जब बॉस ने बीमार कर्मचारी को जाने नहीं दिया, फिर मालिक ने दिखाई असली बॉसगिरी!
हमारे देश में भी ऑफिस या रेस्तरां में बॉस की तानाशाही आम बात है। कभी-कभी तो लगता है जैसे बॉस लोग अपनी कुर्सी पर बैठते ही इंसानियत भूल जाते हैं। आज की कहानी भी कुछ ऐसी ही है, पर इसमें ट्विस्ट है – जब कर्मचारी की मजबूरी को बॉस ने नजरअंदाज किया, तो खुद मालिक ने उसे आईना दिखाया!
बॉस की दादागिरी और कर्मचारी की मजबूरी
सोचिए, आप 17 साल के छात्र हैं, कॉलेज की फीस के लिए स्कूल के बाद रेस्तरां में काम कर रहे हैं। ऊपर से आपको भयंकर एलर्जी है, बिल्कुल वैसे ही जैसे हमारे यहां गर्मियों में आम के बौर या बरसात में धूल-धक्कड़ से कई लोगों को हो जाती है। अब ऐसे में अगर आपकी नाक बेहिसाब बह रही हो, गला खराब हो, और आप काउंटर पर खड़े हों, तो कैसा लगेगा?
इस कहानी के नायक के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। उनकी ड्यूटी ड्राइव-थ्रू काउंटर पर थी, ठीक एक ऐसे पेड़ के सामने जिससे एलर्जी का अटैक होना तय था। कुछ ही देर में हालत खराब – नाक बह रही, गला बैठने लगा। साहब, ऐसे में काम करना किसी सजा से कम नहीं!
बॉस की बेमुरव्वती – न दवा, न छुट्टी!
अब उम्मीद थी कि बॉस थोड़ी इंसानियत दिखाएंगे। लेकिन ये जनाब "जैक" नाम के मैनेजर निकले बिल्कुल बॉलीवुड के घमंडी विलन जैसे – न ड्यूटी बदलने दी, न दवा लेने भेजा, न घर जाने दिया। तर्क भी बड़ा अजीब – "पॉलिसी है, शिफ्ट छोड़ नहीं सकते।" अरे भाई, बीमारी और पॉलिसी में फर्क होता है!
यहां भारतीय दफ्तरों या दुकानों का हाल याद आ गया – जब कोई बीमार हो जाए और छुट्टी मांगे, तो मैनेजर कहता है, "थोड़ा झेल लो, वैसे भी आज स्टाफ पूरा है।" ऐसे में कर्मचारी की हालत और खराब हो जाती है।
असली बॉस की एंट्री – न्याय की जीत!
अब कहानी में असली ट्विस्ट आता है। हमारे नायक को पता था कि मालिक "सैम" हर हफ्ते कागजात देखने आते हैं। बस, उन्होंने बॉस के कहे अनुसार ड्यूटी की, तीन-तीन टिशू बॉक्स खत्म कर दिए, और जैसे-तैसे समय काटते रहे।
जैसे ही मालिक आए, उनकी नजर कर्मचारी की हालत पर पड़ी – गला बैठा, नाक बहती, चेहरा लाल। मालिक से रहा न गया, पूछा – "तुम ठीक हो? ऐसे हालत में काम क्यों कर रहे हो?" जब मालूम चला कि मैनेजर ने न दवा लेने दी, न ड्यूटी बदली, न घर भेजा – मालिक का पारा चढ़ गया।
मालिक ने तुरंत किसी और को ड्यूटी दी और कर्मचारी को घर भेजा। फिर मैनेजर की क्लास ली – "इतना भीड़ नहीं थी, तुम चाहते तो आसानी से ड्यूटी बदल सकते थे या छुट्टी दे सकते थे।"
सोशल मीडिया पर चर्चा – लोगों ने क्या कहा?
इस घटना पर Reddit पर भी खूब चर्चा हुई। एक यूज़र ने मजाकिया अंदाज में लिखा, "सोचिए, अगर कोई ग्राहक रिव्यू में लिख दे कि रेस्तरां में बीमार कर्मचारी छींकता-खांसता खाना परोस रहा था!" बिल्कुल हमारे यहां सोशल मीडिया पर वायरल होने वाले रिव्यूज की तरह!
कुछ लोगों ने कहा – "क्या फायदा, कर्मचारी को तो निमोनिया हो गया, बॉस को कोई सजा भी नहीं मिली।" लेकिन कईयों ने सही कहा – असली जीत ये थी कि मालिक ने खुद सामने आकर गलती सुधारी और पूरे स्टाफ मीटिंग में साफ कहा – "बीमार कर्मचारी को घर भेजो, इंसानियत दिखाओ।"
एक और यूज़र ने सलाह दी – "भाई, एलर्जी के लिए दवा या इंजेक्शन जरूर लो, वरना ज्यादा दिक्कत हो जाएगी।" ये बात हमारे देश के मौसम और प्रदूषण को देखते हुए भी कितनी सटीक है!
अंत भला तो सब भला?
कहानी का नायक तो बाद में नौकरी छोड़कर कहीं और चला गया, लेकिन मालिक की इंसानियत और बॉस की तानाशाही का फर्क सबको दिख गया। बॉस "जैक" को भले कोई बड़ी सजा न मिली हो, लेकिन उनकी कलई खुल गई।
इसीलिए कहते हैं – ऑफिस हो या दुकान, इंसानियत सबसे बड़ी चीज है। पॉलिसी बाद में, पहले कर्मचारी की सेहत! और हां, अगर कभी बॉस तानाशाही दिखाए, तो सही समय का इंतजार कीजिए – कभी-कभी मालिक खुद इंसाफ कर देते हैं।
आपका क्या अनुभव रहा है ऐसे बॉस या मैनेजर के साथ? कमेंट में जरूर बताइए! क्या आपने भी कभी "मालिशियस कम्प्लायंस" दिखाया है?
मूल रेडिट पोस्ट: You won't let me leave when I'm obviously sick? Let's see what YOUR boss has to say.