जब बॉस ने मांगी 'डिटेल्ड डेली रिपोर्ट' – इंजीनियर ने बना डाली 87 पेज़ की महागाथा!
ऑफिस की दुनिया में कभी-कभी बॉस कुछ ऐसे फरमान सुना देते हैं कि कर्मचारी सोच में पड़ जाते हैं – “क्या वाकई ये ज़रूरी था?” कुछ ऐसा ही हुआ एक IT इंजीनियर के साथ, जब उनके नए बॉस ने एक अजीब सी मांग रख दी – “हर दिन की एक-एक काम की डिटेल्ड रिपोर्ट चाहिए, वो भी हर छोटे से छोटे काम की!”
सोचिए, सुबह ऑफिस में घुसते ही आपको अपनी हर हरकत नोट करनी हो – सिस्टम में लॉग इन करने से लेकर चाय की चुस्की तक, हर चीज़! इस रिपोर्टिंग-युद्ध में IT इंजीनियर ने जो किया, वो पढ़कर आप भी मुस्कुरा उठेंगे।
बॉस का हुक्म: "हर काम का हिसाब दो!"
हमारे कहानी के नायक एक मिड-साइज़ कंपनी में IT सेक्शन में काम करते हैं। उनका काम वैसे तो दिखता नहीं, पर अगर वो न करें तो पूरी कंपनी की सांसें अटक जाएं। नई मैनेजर साहब की एंट्री हुई और उन्हें लगा – “यहाँ तो स्टाफ कुछ करता ही नहीं!” उनका समाधान – “अबसे हर आदमी हर दिन की डिटेल्ड रिपोर्ट भेजेगा – एक-एक मिनट का हिसाब!”
अब IT वाले भैया भी ठहरे जुगाड़ू। उन्होंने सोचा, “आपको डिटेल चाहिए? ले लीजिए डिटेल!” अगले हफ्ते उन्होंने अपने हर काम को रिकॉर्ड करना शुरू किया – “सुबह 8:02 – सिस्टम में लॉग इन किया”, “8:04 – टिकट #4829 का पासवर्ड रिसेट किया”, “8:07 – तीसरी मंज़िल के प्रिंटर की कतार सेट की” – और ऐसे ही हर क्लिक, हर फाइल, हर छोटी-बड़ी दिक्कत, सब कुछ!
87 पेज़ की रिपोर्ट – बॉस के होश उड़ गए!
हफ्ते के अंत में जब उन्होंने अपनी “डिटेल्ड रिपोर्ट” बनाई तो वो 87 पेज़ की महाकाव्य बन चुकी थी! Times New Roman, फॉण्ट 11, सिंगल स्पेस। PDF बनाकर डिस्ट्रीब्यूशन लिस्ट के सारे लोगों को CC कर दिया। बॉस सोमवार को ऑफिस आए तो तमतमाते हुए सीधा उनके केबिन में पहुंचे – “ये क्या मज़ाक है?”
इंजीनियर बोले – “सर, आपकी फरमाइश पर ही तो है! और अगर चाहें तो स्क्रीनशॉट्स भी भेज सकता हूँ।”
कम्युनिटी की प्रतिक्रियाएँ: “जितना लिखा, उतना ही किया!”
Reddit कम्युनिटी में तो जैसे हंसी का तूफान आ गया। एक यूज़र ने कमेंट किया – “अगर हर काम को लॉग करो, फिर उस लॉग को भी लॉग करो, तो रिपोर्ट खुद ही रामायण बन जाएगी!” किसी ने लिखा – “आज क्या किया? कुछ नहीं, पर सब बढ़िया डाक्यूमेंट किया है।”
एक और मजेदार कमेंट था – “5 बजे शाम को बॉस पूछे – आज क्या किया? जवाब – कुछ नहीं, पर बहुत अच्छे से लिखा है!” एक यूज़र की पत्नी नर्स थीं, उन्होंने बताया – “हम इतनी रिपोर्टिंग में उलझे रहते हैं कि असली काम के लिए वक्त ही नहीं बचता।”
कुछ अनुभवी लोगों ने सलाह दी – “रिपोर्ट बनाने में जितना समय गया, वो भी रिपोर्ट में जोड़ दो। तब बॉस को समझ आएगा कि ये सब करने में असल में कितना टाइम बर्बाद होता है।”
भारतीय दफ्तरों में भी दिखता है ये नज़ारा
सच कहें तो भारत के सरकारी दफ्तरों या प्राइवेट कंपनियों में भी अक्सर ऐसे ही फरमान सुनने को मिलते हैं – “हर काम का हिसाब चाहिए”, “डेली टाइमशीट भरो”, “15-15 मिनट का ब्रेकअप दो”। पर हकीकत ये है कि जब आदमी हर छोटी बात लिखने बैठ जाए, तो असली काम के लिए वक्त ही नहीं बचता।
कई बार ऐसा भी होता है कि बॉस को अपने कर्मचारियों के काम का अंदाजा ही नहीं होता। एक यूज़र ने बहुत सही लिखा – “जब तक सब ठीक चलता है, कोई पूछता नहीं IT क्या कर रहा है। जैसे ही कोई दिक्कत आती है, सब IT को ही घेर लेते हैं।”
नतीजा: बॉस ने खुद ही बदल दिया नियम!
आखिरकार, हमारे इंजीनियर की 87 पेज़ वाली रिपोर्ट ने बॉस की आंखें खोल दीं। उसी दिन नई ईमेल आई – “अबसे वीकली समरी चलेगी, बुलेट पॉइंट्स में लिखिए!” यानि अब कोई डेली रामायण नहीं, बस सारांश ही काफी है। IT टीम की मेहनत रंग लाई और सबकी जान में जान आई।
निष्कर्ष: कभी-कभी 'ओवर-ऑबेडिएंस' भी है जरूरी!
इस कहानी से हमें ये सीखने को मिलता है कि कभी-कभी बॉस के आदेशों का पालन इतनी ईमानदारी से करना चाहिए कि अगला खुद ही अपने नियम बदल दे। भारतीय दफ्तरों में भी कई बार ऐसी स्थिति आती है, जहाँ “जो कहा गया, वही किया गया” वाला रवैया बड़े काम आ जाता है।
आपका क्या अनुभव रहा है ऐसे बॉस और रिपोर्टिंग के फरमानों के साथ? क्या आपने भी कभी किसी 'मालिशियस कंप्लायंस' का सहारा लिया है? कमेंट में जरूर बताएं, आपकी कहानी का भी इंतजार रहेगा!
मूल रेडिट पोस्ट: Boss Demanded ‘Detailed Daily Reports’? Sure. Enjoy Your 87-Page Novel.