जब बॉस ने कहा 'हर गाना मंज़ूर होना चाहिए' – तब शुरू हुई असली मल्टीप्लेक्स म्युज़िक जंग!
क्या आप कभी ऐसे ऑफिस या शॉपिंग मॉल में काम कर चुके हैं, जहाँ हर दिन वही 10-15 पुराने गाने दोहराए जाते हैं? सोचिए, अगर आपको हर रोज़ "लुंगी डांस" या "मुन्नी बदनाम" बार-बार सुनना पड़े, तो हाल क्या होगा! कुछ ऐसा ही हाल एक शॉपिंग सेंटर के डोर ग्रीटर का भी था – लेकिन फिर उसने सोचा, अब कुछ नया करते हैं!
"हर गाना मंज़ूर होना चाहिए" – नियम बना, सिरदर्द बना!
हमारे नायक (Reddit यूज़र dye-area) को अपने मॉल में दरवाज़े पर खड़े-खड़े, वही घिसे-पिटे गाने सुनने पड़ते थे। एक दिन मैनेजमेंट ने थोड़ी आज़ादी दी – अब वह अपनी पसंद के गाने चला सकते थे, लेकिन शर्त ये थी कि हर गाना पहले मॅनेजर से पास करवाना होगा।
हिंदी में कहें तो – "चूहे को घी मिला, पर कुतर-कुतर के ही खाना पड़ेगा!"
अब भाई साहब का म्यूज़िक टेस्ट ऐसा था कि हर जॉनर, हर भाषा के गाने प्लेलिस्ट में। एक-एक प्लेलिस्ट 12 घंटे की! और ऊपर से, अलग-अलग प्लेलिस्ट में कई गाने रिपीट भी। उन्होंने सोचा – "अगर मॅनेजर को मंज़ूरी चाहिए, तो पूरी 12-12 घंटे की प्लेलिस्ट थमा देंगे। जितना नियम, उतना सिरदर्द!"
कम्युनिटी की प्रतिक्रिया – "बंदा सबका बैंड बजा देगा!"
जहाँ Reddit की दुनिया में लोग मस्ती में रहते हैं, वहीं कुछ समझदारों ने सही बात बोली। एक यूज़र ने लिखा, "भैया, ये तो वही बात हो गई – 'एक मछली सारे तालाब को गंदा कर देती है।' अगर तुमने ये चाल चली, तो म्यूज़िक की ये छूट सबके लिए बंद हो जाएगी।"
दूसरे ने चुटकी ली, "ऐसा करने से तो मैनेजमेंट कह देगा – चलो भाई, अब तुम्हें अपनी पसंद का गाना सुनने की इजाज़त ही नहीं!"
कुछ लोग बोले, "काम की जगह पर गाने चलाना विशेषाधिकार है, हक़ नहीं।" किसी ने तो कह दिया, "अब तुम्हें हर शिफ्ट पर वही पुराना गाना सुनना पड़ेगा – यही सज़ा है!"
इतना ही नहीं, एक मज़ेदार कमेंट था – "अगर कोई अश्लील या विवादित गाना बज गया, तो समझ लो – नौकरी भी जा सकती है!" वैसे, भारत के ऑफिस कल्चर में भी ऐसा ही है – कोई भी सार्वजनिक जगह पर गाना बजाने से पहले सबकी पसंद-नापसंद और मर्यादा का ख्याल रखा जाता है।
मैनेजर का रिएक्शन – "भाई, 12 घंटे की प्लेलिस्ट मत भेज, 4-5 गाने भेज!"
कहानी में असली ट्विस्ट तब आया जब हमारे नायक ने अपनी रणनीति मॅनेजर को बता दी।
मॅनेजर निकला बड़ा ही 'कूल' – बोला, "अगर तुमने ये किया तो म्यूज़िक की छूट सबके लिए छिन जाएगी, लेकिन सुनने में बड़ा मज़ा आएगा!"
आखिरकार, दोनों में सहमति बनी – हर हफ्ते सिर्फ 4-5 नए गाने भेजे जाएँ, धीरे-धीरे प्लेलिस्ट बड़ी की जाए।
यानी, न नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी – सबका भला, सबकी सुनवाई!
म्यूज़िक, दफ्तर और भारतीय जुगाड़
ये कहानी कहीं न कहीं हमारे ऑफिस कल्चर से मेल खाती है। भारत में भी कई दफ्तरों में लोग अपने मोबाइल से गाने बजाते मिल जाते हैं, लेकिन जैसे ही बॉस दिखे – फौरन आवाज़ धीमी!
म्यूज़िक सबको पसंद है, लेकिन सबकी पसंद एक जैसी नहीं। किसी को किशोर कुमार, तो किसी को हनी सिंह! ऐसे में 'मंज़ूरी' का नियम बिल्कुल जायज़ है – ऑफिस या मॉल सबकी जगह है, किसी एक की नहीं।
यहाँ Reddit पर भी बहस यही थी – नियम बने हैं, तो सबके भले के लिए।
एक यूज़र ने मज़े में कहा, "अगर बहुत सिर पर चढ़ोगे, तो 'बैंड' भी बज जाएगी और गाने भी बंद हो जाएँगे!"
निष्कर्ष – "संगीत सबका है, पर मर्यादा ज़रूरी!"
तो भैया, कहानी से यही सीख – चाहे ऑफिस हो या मॉल, संगीत की आज़ादी तभी तक है जब तक सबकी मर्यादा बनी रहे।
अगर अपने जुगाड़ से दूसरों की परेशानियाँ बढ़ाओगे, तो आखिर में खुद ही मुसिबत में फँस सकते हो।
जैसे एक हिंदी कहावत है – "अति का भला न बोलना, अति की भली न चुप; अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।"
मतलब, बैलेंस रखो – म्यूज़िक सुनो, पर सबके हिसाब से!
आपका क्या अनुभव है? ऑफिस में कौन सा गाना सबसे ज्यादा सुनते हैं? कभी किसी मज़ेदार या अजीब गाने पर बॉस की डांट पड़ी है? कमेंट में जरूर बताइए – और हाँ, अगली बार "Too Sweet" या "लुंगी डांस" बार-बार सुनना पड़े, तो अपने जुगाड़ से ध्यान रखना... बॉस सब देख रहे हैं!
मूल रेडिट पोस्ट: 'All Music Must Be Approved'