जब बॉस बना बच्चा, कर्मचारी ने दिखाया चुटीला बदला!
क्या आपने कभी ऐसा बॉस देखा है जो उम्र में भले ही बड़ा हो, पर हरकतें पूरी तरह बच्चों जैसी करता हो? ऑफिस के तनाव, डेडलाइन और मीटिंग्स का बोझ तो सब उठाते हैं, लेकिन जब बॉस ही रोज़-रोज़ 'क्यों नहीं हो सकता', 'मुझे सब चाहिए अभी के अभी' जैसी जिद्दें करने लगे, तो कर्मचारी बेचारा क्या करे? आज की हमारी कहानी उसी ‘बड़े’ बॉस और उसके 'छोटे' व्यवहार पर है, जिसमें एक समझदार कर्मचारी ने बिल्कुल देसी अंदाज़ में, उसके बचकानेपन का जवाब दिया।
ऑफिस का 'बिग बॉस' या 'बच्चा पार्टी'?
अब सोचिए, हर हफ्ते कम-से-कम एक बार, आपके बॉस का मूड बिगड़ जाए और वो गुस्से में चीख-चिल्ला कर ऑफिस को रणभूमि बना दें — वो भी ऐसी-वैसी डेडलाइन या टारगेट की बात नहीं, बल्कि ऐसी मांगें, जिन्हें सुनकर न्यूटन भी चौंक जाए! जैसे कि, "मेरी डेस्क पर सब कुछ पहुंच में होना चाहिए, दो चीज़ें एक ही जगह रख दो!" अरे भई, विज्ञान भी शरमा जाए ऐसे आदेश सुनकर!
जब कर्मचारी समझाने की कोशिश करे कि ये नामुमकिन है, तो जवाब मिलता है — "तुम लोग बहुत सेंसिटिव हो", "मैं तुम्हारे ऊपर नहीं, हवा में चिल्ला रहा हूँ", या फिर "अरे वाह! मेरा बबुआ दुखी हो गया क्या?" अब किसी को भी लगेगा, ये ऑफिस है या नर्सरी क्लास!
'तू-तड़ाक' का जवाब 'दूध-बिस्किट' वाली भाषा में!
कहते हैं, हर बात की एक हद होती है। हमारे कहानी के हीरो कर्मचारी ने भी हर बार कोशिश की कि बॉस की हठ को झेल ले, लेकिन जब पानी सिर के ऊपर चला गया, तो उसने भी सोचा — 'जैसे को तैसा!' एक दिन बॉस ने फिर से कोई ऐसी गलती कर दी, जो उससे संभाली नहीं गई। बजाय अपनी गलती मानने के, वो फिर से कर्मचारियों पर गुस्सा निकालने लगा, "मुझे ये चाहिए, मुझे वो चाहिए, क्यों नहीं हो रहा!"
कर्मचारी ने जब असली दिक्कत पूछी, तो बॉस गोल-गोल घुमाता रहा — "मुझे बस XYZ चाहिए!" लेकिन असल में, जो बॉस मांग रहा था, वो मशीन या सॉफ्टवेयर के बस की बात ही नहीं थी। सीधा-सीधा नामुमकिन! बॉस ने घंटों इसी पे अपना सिर पीट लिया।
तब कर्मचारी ने, हर सीमा को पार कर चुके बॉस को 'बच्चा पार्टी' वाली भाषा में जवाब देने का फैसला किया। आँखें बड़ी-बड़ी करके, मासूम आवाज़ में बोला — "ओह नो... आप तो एकदम सिली डम्ब डम्ब हेड हो गए!" उसके साथी कर्मचारी तो वहीं हँसी से लोट-पोट हो गए, और बॉस का पारा सातवें आसमान पर! लेकिन कर्मचारी को तो वही सुकून मिल गया, जो गर्मी में ठंडी छाछ पीने से मिलता है।
चुटीले जवाबों से मिला 'ऑफिस आत्मनिर्भरता' का एहसास
इस घटना के बाद, कमेंट करने वालों की भी बाढ़ आ गई। एक पाठक ने मज़ाक में लिखा, "भई, आप तो लीजेंड हो! ऐसा जवाब देने की हिम्मत हर किसी में नहीं होती।" खुद कहानी के लेखक ने भी बताया कि ऐसे बॉस के साथ काम करते-करते, उसकी जबान में भी धार आ गई थी — ये उसकी 'बचने की कला' बन गई, ताकि बॉस की बदतमीज़ी के बीच खुद को मज़बूत रख सके।
एक और कमेंट ने तो भारतीय ऑफिस कल्चर का निचोड़ ही निकाल दिया — "अगर बॉस इतना ही सिरफिरा है, तो क्यों उसके नीचे काम करते हो?" जवाब आया, "भाई, ये जो इकोनॉमी है न, बड़ी खस्ता हालत है! ऐसा नहीं कि बाहर लाइन लगी है नौकरियों की।" कितनी सच्ची बात, आज के दौर में नौकरी पाना ही अपने आप में जंग है, सो झेलना भी पड़ता है।
कुछ लोगों ने ये भी कहा कि असली बदला तो तब होता, जब डेस्क पर सब चीज़ें इधर-उधर कर देते, और बॉस के सामने ही ऊँचे अधिकारी को बुला लेते — लेकिन कहीं न कहीं, ये छोटी-सी 'मासूम बदला' ही सबसे ज़बरदस्त था!
बचकानेपन का इलाज — चुटीली मुस्कान!
हमारे समाज में भी ऐसे बॉस या सीनियर बहुत मिल जाते हैं, जो अपनी गलती कभी नहीं मानते, और अपनी 'बॉसगीरी' दिखाने के लिए दूसरों को नीचा दिखाते हैं। पर याद रखिए, कभी-कभी सबसे बड़ा हथियार होता है — हँसी और चुटीला जवाब! जैसे कि एक पाठक ने कहा, "गुस्सा भी तो एक भावना है, जब कोई ज्यादा इमोशनल हो जाए, तो उसकी भाषा में ही जवाब देना सबसे असरदार है।"
कहानी का असली संदेश यही है — चाहे आप ऑफिस में हों या घर में, जब सामने वाला अपनी उम्र भूल जाए, तो कभी-कभी उसका 'आईना' दिखाने के लिए थोड़ी सी बच्चों जैसी मासूमियत ही काफी है! अगली बार जब कोई 'बॉस' आपको तंग करे, तो याद रखिए — 'तू-तड़ाक' का जवाब 'दूध-बिस्किट' वाली भाषा से भी दिया जा सकता है।
आपकी कहानी?
क्या आपके साथ भी कभी ऐसा हुआ है? क्या आपने भी कभी किसी टॉक्सिक बॉस को चुटीले तरीके से जवाब दिया है? नीचे कमेंट में अपनी कहानी ज़रूर लिखिए, और इस पोस्ट को शेयर करना न भूलें — क्या पता, आपके किसी दोस्त को भी आज थोड़ा सुकून मिल जाए!
मूल रेडिट पोस्ट: Behaving like a child? Then..