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जब वर्कस्टेशन 'वर्क' करना ही भूल गया: एक टेक्निकल किस्सा स्टील फैक्ट्री से

एक पुराने पीसी कार्यस्थल की यादगार तस्वीर, जो स्टील मिल के माहौल में तकनीकी चुनौतियों की याद दिलाती है।
यह फोटो-यथार्थवादी छवि तकनीक के एक बीते जमाने की आत्मा को पकड़ती है, जो उस कार्यस्थल की कठिनाइयों और विशेषताओं को दर्शाती है, जो बड़े स्टील मिल में अपनी क्षमता को पूरा नहीं कर पाई।

तकनीकी सपोर्ट वाले लोग अक्सर सोचते हैं कि उनका दिन सामान्य ही गुज़रेगा—कोई कंप्यूटर नहीं चल रहा, नेटवर्क डाउन है, या प्रिंटर अटक गया। लेकिन कभी-कभी ऐसी घटनाएँ सामने आ जाती हैं कि आप चाहकर भी हँसी रोक नहीं पाते। आज की कहानी भी कुछ ऐसी ही है, जो एक स्टील मिल में घटी और आज तक चाय की प्याली के साथ चर्चा का विषय बनती रहती है।

आग, धुआँ और एक जली हुई मशीन: कहानी की शुरुआत

ये किस्सा है उस दौर का जब कंप्यूटर नए-नए आए थे और वर्कस्टेशन का मतलब था एक भारी-भरकम डेस्कटॉप, जिस पर ऑफिस का सारा बोझ टिका रहता था। एक दिन हमारे टेक्निकल सपोर्ट हीरो को फोन आता है—"सर, वर्कस्टेशन चल नहीं रहा। नेटवर्क में भी नहीं दिख रहा। बस, जल्दी आकर देख लीजिए।"

अब सोचिए, घंटा भर दूर स्टील मिल में जाना है, समस्या क्या है ये भी साफ़ नहीं बताया गया। हमारे भाई, जो दुकान में अकेले टेक्निकल थे, टूल्स-पुर्ज़े लेकर निकल लिए। मन में यही उम्मीद कि शायद कोई केबल हिल गई होगी, या नेटवर्किंग का कोई आसान फंडा होगा। लेकिन कहानी में ट्विस्ट तो अभी बाकी था।

वर्कस्टेशन या कबाड़खाना?

मिल पहुँचकर पूछताछ की तो एकदम फिल्मी सीन सामने आया—एक कोने में जंग लगा, ग्रीस से चिपचिपा ऑफिस, जिसमें दीवार से सटी एक टेबल पर लोहे और प्लास्टिक का पिघला हुआ ढेर पड़ा था। पीछे की दीवार पूरी तरह काली—जैसे किसी ने दीया-बाती नहीं, बल्कि बम फोड़ दिया हो। समझ आ गया—वर्कस्टेशन अब वर्क नहीं, बल्कि राख हो चुका है।

जिज्ञासा बढ़ी तो सवाल किए—"भाई, हुआ क्या?" पता चला, ऑफिस के दूसरी तरफ़ किसी ने वेल्डिंग मशीन (ब्लो टॉर्च) से दीवार काटने की ठानी। सोचा ऑफिस खाली है, काट दो। अब उन्हें क्या पता था कि दीवार के उस पार एक कंप्यूटर रखा है! बिजली के तार भी थे या नहीं, ये तो भगवान ही जाने, लेकिन दीवार और कंप्यूटर दोनों भस्म हो गए।

सच्चाई छुपाने की भारतीय जुगाड़ तकनीक

अब यहाँ मजेदार मोड़ आया—मिल वाले बोले, "भाई, नया वर्कस्टेशन लगा दो, बस रिपोर्ट में ये मत लिखना कि कैसे जला। लिख दो—नॉन-रिपेरेबल, वारंटी भी खत्म है।" ऑफिसर लोग न जान जाएँ, इसलिए सब गोलमोल जवाब। वैसे भी, अपने इंडिया में तो यही चलता है—"बॉस को न पता चले, जुगाड़ लगा लो।"

एक कमेंट में किसी ने बड़ा सही लिखा—"जब ग्राहक ज्यादा गोल-मोल बोले, समझ जाओ, दाल में कुछ काला है।" और एक और जनाब ने तो मजेदार जोक भी मारा—"जहाँ ट्रेन रुकती है, वो ट्रेन स्टेशन; जहाँ काम रुक जाए, वो वर्कस्टेशन!" अब ये डैड जोक्स भी टेक्निकल सपोर्ट वालों की मीटिंग का हिस्सा हैं।

सीख और हँसी: ओवरस्मार्ट बनना महँगा पड़ सकता है

किसी ने कमेंट में सही पकड़ा—"भैया, जब भी कोई ऐसी मशीन से काम करो जो काटती-फोड़ती है, तो देख लो पीछे क्या है। वरना न मशीन बचेगी, न दीवार!" यहाँ तो लगता है या तो बेवकूफी थी, या फिर जानबूझकर नया कंप्यूटर पाने का तरीका। किसी ने मजेदार अंदाज़ में कहा—"दोनों बातें सही हो सकती हैं!"

हमारे यहाँ दफ्तरों में अकसर होता है—कुछ गलती हो जाए, तो उसे छुपाने के लिए रिपोर्ट में मीठा-मीठा लिख दो। चाहे पंखा टूटे, कंप्यूटर जले या AC से धुआँ निकले—'डैमेज्ड बियोंड रिपेयर', और मैनेजमेंट को पता भी न चले। यही वजह है कि ऐसे किस्से सालों-साल मज़ाक का हिस्सा बने रहते हैं।

निष्कर्ष: आपके ऑफिस में भी ऐसे किस्से हैं?

इस कहानी से इतना तो समझ में आ गया कि टेक्निकल सपोर्ट वाले चाहे कितने भी स्मार्ट हों, कभी-कभी वर्कस्टेशन की जगह कबाड़ मिल जाता है! और हाँ, अगली बार जब कोई ऑफिस में बहुत गोलमोल बात करे, तो समझ जाइए—या तो गलती छुपा रहा है, या फिर नया जुगाड़ ढूंढ रहा है।

क्या आपके ऑफिस में भी ऐसी कोई मजेदार या अजीब टेक्निकल घटना घटी है? नीचे कमेंट में जरूर बताइए। और हाँ, अगली बार जब कंप्यूटर जल जाए, तो दीवार के पीछे जरूर देख लेना—कहीं कोई 'ब्लो टॉर्च' लेकर न घूम रहा हो!


मूल रेडिट पोस्ट: The workstation that doesn't work