जब मैनेजर की हटधर्मी ने बढ़ाया बर्तन धोने का बिल – एक मज़ेदार कहानी
कभी-कभी दफ्तर या दुकान के नियम इतने अजीब होते हैं कि लगता है, "भैया, ये बना कौन रहा है?" आज की कहानी भी कुछ ऐसी ही है – एक टीचर, जो बच्चों को पढ़ाने के बाद शाम को एरिज़ोना के एक ग्रोसरी स्टोर के डेली डिपार्टमेंट में बर्तन धोता है, वहां के मैनेजमेंट की समझदारी (या कहें बेवकूफी) पर हँसी भी आती है और गुस्सा भी। सोचिए, अगर आपको बस इसलिए बर्तन नहीं धोने दिए जाएं क्योंकि किसी ग्राहक को घंटी बजाना बुरा लग रहा है... फिर क्या होता है?
नियमों का खेल: ग्राहक की घंटी और मैनेजमेंट की टेंशन
अब कहानी शुरू होती है उस टीचर की, जो दिन में चौथी क्लास के बच्चों को पढ़ाता है और शाम को 'आपके अपने मोहल्ले के ग्रोसरी स्टोर' में डेली सेक्शन में काम करता है। रोज़ का काम—झाड़ू-पोछा, चाय-सूप संभालना, हॉट केस की सफ़ाई और सबसे बड़ा सिरदर्द—बर्तन धोना! भाईसाहब ने एक सिस्टम बना लिया था कि जैसे-जैसे काम होता जाए, बर्तन भी साथ-साथ साफ कर लूं। ग्राहक आए तो घंटी बजा दे, मैं आ जाऊंगा।
लेकिन जनाब, एक ग्राहक को घंटी बजाने में अपनी शान में बट्टा लग गया! शिकायत हो गई और मैनेजमेंट ने नया नियम बना दिया—"बर्तन तब तक मत धोना जब तक डिपार्टमेंट बंद न हो जाए।" अब बताओ, ये कोई नियम हुआ? दुकान के ओवरटाइम का बिल अलग, बर्तनों का पहाड़ अलग, और ग्राहक भी परेशान।
काम का बोझ, नियमों का झमेला और ओवरटाइम का जादू
अब टीचर साहब सोचते हैं, "चलो, जैसे कहा गया वैसा ही करेंगे।" शाम 4 से 7 तक ग्राहक आते रहे, और बर्तन ऐसे ढेर होते गए जैसे किसी शादी में सब प्लेटें छोड़कर भाग गए हों। खुद टीचर भी सोच रहे थे—"ये क्या नौटंकी है, लेकिन नियम तो नियम है, पालन करना पड़ेगा!"
7 बजे जैसे ही डिपार्टमेंट बंद, जनाब बर्तन धोने लग गए। 2.5 घंटे बाद जब हाथ-पैर जवाब देने लगे, तब जाकर सफ़ाई पूरी हुई। और यही क्रम दो बार और चला। नतीजा? हफ्तेभर में 9 घंटे का ओवरटाइम! अब मैनेजर की बत्ती गुल, बजट का हिसाब गड़बड़, और टीचर को नए जूते लेने का बहाना मिल गया।
मैनेजमेंट की गुत्थी, कर्मचारियों की चालाकी
अब असली मज़ा आया जब असिस्टेंट मैनेजर और डेली मैनेजर के बीच ऑफिस में तू-तू मैं-मैं शुरू हो गई। असिस्टेंट मैनेजर बोले, "इतने बर्तनों में 3 घंटे कैसे लग गए?" डेली मैनेजर ने झल्लाकर कहा, "तो बीच-बीच में बर्तन क्यों नहीं धोए?" टीचर ने मासूमियत से जवाब दिया, "आप लोगों ने ही तो कहा था डिपार्टमेंट बंद होने तक बर्तन मत धोना!"
यह सुनते ही दोनों मैनेजरों की बकर-बकर ऐसी छिड़ी कि टीचर खुद असहज हो गए। एक कमेंट में किसी ने बड़े ही मज़ेदार अंदाज में कहा, "ये तो वही हुआ जैसे कोई अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार ले—नियम बनाया, खुद ही पछता रहे हैं!"
क्या हम सब ऐसे अनुभवों से नहीं गुजरते?
सोशल मीडिया पर इस कहानी पर लोगों ने खूब टिप्पणियां कीं। एक ने कहा, "ये ओवरटाइम तो कंपनी की ऐसी जगह चुभा, जहाँ सबसे ज्यादा दर्द होता है!" किसी ने लिखा—"अगर ग्राहक को घंटी बजाने में दिक्कत है, तो क्या कर्मचारियों को रात भर बर्तन धोना चाहिए?" एक और ने गुस्से में सवाल उठाया, "भला एक टीचर को दो-दो नौकरियाँ क्यों करनी पड़ रही हैं?" किसी ने अमेरिका की शिक्षा व्यवस्था पर तंज कसते हुए कहा—"अगर टीचर्स को इतना कम वेतन मिलेगा, तो समाज को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।"
ऐसी ही एक टिप्पणी थी, "हमारे यहाँ भी 'अगर फुर्सत है तो सफाई करो' वाली कहावत चलती है। लेकिन यहाँ तो उल्टा ही हो गया—'जब दुकान बंद हो जाए, तभी सफाई करो!'"
सीख और मुस्कान
अगर आपने कभी ऐसे अजीब नियमों का सामना किया है, तो आप समझ सकते हैं कि कई बार मैनेजमेंट के फैसलों का असर सिर्फ कागजों तक ही अच्छा लगता है, असलियत में उल्टा पड़ जाता है। कर्मचारियों की समझदारी, व्यावहारिकता और कभी-कभी 'Malicious Compliance' (मतलब, जानबूझकर नियमों का सख्ती से पालन करके मैनेजर को उसकी गलती का अहसास दिलाना) ही ऐसे हालात में सबसे बड़ा हथियार बन जाती है।
आखिर में, टीचर साहब की कहानी हमें यही सिखाती है कि दफ्तर हो या दुकान, अगर नियम जमीन से जुड़े नहीं होंगे तो बर्तनों के साथ-साथ मैनेजमेंट की भी धुलाई हो जाएगी!
आपके दफ्तर में भी कभी ऐसा कुछ अजीब हुआ है? या कोई मज़ेदार मैनेजर-गाथा सुनी हो? नीचे कमेंट में ज़रूर बताइए और इस कहानी को अपने दोस्तों के साथ शेयर कीजिए—क्योंकि हँसी और सीख, दोनों मिलकर ही जिंदगी चलती है!
मूल रेडिट पोस्ट: No Dishes until department closes!