जब लाइब्रेरी की काग़ज़ी पर्चियों ने सबकी पढ़ाई रोक दी!
अगर आप कभी सरकारी दफ्तर या लाइब्रेरी गए हैं, तो आपको पता होगा कि वहाँ नियम-कायदे कैसे अचानक बदल सकते हैं। कभी-कभी ऊपर से आए हुक्म इतने अजीब होते हैं कि समझ ही नहीं आता – हँसा जाए या सिर पीट लिया जाए! आज की कहानी भी कुछ ऐसी ही है, जिसमें एक साधारण-सी लाइब्रेरी में आई एक “शानदार” नई नीति ने सबको नाकों चने चबवा दिए।
एक "उत्तम" आदेश, और उसकी ग़ज़ब परिणीति
कहानी है एक पब्लिक लाइब्रेरी की, जहाँ रोज़ का कामकाज शांति से चलता था। लेकिन अचानक ऊपर से एक चमचमाता ‘accountability memo’ आया – “हर एक किताब या सामान के चेकआउट पर अनिवार्य रूप से छपी हुई रसीद देनी ही होगी। चाहे सामने वाला बोले ‘नहीं चाहिए’, फिर भी प्रिंट करो, और अगर कोई मना कर दे तो पेपर खुद रिसायक्लिंग में डाल दो – audit के लिए!” इमेल पढ़कर सब कर्मचारियों ने वही किया, जो एक आम भारतीय कर्मचारी करता – आँखें घुमाईं, मन में बड़बड़ाए, और फिर सोचा, चलो जैसी हुक्म वैसे हम!
अब क्या था, जैसे ही शनिवार आया, लाइब्रेरी में लाइन दर लाइन लग गई – बच्चे, बुजुर्ग, माता-पिता, हाथ में किताबें और खिलौने लिए सब। हर बार चेकआउट पर रसीद छापी जा रही थी, चाहे सामने वाला बोले “भैया, रहने दो!” नीति में लिखा था – डेट हाईलाइट करो, सामने से तारीख़ बोलकर कन्फर्म करो। तो कर्मचारी वही करते रहे – धीरे-धीरे, एक-एक व्यक्ति को पूरी प्रक्रिया समझाते, रसीद छापते, डेट मार्कर से रंगते, स्टेपल करते, डुप्लीकेट कॉपी ‘ऑडिट ट्रे’ में डालते। एक भाईसाहब तो 47 किताबें ले गए – वहाँ तो पूरी रसीद ही दो पन्नों में छप गई!
नीति के परिणाम – “काग़ज़ का पहाड़, पढ़ाई ठप्प!”
धीरे-धीरे काग़ज़ के रोल खत्म होने लगे। प्रिंटर के काग़ज़ में लाल पट्टी आई – जैसे भारतीय घरों में गैस सिलिंडर खत्म होने के पहले की हल्की सी आवाज़! फिर भी नियम तो नियम, सब चलता रहा। जब काग़ज़ खत्म हुआ, तो कंप्यूटर ने चेकआउट रोक दिया – “पहले रसीद छापो, तभी आगे बढ़ो!” अब सोचिए, इतने सारे लोग लाइन में खड़े, बच्चे रो रहे, बड़ों की झुंझलाहट, और लाइब्रेरी का काम मुकम्मल ठप! बच्चों की स्टोरीटाइम कैंसिल करनी पड़ी, “होल्ड” शेल्फ किताबों से भर गई, और किसी ने तो शहर के ऑफिस में शिकायत भी कर डाली – “आधे घंटे गाड़ी चलाकर आया था, किताब नहीं मिल पाई क्योंकि प्रिंटर में काग़ज़ नहीं था!”
सोमवार को ऊपर से नया ईमेल आया – “अब रसीद देना वैकल्पिक कर दिया गया है, कृपया काग़ज़ की बर्बादी का ध्यान रखें।” कर्मचारी ने पुराना ‘memo’ संभाल कर अपनी दराज में रख लिया – कहीं फिर वही कहानी न दोहराई जाए!
"ऊपरवाले" और ज़मीन की हकीकत – जनता की राय
इस पूरी घटना पर Reddit कम्युनिटी ने खूब मजेदार और तीखी प्रतिक्रियाएँ दीं। एक यूज़र ने लिखा, “ऐसे नियम वही बनाते हैं, जिन्होंने कभी ग्राउंड लेवल पर काम ही नहीं किया।” क्या हमारे सरकारी दफ्तरों में भी कुछ ऐसा ही नहीं होता? बड़े साहब लोग एयर कंडीशनर में बैठकर नियम बना देते हैं, जबकि असली परेशानी तो कर्मचारियों और जनता को होती है!
एक और कमेंट था – “ऊपरवाले बस यह दिखाना चाहते हैं कि देखो, हमने तो निर्देश दे दिए, अब जो भी गड़बड़ी हो, हमारी जिम्मेदारी नहीं।” यह बात सुनकर तो कईयों को अपने ऑफिस के ‘मैनेजमेंट’ की याद आ गई, जहाँ हर छोटी-बड़ी गड़बड़ी का ठीकरा नीचे वालों के सिर फोड़ दिया जाता है।
किसी ने मज़ाक में लिखा – “काग़ज़ की रसीदें किताबों से तेज़ी से उड़ गईं!” तो किसी ने यह भी पूछा, “इतनी भीड़ लाइब्रेरी में देखी नहीं कभी!” जिस पर कई लाइब्रेरी कर्मचारी बोले, “हमारे यहाँ तो हर हफ्ते लाइन बाहर तक जाती है – यहाँ पढ़ाई मुफ्त है, बच्चों की भीड़ लगी रहती है।”
एक और मजेदार बात, एक यूज़र ने पूछा – “क्या आपके यहाँ सेल्फ-चेकआउट मशीन नहीं है?” किसी ने जवाब दिया – “मेरे शहर की लाइब्रेरी में तो RFID टैग लगे हैं, किताबें चट से स्कैन हो जाती हैं!” यह सुनकर भारतीय पाठकों को शायद अपने मोहल्ले की लाइब्रेरी याद आ जाए, जहाँ अब भी रजिस्टर में हाथ से नाम-गिनती लिखी जाती है!
सीख – काग़ज़ी घोड़े दौड़ाओ, मगर ज़मीनी हकीकत मत भूलो
इस कहानी से हमें एक बड़ी सीख मिलती है – चाहे ऑफिस हो, लाइब्रेरी हो या कोई भी संस्था, नियम बनाते वक्त ज़मीनी सच्चाई और आम लोगों की परेशानियों का ध्यान रखना चाहिए। वरना, ऊपर से आए “शानदार” आदेश न सिर्फ काग़ज़ की बर्बादी करते हैं, बल्कि जनता की सुविधा और कर्मचारियों की मेहनत पर भी पानी फेर देते हैं। जैसा कि एक कमेंट में कहा गया – “मैनेजमेंट में वही लोग होने चाहिए, जिन्होंने खुद कभी ग्राउंड लेवल पर काम किया हो, तभी ऐसी बेवकूफी कम होगी।”
अंत में, लाइब्रेरी कर्मचारी की चतुराई भी काबिले तारीफ है – उसने नियम का अक्षरशः पालन किया, ताकि बाद में कोई कह न सके कि आपने अपनी तरफ से छूट दी थी। और जब नीति बदली, तो उसने वो ‘memo’ सबूत के तौर पर संभाल कर रख लिया – एकदम देसी अंदाज में, “कल को पूछो तो दिखा देंगे!”
आपकी राय क्या है?
क्या आपके साथ कभी ऑफिस या लाइब्रेरी में ऐसी कोई काग़ज़ी परेशानी हुई है? या कभी बिना सोचे-समझे बनाए गए नियमों का खामियाजा भुगतना पड़ा हो? नीचे कमेंट में ज़रूर लिखिए, और अगर यह कहानी आपको पसंद आई हो तो दोस्तों के साथ शेयर करना न भूलें – आखिर, हँसी और सीख दोनों बांटने से ही बढ़ती है!
मूल रेडिट पोस्ट: The memo said we must give a printed receipt for EVERY library checkout, so I did, until we ran out of paper