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जब लंच मिस करवाया, तो बैज ने दिया जवाब – ऑफिस की छोटी बदले की बड़ी कहानी!

लंच ब्रेक के दौरान फ्रिज पर एक सहकर्मी का बैज पाकर निराश कार्यालय कर्मचारी का एनीमे चित्रण।
इस जीवंत एनीमे-शैली के चित्रण में, हम उस क्षण का अनुभव करते हैं जब हमारे नायक को एक स्वार्थी सहकर्मी द्वारा छोड़ा गया बैज मिलता है, जो पहले छूटे लंच ब्रेक की याद दिलाता है। ऑफिस में काम और लंच के बीच संतुलन बनाने की जद्दोजहद को फिर से जीएं!

ऑफिस की ज़िंदगी में हर किसी को कभी न कभी ऐसा सहकर्मी जरूर मिलता है, जो काम में टांग अड़ाने या अपना उल्लू सीधा करने में माहिर होता है। कभी-कभी तो लगता है जैसे ये लोग जानबूझकर दूसरों का दिमाग खराब करने के मिशन पर लगे हों! ऐसे में दिल में गुस्सा तो आता ही है, लेकिन हर बार सीधा बदला लेना भी ठीक नहीं। आज हम आपके लिए लाए हैं एक ऐसी कहानी, जिसमें नायक ने अपने ऑफिस के ‘कुटिल’ साथी को बहुत ही मज़ेदार और ‘छोटी बदला’ (petty revenge) के अंदाज़ में सबक सिखाया।

बैज की जादुई छड़ी और लंच की जंग

यह किस्सा Reddit पर u/RRtexian नाम के यूजर ने साझा किया। कहानी कुछ साल पुरानी है, लेकिन मज़ा आज भी वैसा ही है। हुआ यूं कि लेखक के ऑफिस में एक सहकर्मी था, जो जब भी काम का ढेर लगता, सबसे पहले लंच ब्रेक मार देता। मतलब, काम का बोझ दूसरों पर और मज़े का टाइम उसके लिए! कई बार तो लेखक को अपना लंच तक छोड़ना पड़ता। अब भला ये भी कोई इंसानियत है?

एक दिन जब लेखक लंच के लिए टाइम मशीन… माफ़ कीजिए, ‘क्लॉक आउट’ करने गया, तो उसकी नजर फ्रिज के ऊपर रखे अपने साथी के Kronos बैज पर पड़ी। साथ में कुछ मैग्नेटिक कैलेंडर भी रखे थे। लेखक के मन में वही बात आई – “कर भला तो हो भला, लेकिन आज थोड़ा बदला ले ही लें!”

चुंबक का खेल – ‘जरा सी शरारत, भरपूर मज़ा’

अब हुआ ये कि Kronos बैज में चुंबकीय पट्टी (magnetic strip) होती है, जो डेटा स्टोर करती है। लेखक ने अपने साथी के बैज को वहीं रखे मैग्नेट से रगड़ दिया। बस, बैज की सिट्टी-पिट्टी गुल! अगले दिन वो सहकर्मी चौंक गया – “मेरा बैज काम क्यों नहीं कर रहा?” HR के चक्कर लगाने पड़े, और सुनने में आया कि उसे अपना लंच ब्रेक भी इसी काम में झोंकना पड़ा।

सोचिए, जो हमेशा दूसरों का लंच बिगाड़ता था, अब खुद अपने लंच में HR के चक्कर लगा रहा था! और मज़ेदार बात – यही खेल तीन बार चला! आखिर उस सहकर्मी को समझ आ ही गया कि बैज हमेशा फ्रिज पर छोड़ना ‘लकी’ नहीं है। सही कहते हैं, “जैसी करनी, वैसी भरनी।”

ऑफिस में ऐसी ‘माइक्रो बदला’ क्यों कारगर है?

हमारे देसी ऑफिसों में भी ऐसा बहुत होता है – कोई कामचोरी करता है, कोई लंच के नाम पर गायब, कोई पैंतरेबाज़ी में माहिर। लेकिन हर बार खुलकर लड़ाई करना न तो अच्छा लगता है, न ही माहौल के लिए सही है। Reddit के एक कमेंटेटर ने कहा, “तुम तो बहुत शरीफ हो, मैं होता तो बैज को डस्टबिन में डाल देता!” वहीं एक और ने चुटकी ली – “तीन बार बैज गायब हुआ, फिर भी सबक नहीं सीखा... धीमे दिमाग वाला था शायद!”

ऐसे मामलों में, हमारी संस्कृति में भी एक कहावत है – “नजर हटी, दुर्घटना घटी।” कई बार चुपचाप, हल्के-फुल्के अंदाज़ में की गई शरारत, सामने वाले को ज़िंदगी भर याद रहती है। एक और कमेंट में किसी ने पुराने फ्लॉपी डिस्क की याद दिलाई, जो ऑफिस में हर रोज़ मैग्नेट के पास रखने से खराब हो जाती थी। ऑफिस की इन छोटी-छोटी चालाकियों में भी अपनी अलग ही दुनिया है!

टेक्नोलॉजी और देसी जुगाड़ – कुछ बातें हमारे दिल से

ऑफिस की ये कहानी हमें बताती है कि तकनीक कभी-कभी जुगाड़ू लोगों के आगे बेबस हो जाती है। हमारे यहां तो लोग आईकार्ड को पहचान पत्र की तरह गले में डालकर घूमते हैं, और कई बार तो चाय की दुकान पर भी टांग आते हैं! Kronos बैज या मैग्नेटिक स्ट्रिप हमारे यहां के स्मार्ट कार्ड, ऑफिस एंट्री कार्ड की तरह है। अगर आप भी कभी ऐसे साथी से परेशान हों, तो याद रखिए – सीधी लड़ाई से बेहतर है, थोड़ा दिमाग लगाना। जैसे एक कमेंट ने कहा, “मस्ती मैग्नेटाइज्ड – शरारत भी, सीख भी!”

एक मज़ेदार कमेंट में किसी ने बताया कि उनके ऑफिस में तो एक बार किसी ने अपने बैज को माइक्रोवेव में डाल दिया – फिर तो HR के पास घंटों लाइन! हमारे यहां भी कई बार ऐसा होता है कि लोग कार्ड को मोबाइल के पीछे रख लेते हैं, और फिर शिकायत करते हैं – “भाई, ये चालू क्यों नहीं हो रहा?”

निष्कर्ष – आपकी भी कोई ‘चोटी बदला’ कहानी है?

तो दोस्तों, इस कहानी से एक बात तय है – ऑफिस में मज़ाक और बदले की दुनिया बड़ी रंगीन है। कभी-कभी छोटी सी शरारत, बड़े सबक सिखा देती है। और याद रखिए, “जो दूसरों का लंच बिगाड़ेगा, उसका लंच भी एक दिन HR में ही बीतेगा!”

अब आपकी बारी – क्या आपके ऑफिस में भी कभी किसी ने ऐसा कोई जुगाड़ या बदला लिया है? या आपने किसी चालाक सहकर्मी को अनोखे अंदाज में सबक सिखाया हो? अपनी कहानी नीचे कमेंट में जरूर साझा करें। क्योंकि असली मज़ा तो यारों, इन्हीं देसी दांव-पेंचों में है!


मूल रेडिट पोस्ट: Make me miss lunch?..