जब मैनेजर ने कंपनी की नासमझी को 'मालिशियस कंप्लायंस' से सबक सिखाया
कहते हैं, "अक्ल बड़ी या भैंस?" ऑफिसों में तो अक्सर यही सवाल घूमता रहता है। बड़े-बड़े मैनेजर जब सिर्फ कागज़ों और एक्सेल शीट्स पर फैसले लेते हैं, तो ज़मीन की सच्चाई कुछ और ही होती है। आज की कहानी एक ऐसे अनुभवी प्रोग्रामर और मैनेजर की है, जिसने कंपनी के ऊल-जुलूल फैसले का जवाब अपनी ही स्टाइल में दिया – और वो भी कंपनी को सबक सिखाते हुए, सैलरी बढ़वाते हुए!
जब अनुभव को नज़रअंदाज़ किया गया
हमारे नायक एक अमेरिकी सॉफ्टवेयर कंपनी में मैनेजर और प्रोग्रामर थे। मतलब, एक साथ प्रोजेक्ट्स, टाइमलाइन, टीम की दिक्कतें – सब कुछ संभालते थे। एक दिन कंपनी ने बड़ा फैसला लिया – अमेरिका और यूके (UK) की प्रोग्रामिंग टीमें एक साथ कर दो, और अब सिर्फ यूके के मैनेजर्स ही अमेरिका की टीम को संभालेंगे।
अब आप सोचिए, अमेरिका और यूके में 6 घंटे का टाइम डिफरेंस! यूके वाले जब चाय पीते-पीते घर जा रहे होते, तब अमेरिका वाले अपने ऑफिस में गर्मागरम कोडिंग कर रहे होते। ऐसे में, जब टीम के लोगों को कोई दिक्कत आती, तो या तो अगले दिन तक इंतजार करें या पुराने मैनेजर (हमारे नायक) के पास जाएं, जो तुरंत हल बता सकते थे।
लेकिन नई व्यवस्था में यूके के मैनेजर्स की नाक में दम आ गया – “अरे! ये सब अब भी पुराने मैनेजर से क्यों पूछ रहे हैं?” शिकायत ऊपर पहुंची और आदेश आया – “अबसे टीम के सवालों का जवाब मत दो!”
'मालिशियस कंप्लायंस' – जब आदेश ही हथियार बन गया
यहां से शुरू हुआ असली खेल, जिसे अंग्रेज़ी में कहते हैं “Malicious Compliance” – यानी नियमों का पालन ऐसे करो कि आदेश देने वाले को ही पछतावा हो जाए!
हमारे नायक ने मुस्कराकर टीम को कह दिया, “मुझे मना किया गया है, अब तुम्हें यूके के मैनेजर से ही सवाल पूछने हैं – चाहे जवाब कल मिले या परसों।” टीम को भी समझ आ गया, और उन्होंने यूके मैनेजर्स की इनबॉक्स ऐसे भर दी जैसे सावन में बादल दिल्ली की सड़कों को भर देते हैं – हर छोटी-बड़ी दिक्कत, ट्रेनिंग, प्रोजेक्ट की अड़चन – सब कुछ ईमेल में उड़ेल दिया।
नतीजा? डेडलाइन मिस, प्रोजेक्ट लेट, और यूके के मैनेजरों का सिर पकड़ना – आखिरकार सीनियर मैनेजमेंट को समझ आ गया कि “टाइम ज़ोन” कोई मज़ाक नहीं, और लोकल मैनेजर की ज़रूरत मज़बूरी है।
कम्युनिटी की प्रतिक्रिया – 'बिल्कुल हमारे ऑफिस जैसी कहानी!'
रेडिट पर इस किस्से ने धूम मचा दी। एक यूज़र ने लिखा – “वाह! आपने तो कंपनी को अपनी गलती समझाने के लिए बढ़िया तरीका निकाला, और सैलरी भी बढ़वा ली – ये तो मास्टरस्ट्रोक है!”
एक और यूज़र ने मज़ेदार अंदाज में कहा, “मैनेजरों को लगता है कि एक्सेल शीट से सब कुछ मैनेज हो जाएगा, लेकिन ज़मीन पर जो लोग काम कर रहे हैं, उनकी सुनो, तो दिक्कतें आधी हो जाएंगी।”
एक साहब बोले, “अरे, हमारे यहां भी इंडिया और यूरोप की टीमों में यही हाल है – जब तक लोकल मैनेजर ना हो, काम अटकता ही है।”
यहां तक कि खुद लेखक ने भी माना – “कंपनी ग्लोबल थी, फिर भी टाइम ज़ोन की बेसिक समस्या को समझने में सबको हफ्तों लग गए!”
सीख – हर बदलाव अच्छा नहीं, ज़रा सोच-समझ कर!
इस किस्से से हमें क्या सिखने को मिलता है? 1. जब तक किसी सिस्टम/व्यवस्था की असली वजह ना समझो, उसमें बदलाव मत करो। (ये वही Chesterton’s Fence वाली बात है – बिना मतलब बाड़ मत तोड़ो!) 2. “टाइम ज़ोन” कोई छोटा मुद्दा नहीं है – ऑफिस में अगर वक्त पर फैसला लेना है, तो लोकल मैनेजर ज़रूरी है। 3. कर्मचारी अगर फ्री में सलाह दे रहे हैं, तो सुन लीजिए – वरना बाद में पछताना पड़ सकता है। 4. और सबसे अहम – दिमाग लगाकर, थोड़ा सा नाटकीय अंदाज अपनाकर, आप कंपनी को उसकी भूल का एहसास करा सकते हैं… और सैलरी भी बढ़वा सकते हैं!
अंत में – आपकी राय क्या है?
तो दोस्तो, क्या आपके ऑफिस में भी कभी ऐसे 'ऊपर से आए' फरमानों ने काम की बैंड बजाई है? या कभी आपने किसी 'मालिशियस कंप्लायंस' का तड़का लगाया है? नीचे कमेंट में अपनी कहानी ज़रूर साझा करें।
और हां, अगली बार जब बॉस कोई अजीब सा आदेश दे, तो ये कहानी याद रखिएगा – हो सकता है, आपके पास भी कोई 'मास्टरस्ट्रोक' हो!
मूल रेडिट पोस्ट: OK - I won't answer my old staff's questions and help them ...