जब बॉस बनना भी पड़ा और कर्मचारी भी रहना पड़ा – एक नौकरी की अनोखी जुगलबंदी
हर ऑफिस में एक न एक ऐसा शख्स जरूर होता है, जिसे सब काम का उस्ताद मानते हैं, लेकिन असल में उसका ओहदा वैसा नहीं होता। आप सोच रहे होंगे, “यार, ये तो हमारे ऑफिस में भी होता है!” तो जनाब, आज की कहानी बिलकुल आपके दिल के करीब है। यह किस्सा एक मनोचिकित्सा आपातकालीन सेवा (Psychiatric Emergency Service) यूनिट का है, जिसमें हमारे नायक ने वो खेल कर दिखाया, जिसे सुनकर हर भारतीय कर्मचारी बोलेगा – “वाह भई, क्या दिमाग लगाया!”
जिम्मेदारी का बोझ, लेकिन नाम का नहीं
सोचिए, एक यूनिट है जो 24 घंटे खुली रहती है, शिफ्टें बदलती रहती हैं – कोई सुबह सात बजे आता है, कोई रात 11 बजे। हमारे नायक (आइए, इन्हें ‘शेखर’ कह लेते हैं) को फील्ड में जाकर काम करने का बड़ा शौक था, जबकि बाकी स्टाफ आराम से ऑफिस में बैठकर क्रॉसवर्ड हल करते रहते थे। शेखर के जज़्बे को देखकर, बाकी लोग तो जैसे ऑफिस आते ही यही सोचते थे – “चलो, शेखर को ही भेज देते हैं बाहर, हम तो बैठे-बैठे सैलरी लेंगे।”
यही नहीं, शिफ्ट बदलने के समय रिपोर्टिंग का जिम्मा भी शेखर के सिर आ गिरा, जबकि असली सुपरवाइज़र (मालिक) Allen साहब तो हर रोज़ दो-ढाई घंटे देर से आते थे। अब बाकी सब ने शेखर को ‘नाम का बॉस’ बना दिया – जब मुश्किल फैसला लेना हो, तो शेखर, लेकिन जब काम करना हो, तो “तुम कौन होते हो हमें आदेश देने वाले?”
“श्रोडिंजर के मैनेजर” – बॉस भी, नहीं भी!
रेडिट के एक यूज़र ने कमेंट किया – “ये तो श्रोडिंजर के मैनेजर जैसे हो गए, बॉस हो भी, और नहीं भी।” भाई, भारत में भी तो अक्सर ऐसे लोग मिल जाते हैं, जो काम तो बॉस वाला करते हैं, लेकिन वेतन और अधिकार कर्मचारी वाला ही रह जाता है।
शेखर ने एक दिन तंग आकर, खुद ही ‘मालिक’ बनना तय कर लिया। यूनिट डायरेक्टर John ने सबके सामने घोषणा कर दी – “शेखर जिसे चाहे, केस असाइन कर सकता है।” अब न कोई ऑर्डर लिखित में, न कोई अधिकार, बस मुंहजबानी आदेश! बाकी स्टाफ को समझ आ गया कि अगर अब शेखर की बात नहीं मानी, तो डायरेक्टर साहब खुद नाराज़ हो जाएंगे।
जब खुद ही खुद को केस दिया!
अब कमाल देखिए – एक दिन दूर के अस्पताल से अर्जेंट केस आया, सबने मुंह फेर लिया। शेखर ने क्या किया? चुपचाप खुद को केस असाइन किया, गाड़ी की चाबी ली और निकल लिए। पीछे से कॉल्स आने लगीं, “शेखर जी, इधर कंसल्ट चाहिए!” जवाब आया – “भाई, मैं तो बाहर हूं, अब आप ही करना पड़ेगा!”
डायरेक्टर John ने जब फोन किया, तो शेखर ने मौके का पूरा फायदा उठाया – “आपने कहा था, मैं किसी को भी केस दे सकता हूं, तो मैंने खुद को ही दे दिया। बाकी सब तो मना कर रहे थे।” इसके बाद डायरेक्टर ने सबको दो टूक चेतावनी दी – “शेखर का आदेश, मतलब मेरा आदेश! अब अगर नहीं माने, तो नौकरी खतरे में।”
टिप्पणियों में क्या था मज़ा?
कमेंट्स में भी खूब चर्चा रही। एक यूज़र ने पूछा, “सुपरवाइज़र को रोज़ दो घंटे लेट आने की छूट किसने दी?” तो शेखर (OP) ने जवाब दिया, “ये तो मुझसे पहले ही फिक्स था, Allen साहब देर से आते हैं, बाद में घंटों तक कुर्सी पर सोते रहते हैं!”
एक और कमेंट ने बड़ी बात कही – “जहाँ जिम्मेदारी है, वहां अधिकार भी होना चाहिए।” भारत के कई ऑफिसों में ये आम बात है – काम कराने के लिए कोई ‘मुंहबोला बॉस’ बना दिया जाता है, लेकिन सैलरी और अधिकार उसी पुराने पद के। एक यूज़र ने तो मज़ाक में लिखा, “यहाँ कामचोरों को इनाम मिलता है – जितना कम काम, उतनी शांति!”
भारतीय कार्यस्थल की झलक
शेखर की कहानी हर भारतीय ऑफिस का आईना है, जहाँ ‘कौन बॉस है’ का खेल चलता रहता है। कभी-कभी, आपको खुद ही अपनी जिम्मेदारी समझकर आगे बढ़ना पड़ता है, वरना सब फाइलें धूल फांकती रह जाती हैं। और जब आप अपने अधिकार की सीमा खुद तय कर लेते हैं, तो पूरी टीम को लाइन पर लाना भी आसान हो जाता है।
निष्कर्ष: आप क्या सोचते हैं?
तो दोस्तों, शेखर की ये कहानी पढ़कर आपको अपने ऑफिस की कौन-सी घटना याद आ गई? क्या आपके साथ भी कभी ऐसा हुआ है कि बिना पद के जिम्मेदारी निभानी पड़ी हो? या आपको भी कभी ‘नाम का बॉस’ बना दिया गया हो? नीचे कमेंट में ज़रूर साझा करें, और अगर आपको यह किस्सा पसंद आया हो तो अपने दोस्तों को भी सुनाएँ।
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मूल रेडिट पोस्ट: I'm either in charge or I'm not, so I made it so I was both