहा, "असल दिक्कत ये है कि नीति बनाने वाले ज़्यादातर लोग खुद क्लासरूम में नहीं रहे, इसलिए जमीनी हकीकत समझ ही नहीं पाते।" ओपी (मूल लेखक) ने भी यही जोड़ा – "शायद टीचर्स की राय लेना, नीति बनाने का हिस्सा होना चाहिए!"

निष्कर्ष – जब तक जेब ढीली न हो, तब तक अक्ल नहीं आती!

तो साथियों, ये कहानी हमें हँसाती भी है और सोचने पर भी मजबूर करती है – क्या हमारे सिस्टम में बदलाव तभी आता है जब जेब ढीली होती है? क्या नियमों की अंधी दौड़ में हम खुद को ही नुकसान पहुँचा रहे हैं? और क्या कभी वो दिन आएगा, जब हर स्कूल – चाहे भारत हो या अमेरिका – बच्चों और शिक्षकों की असली ज़रूरत समझकर बजट बनाएगा?

आपका क्या अनुभव रहा है? क्या आपके स्कूल या ऑफिस में भी ऐसी कोई 'कागज़ी पॉलिसी' रही है, जिससे सबका सिर घूम गया? अपने अनुभव नीचे कमेंट में ज़रूर साझा करें – कौन जाने, अगली कहानी आपकी हो!


मूल रेडिट पोस्ट: Only buy from educational suppliers? Sounds good.