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जब मैंने खुद को ही ऑफिस में सौंप दिया – टेक्नोलॉजी की अद्भुत नौकरशाही

सॉफ़्टवेयर परियोजनाओं पर सहयोग करते देवऑप्स टीम, टीमवर्क और तकनीक का प्रदर्शन करते हुए।
एक फोटोरियलिस्टिक चित्रण में समर्पित देवऑप्स टीम को एक साथ काम करते हुए दर्शाया गया है, जो आज के तकनीकी परिदृश्य में सॉफ़्टवेयर विकास और समर्थन की निर्बाध एकीकरण को दर्शाता है।

अगर आपने कभी सरकारी दफ्तरों या बड़ी कंपनियों के चक्कर लगाए हैं, तो आपको पता ही होगा कि वहाँ कागज़ी कार्यवाही (पेपरवर्क) और मीटिंग्स का क्या हाल होता है। अब ज़रा सोचिए, अगर वही नौकरशाही टेक्नोलॉजी की दुनिया में आ जाए, तो क्या होगा? आज हम आपको सुनाने जा रहे हैं एक ऐसे DevOps इंजीनियर की असली कहानी, जिसने अपने ही ऑफिस में खुद को ही खुद के हवाले कर दिया – और वो भी पूरी सलामी के साथ!

ऑफिस की नौकरशाही - सॉफ्टवेयर के संग

कहानी शुरू होती है एक छोटे से DevOps टीम के इंजीनियर से, जो सॉफ्टवेयर लिखते भी हैं, उसे सपोर्ट भी करते हैं और कंपनियों के लिए उसे कस्टमाइज़ भी करते हैं। यही नहीं, उनकी कंपनी का एक पूरा प्रोडक्ट्स का झुंड है, जो एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं – बिलकुल वैसे ही जैसे हमारे यहां सरकारी फाइलें एक मेज से दूसरी मेज होती घूमती रहती हैं।

अब एक ग्राहक कंपनी दो हिस्सों में बंट रही थी, तो जाहिर है सारा सॉफ्टवेयर भी नए माहौल में सेटअप करना था। काम बहुत बड़ा था, लेकिन हमारे इंजीनियर साहब ने अपना हिस्सा तो टाइम से पहले ही निपटा दिया। बस, अब बाकी टीमों से कुछ डेटा और जानकारी का इंतज़ार था।

मीटिंग का बुलावा, और "अचानक" सौंपने की रस्म

एक दिन देर शाम, एक अनजान नाम से मीटिंग का न्योता आ गया – अगले दिन सुबह-सुबह "हैंडओवर" के नाम पर। लेकिन हमारे इंजीनियर को पता था कि काम अभी अधूरा है, क्योंकि जरूरी जानकारी तो मिली ही नहीं थी। और वैसे भी, उस वक्त उनकी छुट्टी बुक थी – इसलिए मीटिंग रिजेक्ट कर दी।

लंच के बाद आते ही देखा, इनबॉक्स में एक "बहुत जरूरी" ईमेल पड़ा है – उसी अदृश्य आदमी का, जिसमें लिखा था कि "आज शाम तक" कोई रहस्यमयी "हैंडओवर डॉक्युमेंट" भरना है। न उसमें यह लिखा था कि उसमें डालना क्या है, न ये कि किसके लिए है, न ये कि सौंपना किसे है! जब इंजीनियर ने सवाल पूछे, तो घंटा भर कोई जवाब नहीं मिला – और फिर अचानक ईमेल-चक्रवात आ गया। हर किसी को CC में डालकर, प्रोजेक्ट मैनेजर आपस में ही लड़ने लगे – लेकिन किसी के पास असली जवाब नहीं।

आखिरकार, किसी ने 3 बजे मीटिंग रख दी – सुलझाने के नाम पर।

खुद को ही खुद के हवाले: "हैंडओवर" का करिश्मा

मीटिंग में इंजीनियर साहब अकेले अपनी कंपनी की तरफ से थे, बाकी सब ग्राहक कंपनी के। उन्होंने वही पुराने सवाल दोहराए – आखिर यह डॉक्यूमेंट है किसके लिए? तभी पता चला, इस प्रोजेक्ट में "माइग्रेशन टीम" और "एप्स मैनेजमेंट टीम" नाम की दो टीमें हैं, जिनका हमारे इंजीनियर ने नाम तक नहीं सुना था! एक मैनेजर बोले, "आपको ऐप हैंडओवर करना है", दूसरे बोले, "नहीं, आपको ऐप लेना है" – यानी खुद को ही खुद से सौंपना है!

इंजीनियर ने सीधा सवाल दागा, "आपको लगता है मैं किस टीम में हूँ?" दोनों तरफ से जवाब – मतलब, वो दोनों टीमों में गिने जा रहे थे! दरअसल, पूरी माइग्रेशन में उनके ऐप का जिम्मा सिर्फ उन्हीं के पास था – यानी, खुद ही देने वाले, खुद ही लेने वाले!

फिर क्या, उन्होंने कैमरा ऑन किया, अपनी ही हथेली मिलाई और बोला, "हैंडओवर कंप्लीट!" सबने हँसते हुए स्वीकार भी कर लिया। और आखिर में, कागज़ी खानापूर्ति के लिए दस मिनट में डॉक्यूमेंट भी बना डाला!

कम्युनिटी की राय: नौकरशाही पर कटाक्ष और हँसी मज़ाक

Reddit की इस कहानी पर लोगों ने खूब मज़े लिए। एक ने पूछा, "क्या आपने वो डॉक्यूमेंट पढ़ा? क्या वो काम का था?" इंजीनियर ने हँसते हुए जवाब दिया, "आगे भी कई बार रेफर करूंगा, लेकिन कंटेंट के लिए नहीं!" एक और कमेंट आया, "क्या आपको दो सैलरी मिलेगी?" – भाई, जब दो टीमों में नाम था तो सवाल वाजिब है!

एक यूज़र ने लिखा, "कभी-कभी क्लाइंट खुद आपस में लड़ते रहते हैं, और हमें बस सुनते रहना पड़ता है।" ये तो हमारे यहाँ की मीटिंग्स में भी खूब होता है – एजेंडा क्या है, कोई नहीं जानता, लेकिन "बहुत जरूरी" मीटिंग बुला लेते हैं!

किसी ने मज़ाक में कहा, "अगर शुरू में साफ-साफ ईमेल लिख देते, तो सबका वक्त बच जाता।" यही तो सच है – कई बार एक लाइन की जानकारी में पूरा दिन बर्बाद हो जाता है।

और सबसे मजेदार बात – एक ने कहा, "ब्यूरोक्रेसी में अगर किसी को गली-गली के रास्ते पता हों, तो वो सोने के भाव का है!" हमारे यहाँ तो ऐसे लोगों को चाय-पकौड़े के साथ मनाया जाता है – प्रोजेक्ट खत्म हो जाए तो मिठाई भी बंटती है!

निष्कर्ष: नौकरशाही और टेक्नोलॉजी – मजेदार संगम!

इस कहानी से यही सीख मिलती है कि चाहे तकनीक कितनी भी आधुनिक हो जाए, अगर कागज़ी कार्यवाही और नौकरशाही का जादू चल जाए, तो सबसे मजेदार किस्से वहीँ से निकलते हैं! अगर आप भी कभी ऐसी मीटिंग में फँस जाएँ, तो याद रखिए – कभी-कभी खुद को ही खुद के हवाले करने में ही भलाई है!

आपके ऑफिस में भी कभी ऐसा कोई "हैंडओवर" हुआ है? या कोई और मजेदार कागज़ी झंझट? नीचे कमेंट में जरूर लिखिए! और अगर ये कहानी पसंद आई हो, तो दोस्तों के साथ शेयर करें – क्या पता, अगली बार वो भी खुद को खुद को सौंपते दिखाई दें!


मूल रेडिट पोस्ट: The Handoff