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जब बॉस ने खुद ही अपने पाँव पर कुल्हाड़ी मारी – ऑफिस की कहानी जिसने सबको हँसा-रुला दिया

एक कॉर्पोरेट सेटिंग में तनावपूर्ण प्रदर्शन समीक्षा बैठक को दर्शाने वाला सिनेमाई चित्रण।
इस नाटकीय दृश्य में, हम प्रदर्शन समीक्षा के तीव्र माहौल को कैद करते हैं, जहाँ अपेक्षाएँ वास्तविकता से टकराती हैं। हमारे नवीनतम चर्चा में कार्यस्थल मूल्यांकन और फीडबैक की जटिलताओं का अन्वेषण करें।

ऑफिस की दुनिया में हर किसी को कभी न कभी “अपना हक़” पाने के लिए लड़ना पड़ता है। कभी-कभी तो ऐसा लगता है जैसे हम सब एक अदृश्य मंच पर नाटक कर रहे हैं – कोई ऊपर से आदेश देता है, कोई चुपचाप सब कुछ झेलता है, और कोई मौका देखकर चाल चल देता है। आज की कहानी भी ऐसे ही एक समझदार और धैर्यवान कर्मचारी की है, जिसने अपने बॉस की नासमझी का जवाब बड़े मज़ेदार और सीखे देने वाले अंदाज़ में दिया।

बॉस बदलते ही बदल गई तासीर

हमारे नायक (चलो, इन्हें ‘विजय’ कह लेते हैं) एक बड़ी अंतरराष्ट्रीय कंपनी में काम करते थे। हर साल यहाँ performance review होता था – यानी आपके काम का रिपोर्ट कार्ड, जिस पर लिखा जाता था: बुरा, औसत, अच्छा, बढ़िया, ग़ज़ब! जिनको “बढ़िया” और “ग़ज़ब” मिलता, उन्हें बोनस भी मिलता – वैसे पैसे में कोई बड़ा फर्क नहीं, बस थोड़ा सा मान-सम्मान।

विजय और उनके पुराने बॉस के बीच एक समझौता था – बॉस की छुट्टी हो, दो मीटिंग्स एक साथ हों या कोई फँसा केस हो, विजय सब संभाल लेंगे। बदले में बॉस हर साल “बढ़िया” वाला रिव्यू दिला देंगे। चार साल तक सब बढ़िया चला – न कोई डेडलाइन मिस, न कोई शिकायत।

फिर अचानक अगस्त में बॉस ने कंपनी छोड़ दी, और विजय के सिर नया बॉस आ गया। नया साहब आए, विजय ने उन्हें सब काम समझाया – अपना भी, और बॉस का डिप्टी बनकर जो अतिरिक्त जिम्मेदारी उठाई थी, वो भी। नए बॉस बोले, “ठीक है, करते रहो।”

‘अरे भई, जब मेहनत का सही मोल ही नहीं तो...’

अब आया असली ट्विस्ट! दिसंबर में सालाना रिव्यू के समय नए बॉस ने विजय को सिर्फ “अच्छा” रेटिंग दी – यानी न बोनस, न अतिरिक्त सम्मान। विजय ने पूछा, “साहब, मैंने तो सब अपना काम और एक्स्ट्रा भी पूरा किया है। हमारी कंपनी में यही तो ‘बढ़िया’ का पैमाना है।” बॉस बोले, “मैंने तुम्हें काम करते देखा नहीं, और मेरी अपेक्षाएँ ज्यादा थीं।”

बस, विजय ने भी ठान लिया – ‘जैसी तनख्वाह, वैसा काम!’ उन्होंने फौरन हर मीटिंग और जिम्मेदारी जो डिप्टी के तौर पर संभालते थे, छोड़ दी। HR को मेल किया – ये सब मेरी ड्यूटी में नहीं आता, मैं अब सिर्फ अपना काम करूँगा। HR ने भी लिखित में जवाब दे दिया, “बिल्कुल, ये सब आपके रोल में नहीं है।”

जब ऑफिस का सिस्टम गड़बड़ाया, तो समझ आई असली कदर

अगला हफ्ता आया – और ऑफिस में हड़कंप मच गया। एक बड़ी टेक्निकल समस्या आ गई, जो आम तौर पर विजय ही सुलझाया करते थे। सभी को उम्मीद थी कि विजय आएंगे और जादू की छड़ी घुमा देंगे। विजय ने वार रूम में जाकर दो-चार सवाल पूछे, फिर बोले, “देखिए, ये मेरी विशेषता नहीं है, अगर मेरी टीम की ज़रूरत हो तो बताइए।”

लोगों के चेहरे पर साफ मायूसी थी, लेकिन क्या करें! अब नए डिप्टी बने ‘जैरी’ को बुलाया गया, लेकिन बेचारे का अनुभव ऑपरेशन्स में कम और मैनेजमेंट में ज्यादा था। जितना हो सका, प्रयास किया, लेकिन बात नहीं बनी। अगला दिन – फिर वही अफरातफरी! आखिरकार नये-पुराने सभी बॉस और टीमें जुटीं, तब जाकर समस्या हल हुई।

इसी बीच एक अहम कमेंट Reddit पर आया – “ये एक चक्र है, जिसमें कर्मचारी ‘ऊपर से ऊपर’ जाता है, बॉस बदल जाता है, उसकी कदर खत्म हो जाती है, फिर कर्मचारी ‘जितनी तनख्वाह, उतना काम’ पर आ जाता है, और पूरी टीम हैरान-परेशान हो जाती है।” (सोचिए, हमारे यहाँ भी ऐसे कितने किस्से हैं – जब कोई सीनियर स्टाफ छुट्टी पर जाता है, तो सबकी हालत पतली हो जाती है!)

कम्युनिटी की राय: नया बॉस, पुरानी सीख

Reddit कम्युनिटी में कई लोगों ने अपने अनुभव साझा किए – एक टॉप कमेंट था, “जब भी नया मैनेजर बनता हूँ, सबसे पहले टीम से सीखता हूँ, जड़ें समझता हूँ, फिर बदलाव लाता हूँ। वरना नासमझी में जल्दबाज़ी करने वाले बॉस अक्सर फेल हो जाते हैं।” एक और मजेदार कमेंट – “बिना बढ़िया रिव्यू या सैलरी के, कोई ‘फ्री’ में एक्स्ट्रा काम क्यों करे? सालाना रिव्यू तो वैसे भी मज़ाक है!”

कई लोगों ने ‘Chesterton's Fence’ का भी ज़िक्र किया – यानी कोई बदलाव करने से पहले, पहले ये समझो कि पुरानी व्यवस्था क्यों थी। यही बात हमारे यहाँ ‘पुरखों के बनाए नियम’ के नाम से जानी जाती है – पहले समझो, फिर बदलो।

कई पाठकों ने लिखा – “ये कोई ‘दुष्टता’ नहीं, बस अपने अधिकार का पालन है। बॉस ने मौखिक समझौता तोड़ दिया, तो कर्मचारी ने भी वही किया जो सही था।”

सबक – जैसी करनी, वैसी भरनी!

आखिर में विजय ने जैरी को साफ-साफ कह दिया – “भई, जब मुझे एक्स्ट्रा काम का मुआवजा नहीं, तो मैं क्यों करूँ?” और बॉस को भी – “आपने ही कहा था कि मेरी अपेक्षाएँ पूरी नहीं हुईं, तो मैंने वो सब जिम्मेदारियाँ छोड़ दीं, जो मेरे रोल में नहीं थीं।”

अब तो विजय छुट्टी पर जा रहे हैं, और बॉस साहब की हालत सोचिए – जिस काम की कद्र नहीं की, वही अब सिरदर्द बन गया!

क्या आपने भी ऑफिस में ऐसा कुछ देखा है?

कहानी का मर्म यही है – मेहनत की कदर होनी चाहिए, वरना लोग अपनी सीमाएँ खुद तय कर लेते हैं। क्या आपके साथ भी ऐसा हुआ है कि आपने एक्स्ट्रा मेहनत की, मगर उसका सही मोल नहीं मिला? अपने अनुभव नीचे कमेंट में साझा करें – शायद आपकी कहानी भी किसी को हौसला दे दे!


मूल रेडिट पोस्ट: FAFO regarding performance review