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जब बॉस ने कहा 'कार्गो को प्राथमिकता दो!' – कर्मचारी ने कर दिया कमाल

अगर आप कभी छोटे शहर के एयरपोर्ट पर गए हैं, तो जानते होंगे कि वहाँ सब कुछ कितना फुर्तीला और भागदौड़ वाला होता है। लेकिन सोचिए, जब स्टाफ ही कम हो, ऊपर से बॉस का फरमान आ जाए – "कार्गो फ्लाइट को सबसे ऊपर रखो, बाकी सब भूल जाओ!" तो क्या होगा? आज की कहानी यूरोप के एक रीजनल एयरपोर्ट के ऐसे ही एक कर्मचारी की है, जिसने अपने बॉस के आदेश को कुछ इस अंदाज में निभाया कि पूरा एयरपोर्ट सिर पकड़ के बैठ गया!

जब आदेश बन गया सिरदर्द – "कार्गो को प्राथमिकता!"

हमारे नायक (रेडिट यूजर u/Best-Operation-7420) एक रैम्प एजेंट हैं। एयरपोर्ट पर पिछले कई साल से स्टाफ की भारी कमी चल रही थी, लेकिन अब तो हालात एकदम बिगड़ गए। सबसे ज्यादा कमाई कार्गो कंपनी से होती है, और वो कंपनी इतनी सख्त है कि हर छोटी बात का हिसाब रखती है। अब बॉस ने कह दिया – "जैसे ही कार्गो की कॉल आए, बाकी सब काम छोड़कर भागो वहाँ! वो हमारे सबसे खास ग्राहक हैं।"

यह सुनते ही सबको समझ आ गया कि अब बाकी फ्लाइट्स भगवान भरोसे हैं। कहानी के हीरो बताते हैं – आज कुछ कर्मचारी बीमार हो गए, तो बाकी को भी कार्गो फ्लाइट के लिए इधर-उधर से खींच लिया गया। खुद वह जिस पैसेंजर फ्लाइट के नीचे काम कर रहे थे, बस 3 मिनट में काम पूरा होने वाला था, लेकिन बॉस के आदेश पर सब अचानक भाग लिए। नतीजा, पैसेंजर फ्लाइट घंटों लेट हो गई!

कर्मचारी की 'मालिशियस कंप्लायंस' – बॉस के आदेश का तगड़ा असर

यहाँ मज़ा तब आया जब कर्मचारी ने बॉस के आदेश को बिल्कुल अक्षरशः मान लिया। पहले वे लोग क्या करते थे? एक आदमी को रैम्प एजेंट के साथ छोड़ देते थे, जिससे पैसेंजर फ्लाइट समय पर रवाना हो जाती थी। लेकिन अब बॉस बोले – "सब छोड़ो और भागो!" तो बस, किसी ने पीछे हाथ भी नहीं रखा।

जैसा कि एक कमेंट करने वाले ने मज़ेदार अंदाज में कहा – "भाई, अगर थोड़ा दिमाग लगाकर 3 मिनट और काम कर लेते तो फ्लाइट भी समय पर जाती, और बॉस की इज्ज़त भी बच जाती। लेकिन बॉस का आदेश था, तो कर्मियों ने भी वही किया।" कई पाठकों ने इसे 'मालिशियस कंप्लायंस' कहा – यानी आदेश का पालन इस तरह करना कि बॉस को ही उसकी सजा मिले!

'हमेशा भागो, कम पैसे पाओ' – कर्मचारियों की मन की बात

कई कमेंट्स में कर्मचारियों की पीड़ा भी झलकती है। एक ने लिखा – "कम वेतन, स्टाफ की भारी कमी, ऊपर से हमेशा भागदौड़। आखिर कब तक?" एक और ने बताया – "हमेशा ऐसा ही होता है, बड़े ग्राहक के लिए बाकी सबको भूल जाओ। पर जब वही बड़ा ग्राहक छोड़कर चला जाए तो कंपनी के हाथ कुछ नहीं आता!"

यह बात भारतीय दफ्तरों में भी खूब देखने को मिलती है – एक खास क्लाइंट के लिए सब कुछ दाँव पर लगा देना, बाकी कस्टमर और स्टाफ की बलि चढ़ा देना। और जब वही क्लाइंट नाराज हो जाए, तो सब हाथ मलते रह जाते हैं।

क्या ये सिस्टम टिक पाएगा? पाठकों का नजरिया

कुछ पाठकों ने कहा – "भाई, ऐसे बिजनेस मॉडल से कुछ नहीं होने वाला। एक ग्राहक की खातिर बाकी सबको नजरअंदाज करना खतरनाक है।"

एक ने अपनी कहानी भी सुनाई – "हमारे यहाँ भी एक बड़ा क्लाइंट था, 70% बिजनेस उससे आता था। हमने मालिक को समझाया – कारोबार में विविधता लाओ, वरना एक दिन सब खत्म हो जाएगा। और वही हुआ – तीन साल बाद क्लाइंट गया, कंपनी मुश्किल में पड़ गई।"

एक और ने सही कहा – "अगर काम असुरक्षित हो रहा है, तो रिपोर्ट करो। लेकिन जब खुद एयरपोर्ट अथॉरिटी भी परेशानी में हो, तो मजदूर कहाँ जाएँ?"

भारतीय संदर्भ – क्या हम सब इसी चक्कर में फँसे हैं?

सोचिए – हमारे देश में भी सरकारी दफ्तरों या प्राइवेट कंपनियों में, कई बार छोटे कर्मचारियों पर इतना दबाव होता है कि वे बॉस के कहे को आँख बंद करके मानते हैं। ऊपर से स्टाफ की कमी, कम वेतन, और हर समय 'ग्राहक भगवान है' का मंत्र। ऐसे माहौल में अगर कोई कर्मचारी बॉस के आदेश का पालन कुछ ज्यादा ही ईमानदारी से कर दे, तो नुकसान कंपनी को ही झेलना पड़ता है।

हम सबने अपने ऑफिस में तो सुना ही होगा – "अरे, बड़ा क्लाइंट आया है, सब छोड़कर उसकी सेवा में लग जाओ!" और फिर बाकी काम भगवान भरोसे।

निष्कर्ष – क्या आप भी कभी ऐसे फँसे हैं?

यह कहानी हमें हँसा भी देती है और सोचने पर मजबूर भी करती है। क्या बॉस को हमेशा 'ग्राहक सर्वोपरि' की नीति चलानी चाहिए? या फिर स्टाफ और बाकी ग्राहकों का भी ध्यान रखना चाहिए?

आपका क्या अनुभव है? क्या आपने भी कभी किसी बॉस के ऐसे आदेश का नतीजा भुगता है? या फिर कभी मालिशियस कंप्लायंस का तड़का लगाया है? अपने किस्से नीचे कमेंट में जरूर बताइए। और अगर आपको यह कहानी पसंद आई हो, तो दोस्तों के साथ शेयर करना मत भूलिए – शायद आपके ऑफिस में भी कोई 'कार्गो प्रायोरिटी' वाला बॉस छुपा बैठा हो!


मूल रेडिट पोस्ट: Cargo gets priority? You got it boss!