जब मशीनिस्ट ने बॉस के आदेश की ऐसी तैसी कर दी – ‘पेंटिंग’ का झोलाछाप कमाल!
जब ऑफिस या फैक्ट्री में काम करने वाले कर्मचारियों को उनकी असली योग्यता से अलग कोई बेमतलब का काम सौंप दिया जाता है, तब कई बार उनकी क्रिएटिविटी के नए रंग देखने को मिलते हैं। हमारा देसी दिमाग ऐसे मौकों पर जो ‘जुगाड़’ करता है, वो बॉस की भी बोलती बंद कर देता है। आज की कहानी भी कुछ ऐसी ही है – एक ऐसे मशीनिस्ट की, जिसने सरकारी ठेके वाली फैक्ट्री में बॉस के हुक्म पर ऐसा काम किया कि पूरी टीम आज भी याद करती है!
बॉस का फरमान: "पेंटिंग करनी है, तो करनी है!"
ये किस्सा सत्तर-अस्सी के दशक का है, जब न्यूयॉर्क के एक बड़े मिलिट्री कॉन्ट्रैक्ट वाले कारखाने में हमारे नायक के चाचा और पिताजी, दोनों बतौर मशीनिस्ट काम करते थे। मशीनिस्ट यानी वे लोग जो भारी-भरकम मशीनों को चलाते, सुधारते और उन्हें दुरुस्त रखते हैं।
एक दिन, उनके सुपरवाइजर ने देखा कि एक पुराना बैंड सॉ (लकड़ी काटने की मशीन) देखने में बड़ा बदरंग और जर्जर हो गया है। बॉस ने तुरंत आदेश दे दिया – “इसे पेंट करो!” अब हमारे चाचा ने साफ कह दिया, “मुझे पेंटिंग नहीं आती, कोई और करवाओ।” लेकिन बॉस जिद पर अड़ा रहा, “पेंटिंग करनी है तो करनी है, वरना...”
अब क्या था, चाचा ने सोचा – जब पेंटिंग का हुक्म मिला है, तो ऐसे करेंगे कि फिर कभी न कहे!
‘मालिशियस कंप्लायंस’ – आज्ञा पालन का देसी तड़का
पश्चिमी देशों में एक शब्द बहुत चलता है – ‘malicious compliance’, यानी आदेश का पालन करना, पर इतनी ईमानदारी से कि देने वाले को ही पछतावा हो जाए। ये ठीक वैसा है जैसे कोई टीचर बार-बार होमवर्क पूछे और छात्र पूरे स्कूल को ही कॉपी में उतार दे!
चाचा ने भी बैंड सॉ की ऐसी पेंटिंग की कि सब दंग रह गए। पूरे मनोयोग से, जितनी भी सतहें थीं – मशीन का ब्लेड, कंट्रोल नॉब्स, पावर कॉर्ड – सब कुछ रंग दिया। अब भी मन नहीं भरा तो डिब्बे में बचा पेंट पूरी मशीन पर उड़ेल दिया। पेंट बहता रहा, टपकता रहा, और मशीन देखकर लग रहा था जैसे किसी बच्चे ने दीवार पर रंग बरसाया हो।
बॉस की बोलती बंद – "मैंने पहले ही कहा था!"
अगली रात, सुपरवाइजर ने मशीन देखी तो माथा पकड़ लिया। बुलाया ऑफिस में और पूछा – “ये क्या किया?” चाचा ने बड़े मासूमियत से कहा, “मैंने पहले ही बोला था मुझे पेंटिंग नहीं आती, किसी और से करवाते तो अच्छा होता।”
इस घटना के बाद, चाचा की फाइल में खास नोट लग गया – "इनसे कोई पेंटिंग का काम न करवाया जाए!"
कम्युनिटी के किस्से – हर जगह है 'जुगाड़'
रेडिट पर इस कहानी के नीचे कई लोगों ने अपने-अपने अनुभव साझा किए। एक यूज़र ने लिखा कि आर्मी में उनसे कॉफी बनाने को कहा गया, जबकि वे खुद कॉफी पीते ही नहीं थे। जबरदस्ती पर उन्होंने भी एक बार बहुत ही हल्की कॉफी बनाई, फिर जब डांट पड़ी तो पूरा डिब्बा डालकर ऐसी कड़क कॉफी बनाई कि सबकी बोलती बंद! आगे से किसी ने उनसे कॉफी बनवाने की जुर्रत नहीं की।
एक और मजेदार कमेंट में किसी ने बताया, "हमसे एक बार पूरी वर्कशॉप पेंट करवाने को कहा गया, हमने सब कुछ – वाल्व, डोर नॉब, नामप्लेट, लाइट स्विच – सब पर पेंट चढ़ा दिया। बस फायर अलार्म छोड़ दिया, क्योंकि उस पर 'पेंट न करें' का स्टीकर था!"
इन सारे किस्सों में एक बात कॉमन थी – जब इंसान को अपनी मर्जी के खिलाफ अजीब काम करने को मजबूर किया जाता है, तो वो या तो ‘हथियारबंद अयोग्यता’ (weaponized incompetence) दिखाता है या ‘जुगाड़’ से सबक सिखा देता है।
देसी दफ्तरों में भी कम नहीं है जुगाड़
अगर आप कभी सरकारी दफ्तर या फैक्ट्री में गए हों, तो ऐसे किस्से खूब मिलेंगे। कोई बाबू बार-बार फाइल इधर-उधर घुमाकर बॉस को परेशान करता है, कोई चायवाला जानबूझकर फीकी या कड़क चाय बनाकर बॉस की शिकायत से बच जाता है।
हमारे देश में भी अक्सर ऐसे मौके आते हैं जब कर्मचारी ‘कलात्मक’ तरीके से आदेश का पालन करते हैं – ताकि आगे से वो काम फिर कभी न मिले! आखिर, हर जगह का ‘मालिशियस कंप्लायंस’ अपने-अपने अंदाज में चलता है।
निष्कर्ष – क्या कभी आप भी ऐसे जुगाड़ू बने हैं?
तो दोस्तों, इस कहानी से एक बात तो साफ है – काम चाहे सरकारी हो या प्राइवेट, बॉस की जिद और कर्मचारी का जुगाड़ कभी खत्म नहीं होंगे। क्या आपके साथ भी ऐसा कोई वाकया हुआ है, जब आपने अपनी ‘मालिशियस कंप्लायंस’ से बॉस या सहकर्मियों को हैरान कर दिया हो? अपने दिलचस्प अनुभव हमें कमेंट में जरूर बताएं!
और अगर अगली बार कोई आपसे आपकी पसंद के बाहर कोई काम करवाने की जिद करे, तो जरा सोचिए – आखिर ‘रचनात्मक आज्ञा पालन’ का असली मजा क्या है!
मूल रेडिट पोस्ट: I'm not a painter, but you want me to paint some equipment. Ok!