जब बॉस ने फेंका 'बस के नीचे', लेकिन फंस गया खुद ही जाल में!
ऑफिस की राजनीति में कभी-कभी ऐसा लगता है जैसे सबके पास अपने-अपने 'चाणक्य नीति' होती है। काम तो सब करते हैं, लेकिन श्रेय लेना और गलती का ठीकरा दूसरों पर फोड़ना – ये खेल हर ऑफिस में चलता रहता है। आज की कहानी है एक ऐसे कर्मचारी की, जिसने अपने बॉस की चालाकी का सामना इतनी समझदारी से किया कि पूरा दफ्तर देखता रह गया।
कहानी की शुरुआत: जब बॉस ने दिया मुश्किल काम
सोचिए, आपके बॉस अचानक आपको बुलाएं और कहें – “भाई, नया प्रोडक्ट लॉन्च हुआ है, इसके सारे परफॉर्मेंस नंबर निकालिए और पुराने वाले से तुलना कीजिए।” अब आप मेहनती कर्मचारी हैं, तो लग गए काम में। डेटा घुमाया, चार्ट बनाए, और क्या निकला? साफ-साफ दिख रहा था कि पुराना प्रोडक्ट हर मामले में आगे है। आखिर सालों की मेहनत का असर था, नया तो अभी आया ही था!
अब ज़रा सोचिए, अगर आप सीधा ये सीनियर मैनेजमेंट को दिखा दें, तो नए प्रोडक्ट की हवा वहीं बैठ जाएगी। सबकी उम्मीदों पर पानी फिर जाएगा। इसी डर से हमारे हीरो ने बॉस को सलाह दी – “साहब, क्यों न हम बात को थोड़ा घुमा दें? फोकस करें कि नए प्रोडक्ट में कितनी संभावनाएँ हैं, उसे मार्केटिंग सपोर्ट की ज़रूरत है, लेकिन सीधे तुलना न करें, वरना लॉन्च बिगड़ जाएगा।”
बॉस बोले, “नहीं! जैसे है वैसा ही भेजो, मैं ईमानदारी में विश्वास रखता हूँ।” ऊपर से ये भी जताया कि जैसे आप सच छुपाना चाहते हैं, मतलब आपकी नीयत में ही खोट है!
पेपर ट्रेल और ईमानदारी का सामना
अब यहाँ असली 'मालिकाना चतुराई' सामने आती है। हमारे कर्मचारी ने हर बात, हर सलाह, हर ईमेल को डॉक्यूमेंट कर लिया – एकदम भारतीय जुगाड़ स्टाइल में, “कागज़ी सबूत ही असली हथियार है!” जैसे ही बॉस ने आदेश दिया, वैसे ही बिना कोई मिलावट किए, साफ-साफ डेटा, शानदार ग्राफिक्स के साथ रिपोर्ट सीनियर मैनेजमेंट को भेज दी। कोई स्पष्टीकरण नहीं, कोई घुमाव नहीं – बस कड़वा सच!
जैसे ही मीटिंग में रिपोर्ट खुली, पूरा मैनेजमेंट चौंक गया। सबने पूछा – “भाई, ये क्या हुआ? इतने पैसे लगा दिए, और नया प्रोडक्ट बेसिक बातें भी नहीं पकड़ पा रहा?” तुरंत सवाल उठे, रणनीति कटघरे में आ गई, और प्रोडक्ट टीम की हालत पतली हो गई।
अब बॉस बोले, “अरे, मैंने तो अभी रिपोर्ट देखी ही नहीं थी! ये तो मुझे बिना बताए ही भेज दी गई!” मगर हमारे हीरो ने सबकुछ रिकॉर्ड में रखा था – कब, किसने क्या कहा, किसने अप्रूव किया, सबके ईमेल, सबूत के साथ। अब तो बॉस की हालत वैसी हो गई जैसे किसी हिंदी फिल्म के विलेन की – खुद का ही जाल खुद पर पड़ गया!
'कामयाबी के कई बाप, नाकामी अनाथ' – कमेंट्स से सीख
रेडिट पर इस पोस्ट पर आए कमेंट्स में कई लोगों ने भारतीय दफ्तरों की याद दिला दी। एक यूज़र ने लिखा (जिसका अनुवाद कुछ यूँ है): “जब प्रोजेक्ट अच्छा चलता है, तो बॉस कहते हैं – 'ये मेरा प्रोजेक्ट है', और जब गड़बड़ हो, तो अचानक वो आपका प्रोजेक्ट बन जाता है!” क्या कमाल की बात कही, है न? हम सबने कभी न कभी ऐसा बॉस देखा है, जो सफलता का सेहरा खुद पहन लेता है, और नाकामी का बोझ दूसरों पर डाल देता है।
एक और कमेंट में लिखा था, “पेपर ट्रेल से ही बचाव है – हर ईमेल, हर बातचीत का रिकॉर्ड रखो, वरना ऊपरवाले सारा दोष तुम पर मढ़ देंगे!” ये बात तो भारत के हर सरकारी दफ्तर में बचपन से सिखाई जाती है – “कागज़ दिखाओ, वरना फंस जाओगे!”
कुछ लोगों ने ये भी कहा कि कई बार मैनेजर अपने फायदे के लिए टीम की मेहनत का क्रेडिट खुद ले लेते हैं, और गलती पर टीम को बलि का बकरा बना देते हैं। एक मज़ेदार कमेंट था – “सफलता के हज़ार दावेदार होते हैं, पर नाकामी सबको अनाथ बना देती है।” ये बात उतनी ही सच्ची है जितनी चाय की दुकान पर होने वाली गपशप!
'Peter Principle' और ऑफिस की राजनीति
इस कहानी में एक और दिलचस्प बात सामने आई – जिसे पश्चिमी देशों में 'Peter Principle' कहते हैं, यानी लोग अपनी योग्यता से ऊपर जाकर पद पाते हैं और फिर वहां फंस जाते हैं। ऑफिस में कितने ही ऐसे लोग मिल जाते हैं, जो ऊपर-ऊपर पद पा लेते हैं, पर असली काम आते ही घबरा जाते हैं। जैसा कि एक कमेंट में किसी ने कहा – “अक्सर ऐसे लोग ऊपर पहुँच जाते हैं, जो असली मेहनती लोगों की मेहनत का फल खाते हैं, पर असली संकट में अपने कमरे में छुप जाते हैं।”
हमारे कर्मचारी ने जिस तरह से ईमानदारी और धैर्य दिखाया, वो काबिले-तारीफ है। उसने न तो बॉस से भिड़ना चुना, न ही सच को छुपाया। बस अपनी बात, अपने सबूत संभालकर आगे बढ़ गया। और आखिर में, बॉस खुद अपने ही चाल में फँस गए – “अब तो वो अपने कमरे में ही रहते हैं, सबसे नाराज़ होकर!” ये लाइन पढ़कर मन में वही मजेदार ख्याल आता है – “चलो, ऑफिस में एक तो कम परेशान करेगा अब!”
निष्कर्ष – आपकी कहानी क्या कहती है?
ऑफिस की राजनीति, बॉस की चालाकी, और ईमानदारी का संघर्ष – ये कहानी भारत के हर कर्मचारी के दिल को छू जाती है। हम सबने कभी न कभी ऐसा दिन देखा है, जब अपनी मेहनत का सही क्रेडिट न मिले, या गलती का ठीकरा हमारे सिर फोड़ा जाए। लेकिन असली जीत उसी की होती है, जो अपने काम और ईमानदारी पर कायम रहे – और ज़रूरत पड़े, तो 'पेपर ट्रेल' का सहारा ले।
आपके ऑफिस में भी कभी ऐसा कुछ हुआ है? क्या आपने कभी 'कागज़ी सबूत' से खुद को बचाया है, या किसी बॉस की चालाकी में फँस गए हैं? अपने अनुभव कमेंट में जरूर बताइए – और हाँ, अगली बार जब कोई बॉस आपको 'बस के नीचे' फेंकने की कोशिश करे, तो याद रखिए – 'कागज़ी सबूत' सबसे बड़ा हथियार है!
मूल रेडिट पोस्ट: Department head tried throwing me under the bus