जब 'व्हाइट मार्बल करेन' को खुद अपने ही चाल का स्वाद चखना पड़ा
शहरों में अपार्टमेंट या सोसाइटी में रहने का सबसे बड़ा रोमांच क्या है? कभी-कभी तो ऐसा लगता है जैसे पड़ोसियों के बिना ज़िंदगी कितनी आसान हो जाती! लेकिन जब कोई पड़ोसी 'करेन' बन जाए, यानी हर बात में टांग अड़ाए, तो बात अलग ही रंग लेती है। आज की कहानी है न्यूयॉर्क के क्वींस इलाके की, मगर यकीन मानिए, ऐसी घटनाएँ तो दिल्ली, मुंबई, या लखनऊ जैसे किसी भी शहर में आम हैं।
यह कहानी है 'M' नाम की एक महिला की, जिसे लोग प्यार से 'व्हाइट मार्बल करेन' बुलाने लगे। उसके नीचे बैंक था, ऊपर एक बुजुर्ग महिला। M को तो जैसे शांति से रहने का वरदान मिल गया था—कोई शोर-शराबा नहीं, कोई शिकायत नहीं। इसलिए उसने पूरे फ्लैट में चमचमाती सफेद मार्बल की फर्श सजा ली और सालों तक मजे से बिना दरी या कालीन के रही।
जब शांति टूटी: नए पड़ोसी, नई मुसीबत!
समय का पहिया घूमा। ऊपर रहने वाली बुजुर्ग महिला चल बसीं, और उनकी जगह एक नवविवाहित जोड़ा आ गया। अभी वे पूरी तरह शिफ्ट भी नहीं हुए थे कि M ने उनके खिलाफ शोर-शराबे की शिकायत ठोक दी। अजीब बात ये कि सुपरवाइजर ने जांच में पाया कि कई बार तो शिकायत तब आई, जब ऊपर वाला जोड़ा घर पर ही नहीं था! अब इसे कहते हैं "नाच न जाने आंगन टेढ़ा"।
उधर, नए जोड़े ने न सिर्फ कालीन का ऑर्डर दे रखा था, बल्कि कालीन आते ही उन्होंने M को खुद बुलाकर दिखाया भी—देखिए, हमने नियम मान लिए हैं। मगर M को तो बस बहस करने का बहाना चाहिए था। वह दीवार से दीवार तक कालीन की जिद पकड़ बैठी, जबकि बिल्डिंग के नियमों में बस 80% फर्श ढकना जरूरी था।
नियम का बूमरैंग: "जैसी करनी वैसी भरनी"
अब बिल्डिंग मैनेजर ने नए जोड़े को याद दिलाया—"भई, नियम सब पर बराबर लागू होते हैं। अगर ऊपर से शोर आता है, तो आप भी शिकायत कर सकते हैं।" जोड़े ने कहा—"ठीक है, अब हम भी ट्राई करते हैं!" और क्या था, शिकायत दर्ज हो गई।
30 दिन बीते, मगर M ने अपनी सफेद मार्बल की शान नहीं छोड़ी। अब बिल्डिंग के बायलॉज़ के मुताबिक, हर महीने $500 (यानि लगभग ₹40,000) का जुर्माना लगना शुरू हो गया। M ने लड़ने की खूब कोशिश की, पर जब जुर्माना $1500 (लगभग ₹1.25 लाख) तक जा पहुंचा, तो आखिरकार उसे भी कालीन बिछानी ही पड़ी।
पड़ोसी और इंसानियत: सबका अपना रंग
Reddit पर इस कहानी ने धूम मचा दी। एक कमेंट था—"अगर शुरुआत खुद ना करो, तो झेलना भी नहीं पड़ेगा!" (मतलब, 'जैसी करनी वैसी भरनी।') खुद कहानीकार ने भी मज़ाक में लिखा—"बिल्डिंग के बोर्ड मेंबर ने M से साफ-साफ कह दिया कि अगर तुम इतनी दिक्कत ना करती, तो तुम्हें ये दिन देखना नहीं पड़ता।"
एक और कमेंट में मजेदार बात कही गई—"अगर M को ऊपर वालों की आवाज़ से इतना ही दिक्कत थी, तो पेंटहाउस या अलग से घर ले लेती।" सच बात है, भारत में भी कई बार लोग अपनी आदतों के हिसाब से दूसरों को बदलने की कोशिश करते हैं, मगर जब नियम सब पर बराबर लागू हों, तो 'करेनगिरी' ज्यादा दिन नहीं चलती।
कुछ लोगों ने इस कहानी को इंसानियत की मिसाल भी बताया—"हर जगह लोग एक जैसे हैं, चाहे अमेरिका हो या इंडिया। पड़ोसियों की शिकायतें, छोटी-छोटी तकरारें, और फिर सबक मिलने की कहानियाँ हर गली-मोहल्ले में मिल जाएँगी।"
आज का सबक: निंदक नियरे राखिए?
हमारे देश में तो कबीर भी कह गए—"निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।" मगर आजकल के 'करेन' टाइप लोगों के लिए शायद कहना पड़े—निंदक को नियम का डंडा दिखाते रहिए, वरना सबका जीना हराम कर देंगे!
इस कहानी से यही सिखने को मिलता है कि जब आप दूसरों के लिए गड्ढा खोदते हैं, तो खुद भी उसमें गिर सकते हैं। नियमों का सहारा लेकर दूसरों को परेशान करना, आखिरकार खुद पर ही भारी पड़ सकता है। और सबसे जरूरी बात—पड़ोसियों के साथ थोड़ा सब्र और समझदारी दिखाएँ, तभी सोसाइटी या अपार्टमेंट में चैन से रहा जा सकता है।
क्या आपके साथ भी हुआ है ऐसा?
क्या आपके मोहल्ले या सोसाइटी में भी कभी किसी 'करेन' ने सबका जीना दूभर कर दिया? या फिर आपने खुद किसी पड़ोसी को नियमों के जाल में फँसते देखा है? अपने अनुभव नीचे कमेंट में जरूर शेयर करें—कौन जाने, अगली कहानी आपकी ही हो!
मूल रेडिट पोस्ट: White Marble Karen