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जब मैनेजर को मिला करारा जवाब: गर्भवती कर्मचारी की मजेदार बदला कहानी

कार्यालय में प्रतिक्रिया का सामना कर रहे प्रबंधक, कार्यस्थल में दुर्भावनापूर्ण अनुपालन का प्रतीक।
प्रबंधक की एक सचित्र छवि जो दुर्भावनापूर्ण अनुपालन के जाल में फंसी हुई है, कार्यस्थल संबंधों की हास्यपूर्ण और गंभीर गतिकी को दर्शाती है। यह चित्र उस कहानी का सार perfectly प्रस्तुत करता है जिसमें प्रबंधक को उनकी गलतियों का फल मिला।

दफ्तर या दुकान का माहौल अकसर ऐसा होता है कि बॉस का मूड ही सबकी किस्मत तय करता है। लेकिन क्या हो जब कोई कर्मचारी, खासकर एक गर्भवती महिला, अपने मनमौजी और असंवेदनशील मैनेजर को उसी के नियमों में उलझा दे? आज की कहानी एक ऐसी बहादुर महिला की है, जिसने न सिर्फ अपने हक के लिए लड़ाई लड़ी, बल्कि ऑफिस की राजनीति को भी बखूबी समझाया – और वो भी बड़े ही मजेदार अंदाज में!

पहली किस्त: दर्द, मुस्कान और HR की दहाड़

23 साल पुरानी यह घटना है, जब हमारी नायिका एक ग्रॉसरी स्टोर में ‘फ्रंट एंड लीडर’ (यानि काउंटर इंचार्ज) थी। लेकिन जैसे ही उसने मैनेजर को अपनी प्रेग्नेंसी की खबर दी, साहब ने उसे काउंटर पर बैठा दिया और वह भी ऐसे कि बाकी कैशियर उसकी निगरानी करने लगे! सोचिए, ऊपर से दर्द, नीचे से मैनेजर की तानाशाही – दोनों का डबल अटैक।

एक दिन सुबह-सुबह उसे पेट में तेज दर्द हुआ। उस जमाने में न तो Google था, न फोन पर डॉक्टर से सलाह लेने का चलन। बेचैन होकर उसने मैनेजर को बताया कि उसे डॉक्टर के पास जाना है, लेकिन मैनेजर बोला, "कोई दूसरा कैशियर नहीं है, 9 बजे तक रुको!" अब 6.30 बजे से 9 बजे तक एक गर्भवती महिला दर्द में कैसे खड़ी रहे!

तभी स्टोर में HR ऑफिस की एक महिला आई। जब हमारी नायिका ने गंभीर चेहरा बना रखा था, तो HR ने ताना मारा, "मुस्कान कहाँ है?" जवाब सुनते ही HR की भी मुस्कान गायब! उसने वहीं जमकर मैनेजर की क्लास ली – "अगर कैशियर नहीं है, तो तुम्हें खुद काउंटर संभालना चाहिए था!" दस मिनट में हमारी हीरोइन छुट्टी लेकर डॉक्टर के पास जा पहुंची।

समाज में अक्सर ऐसा होता है कि ‘ऊपरवाले’ अपने पद का गलत इस्तमाल करते हैं, लेकिन जब नियम उन्हीं पर उल्टा पड़ जाए, तो मजा ही कुछ और होता है!

दूसरी किस्त: बदले की रणनीति – नियमों में फंसा मैनेजर

असल खेल तो यहीं से शुरू हुआ। जब से नायिका ने प्रेग्नेंसी बताई, उसे धीरे-धीरे काउंटर पर बिठा दिया गया, उसके घंटे आधे कर दिए गए। जब उसने वजह पूछी, तो मैनेजर गोलमोल जवाब देने लगा – "जहाँ जरूरत हो, वहीं काम करना पड़ता है।" लेकिन जब वो अड़ी, तो मैनेजर ने बोल ही दिया – "कैशियर को बदलना आसान है, टीम लीडर को नहीं!" सोचिए, जरा सी संभावना पर कैसे सब बदल जाता है।

अब नायिका ने भी सोच लिया – "ठीक है, अब मैं भी अपने हक का फायदा उठाऊंगी।" फिर क्या था, हर छोटी-बड़ी तकलीफ पर छुट्टी, फोन न होने का बहाना, पड़ोसी से बात न करने का बहाना, हर वार्निंग पर मुस्कुराकर साइन। उसके पास कानून था – प्रेग्नेंट महिला को ‘यूँ ही’ नहीं निकाला जा सकता।

अब तो उसकी हर हरकत मैनेजर के लिए सिरदर्द बन गई – शिफ्ट में आधा टाइम ब्रेक, बाकी टाइम वॉशरूम, खाने का बहाना, काउंटर पर लंबी लाइनें और वह आराम से अखबार पढ़ती रही। साथ ही, कम घंटे के चलते आधी सैलरी बेरोजगारी भत्ते से ले ली। मजे की बात, मैनेजर को हर बार उसकी बेरोजगारी के कागज़ात पर साइन भी करना पड़ता!

कम्युनिटी की राय: नियमों का सही इस्तेमाल या सहकर्मियों के साथ नाइंसाफी?

इस कहानी को पढ़कर Reddit कम्युनिटी के लोगों की राय भी बड़ी दिलचस्प रही। एक यूज़र ने कहा, "अगर कंपनी तुम्हारी मेहनत की कदर नहीं करती, तो तुम्हें भी बस जितना कहा जाए उतना ही काम करना चाहिए!" (यानि 'Work Your Wage' का देसी रूप)। वहीं एक अन्य यूज़र ने सलाह दी, "कभी भी लिखित चेतावनी पर साइन मत करो – ये कंपनी को तुम्हें निकालने का बहाना दे सकता है।"

हालांकि, कुछ ने ये भी कहा कि इस तरह की बदले वाली हरकतों से बाकी बेगुनाह सहकर्मियों की मुश्किलें बढ़ जाती हैं। जैसे किसी ने लिखा, "ज्यादा लंबा ब्रेक लेना, देर से आना, इससे तुम्हारे बाकी साथी परेशान होते हैं, जबकि उन्होंने तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ा।"

मगर, कहानी की नायिका ने खुद भी माना कि रिटेल और फूड इंडस्ट्री का माहौल बहुत टॉक्सिक होता है। उसने राहत की सांस ली कि ये सब अब उसके पीछे छूट चुका है।

हमारे समाज के लिए सीख

इस कहानी में कई भारतीय ऑफिसों की झलक मिलती है – जहाँ नियम सिर्फ कमजोर के खिलाफ चलते हैं, और बॉस अपने फायदे के लिए हर तिकड़म आजमाता है। लेकिन जब कर्मचारी भी नियमों का सही इस्तेमाल करना सीख लेते हैं, तो तानाशाह भी घुटनों पर आ जाते हैं।

हमारे यहाँ भी कई बार महिलाएँ, खासकर गर्भवती महिलाएँ, ऑफिस में भेदभाव झेलती हैं। लेकिन अगर आपको अपने हक और कानून की जानकारी है, तो आप भी ऐसे मैनेजर को उसी के जाल में फंसा सकते हैं – और वो भी बिना कोई नियम तोड़े!

निष्कर्ष: आपके पास भी ऐसी कोई कहानी है?

जैसे बॉलीवुड की फिल्मों में ‘विलेन’ को आखिर में तगड़ा झटका मिलता है, वैसे ही यहाँ भी मैनेजर को अपने ही बनाए नियमों में फँसना पड़ा। तो दोस्तों, अगर आपके साथ भी कभी ऐसा हुआ हो, या आपके पास ऑफिस पॉलिटिक्स से जुड़ी मजेदार कहानियाँ हों, तो कमेंट में जरूर बताइए।

कर्मचारी और मैनेजर के बीच इस खींचतान में कभी-कभी एक छोटी सी चाल भी बड़ा फर्क ला सकती है – बस, हिम्मत और समझदारी होनी चाहिए!

आपका क्या ख्याल है – क्या ऐसे बदले वाला रवैया सही है, या फिर हमें टीम वर्क का साथ नहीं छोड़ना चाहिए? अपने विचार जरूर शेयर करें!


मूल रेडिट पोस्ट: Another story of a manager getting their well deserved malicious compliance