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जब बॉस ने भेजा 'प्लिंट सीढ़ी' ढूंढने, जवाब में मिली खिलौने की सीढ़ी!

व्यस्त गोदाम में एक भ्रमित कर्मचारी असंभव प्लिंट सीढ़ी की तलाश में।
इस सिनेमाई चित्रण में, एक हैरान कर्मचारी एक व्यस्त गोदाम में हास्यपूर्ण खोज पर निकलता है, elusive प्लिंट सीढ़ी की तलाश में—जो पुराने समय का एक मजेदार मजाक है। जानिए उस समय की मजेदार हरकतें, जब मोबाइल फोन का जमाना नहीं था!

हमारे देश में जब भी कोई नया कर्मचारी ऑफिस या गोदाम में आता है, तो पुराने लोग उसे "दीक्षा" देने के लिए न जाने कौन-कौन से मज़ाक कर डालते हैं। कभी भेज देते हैं "नींबू की खुशबू" लाने, तो कभी "बिजली का पानी" ढूंढने! ये प्रथा सिर्फ भारत तक ही सीमित नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में पुराने कर्मचारियों का पसंदीदा टाइमपास है। आज जो किस्सा मैं सुनाने जा रहा हूँ, वो कुछ ऐसा ही है—पर जवाब में जो हुआ, वो पढ़कर आप भी कहेंगे, "वाह, क्या दिमाग लगाया!"

ऑफिस के पुराने हाथों की शरारतें: "प्लिंट सीढ़ी" की खोज!

यह कहानी है एक गोदाम की, जहाँ एक नया अस्थाई कर्मचारी (temp) काम पर आया। वहाँ के मैनेजर ने अपनी पुरानी परंपरा निभाते हुए उसे भेज दिया "प्लिंट सीढ़ी" (यानि दीवार के बेसबोर्ड पर चढ़ने वाली सीढ़ी) ढूंढने! सच पूछिए तो ऐसी कोई चीज़ होती ही नहीं, ये महज़ नए लोगों को घुमाने का एक तरीका था—ठीक वैसे ही जैसे हमारे यहां किसी को "गोल गोल घुमाने वाला पंखा" या "पानी में आग लगाने वाला तेल" लाने भेज देते हैं।

पर हमारे नायक ने क्या किया? उसने भी पूरी तैयारी कर रखी थी। उसने बॉस से पूछा, "सर, ये बाहर भी हो सकती है क्या?" मैनेजर ने भी मज़े लेते हुए कहा, "पता नहीं, जहाँ मिले ढूंढ लो… और हाँ, बाकी लोगों से भी पूछ लेना!" मतलब, जितना ज़्यादा घूमे, उतना मज़ा!

"मालिक के आदेश" का सीधा फायदा: दो घंटे की छुट्टी और एक खिलौने की सीढ़ी

अब यहाँ कोई सीधा-सादा कर्मचारी होता, तो पूरे गोदाम में चक्कर काटता, सबके सामने बेवकूफ बनता, और अंत में खाली हाथ लौटता। लेकिन इस बंदे ने तो गज़ब कर दिया! जैसे ही नजरों से ओझल हुआ, सीधा बाहर निकल गया, पास के कॉफी शॉप में बैठा, चाय की चुस्की ली, किताब पढ़ी और थोड़ा धुआं भी उड़ाया (जैसा कि पश्चिमी देशों में आम है)। दो घंटे बाद आराम से लौटा और मैनेजर से बोला, "सर, बड़ी मुश्किल से मिला, पर ले आया हूँ—प्लिंट सीढ़ी!" और हाथ में था एक Playmobil टॉय (खिलौने की) छोटी सी सीढ़ी!

बॉस तो गुस्से से लाल, लेकिन कर भी क्या सकता था? आखिर कर्मचारी ने तो वही किया जो कहा गया था—ढूंढा, और "सीढ़ी" लाकर दे दी! तनख्वाह काट नहीं सकते थे, और मज़ाक भी उन्हीं पर भारी पड़ गया। बस, उसके बाद दोबारा कभी उसे ऐसी "खोज" पर नहीं भेजा गया।

मज़ेदार टिप्पणियाँ: हर जगह हैं "प्लिंट सीढ़ी" जैसी कहानियाँ!

रेडिट पर इस किस्से के नीचे ढेरों लोगों ने अपने-अपने अनुभव शेयर किए। किसी ने लिखा, "एक बार मुझे 'पेपर स्ट्रेचर' लाने भेजा गया, आधा शहर घूम आया—हर दुकान वाला अगले के पास भेज देता।" तो किसी ने कहा, "हमारे यहाँ 'बाएं हाथ की स्क्रूड्राइवर', 'हवा की बाल्टी', 'धुंआ पकड़ने वाली बोतल' जैसी चीज़ें ढूंढने भेजते थे।"

एक पाठक ने तो गज़ब लिखा, "हमारे पिज़्ज़ा रेस्टोरेंट में नए लड़कों को 'डो रिपेयर किट' (पिज़्ज़ा का आटा मरम्मत करने वाली किट) लाने भेजते थे। एक बार तो सच में कच्चे आटे की गोलियाँ बैंड-एड से चिपका कर 'किट' बना दी गई थी!" ऐसे ही, किसी ने 'चांद पर चढ़ने वाली सीढ़ी', 'स्ट्राइप वाला पेंट', 'बाएं हाथ की फ्राईपैन', 'लंबा इंतज़ार', और 'होललेस छलनी' (छेद रहित छलनी—मतलब कटोरा!) की मांग की बात करी।

एक भारतीय नजरिए से देखें तो, हमारे देश में भी ऑफिस या वर्कशॉप में नए लड़कों को "पानी में आग", "बाल्टी भर धुआं", "लोहा काटने वाली रबर", या "गोल ब्लेड वाला हथौड़ा" लाने भेजने की परंपरा रही है। कभी-कभी तो नए लोग सच में दुकान-दुकान भटक आते हैं, और दुकानदार भी मुस्कुराते हुए अगले के पास भेज देता है!

क्या सीखें इस कहानी से? शरारत का जवाब दिमाग से!

इन कहानियों में छुपा संदेश भी गहरा है। मज़ाक करना या काम में हंसी-मजाक के बहाने निकालना बुरा नहीं, पर जब सामने वाला होशियार निकले, तो सीन पलट जाता है। जैसे इस कहानी का नायक—उसने बिना बेइज्जत हुए, उल्टा बॉस को ही चौंका दिया। यही असली "मालिक के आदेश का पालन" है—काम भी पूरा, मज़ाक भी वापस!

रेडिट के एक कमेंट में लिखा था, "अगर बॉस वाकई चाहता कि मुझे सारे प्रिंट शॉप्स पता चल जाएं, तो सीधे बोल देता—बेकार में 'पेपर स्ट्रेचर' के पीछे क्यों दौड़ाता?" और एक और पाठक बोले, "जब नई पीढ़ी इन मज़ाकों को समझ जाती है, तो पुराने लोग खुद ही शरमा जाते हैं।"

असली मज़ा तो इसी में है—कभी-कभी उलझन में भी हंसना, और शरारत का जवाब शरारत से देना!

निष्कर्ष: आपके ऑफिस में कौन-सी 'प्लिंट सीढ़ी' है?

तो दोस्तों, आपके ऑफिस या दुकान में भी ऐसा कोई किस्सा हुआ हो, जब आपको या आपके किसी साथी को 'अनोखी चीज़' लाने भेजा गया हो? या आपने भी कभी किसी नए को ऐसे ही घुमाया हो? नीचे कमेंट में जरूर लिखिए—क्योंकि ऐसी कहानियां, रोज़मर्रा की थकान में एक ताज़ा हंसी की वजह बन जाती हैं!

याद रखिए, कभी-कभी तो 'प्लिंट सीढ़ी' ढूंढने निकलना, असल में दोपहर की चाय और किताब का बहाना भी बन जाता है। तो अगली बार जब कोई ऐसी खोज पर भेजे, जवाब में 'खिलौने की सीढ़ी' देना मत भूलना!


मूल रेडिट पोस्ट: Sent on a quest for the impossible plint ladder