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जब बॉस ने ओवरटाइम पर रोक लगाई: मांस फैक्ट्री में 'बॉब' का बंटाधार

मीट पैकिंग प्लांट के पर्यवेक्षक और नए उत्पादन प्रबंधक की चुनौतीपूर्ण मुलाकात का कार्टून-3डी चित्रण।
इस जीवंत कार्टून-3डी दृश्य में, हमारे पूर्व मीट पैकिंग प्लांट के पर्यवेक्षक नेतृत्व की चुनौतियों का सामना करते हैं, जब वे नए उत्पादन प्रबंधक बॉब से मिलते हैं। जानें कैसे उनके भिन्न पृष्ठभूमि एक गतिशील कार्यस्थल की कहानी रचती है!

कहते हैं, "जो चीज़ ठीक चल रही हो, उसमें टांग मत अड़ाओ।" लेकिन हर दफ़्तर में एक न एक 'बॉब' ज़रूर आ जाता है, जो बिना पूरी समझ के सब बदल डालने की ठान लेता है। आज की कहानी है एक मांस पैकिंग फैक्ट्री की, जहाँ एक इंजीनियर साहब ने आते ही बड़ा ऐलान कर दिया – अब से ओवरटाइम बिलकुल नहीं मिलेगा!

सोचिए, हमारे यहाँ भी जब कोई नया मैनेजर आता है और पहले ही हफ्ते 'बदलाव की आँधी' चला देता है, तो पुराने कर्मचारी क्या सोचते होंगे? 'बॉब' की कहानी में तो यही हुआ – और नतीजा ऐसा निकला कि कंपनी को लाखों का चूना लग गया।

'बॉब' का धमाकेदार आगमन – और ओवरटाइम पर ताला

कुछ साल पहले, एक बड़े मांस पैकिंग प्लांट में सुपरवाइज़र साहब (जिन्होंने Reddit पर ये किस्सा साझा किया) ठीक-ठाक काम कर रहे थे। अचानक नए प्रोडक्शन मैनेजर बने 'बॉब' आए – जिनका न तो फर्श का अनुभव था, न मैनेजमेंट का, बल्कि सीधे इंजीनियरिंग बैकग्राउंड से आए थे।

पहले ही दिन मीटिंग में बॉब ने ताल ठोक दी, "अब से कोई ओवरटाइम नहीं! कंपनी का पैसा बर्बाद हो रहा है।" सुपरवाइज़र ने समझाने की कोशिश की – "सर, छुट्टियाँ, बीमारी, सबकी भरपाई कैसे होगी?" बॉब बोले, "कोई अपवाद नहीं, ओवरटाइम बंद!"

यहाँ गौर करने वाली बात ये है कि उस विभाग में 70 लोग सीधे सुपरवाइज़र के अंडर थे, और पूरी फैक्ट्री में लगभग 220 कर्मचारी। रोज़ औसतन 7 लोग बीमार छुट्टी पर रहते, 10% कर्मचारी छुट्टी पर, कभी-कभी कोई जल्दी चला जाता, तो कभी कोई अचानक छोड़ देता।

अब बॉब साहब के फरमान के बाद सुपरवाइज़र ने आखिरी बार फिर पूछा, "सर, अगले हफ्ते 19 लोग कम पड़ेंगे, ओवरटाइम मंज़ूर कर दीजिए।" जवाब सीधा – "ना!" सुपरवाइज़र ने सोचा, चलो, बॉब को उसकी ही दवाई पिला देते हैं।

नतीजा – जब दो लाइनें बंद हो गईं और बॉस के पसीने छूट गए

अगला हफ्ता आया। दो प्रोडक्शन लाइनें बंद – चलाने वाला कोई नहीं! बॉब दौड़ते हुए आए, "ये क्या हुआ? मशीन खराब है?" सुपरवाइज़र ने मुस्कुराते हुए कहा, "नहीं सर, लोग ही नहीं हैं।"

बॉब बोले, "स्टाफिंग सही करो, प्लानिंग करो!" सुपरवाइज़र ने ठंडे दिमाग से जवाब दिया – "मैंने आपसे बार-बार ओवरटाइम के लिए पूछा था, आपने मना किया।" बॉब गुस्से में बड़बड़ाते हुए निकल गए – "लोगों को बुलाओ अभी!"

आखिरकार, सुपरवाइज़र को छुट्टी पर बैठे लोगों को फोन कर-कर के ओवरटाइम लगाना पड़ा। लेकिन दो लाइनें उस दिन नहीं चल सकीं। अनुमान लगाइए, सिर्फ एक दिन में कंपनी को 1,20,000 डॉलर (यानि 1 करोड़ रुपए से भी ऊपर) का नुकसान हो गया!

कम्युनिटी की राय – सीख किसे और क्या मिली?

Reddit पर इस पोस्ट को हज़ारों लोगों ने सराहा और अपने-अपने अनुभव साझा किए। एक टॉप कमेंट था – "नए मैनेजर को पहले महीना भर चुप रहना चाहिए, हर चीज़ समझनी चाहिए, फिर बदलाव करने चाहिए।" जैसे हमारे यहाँ कोई नया प्रिंसिपल आते ही पूरी स्कूल व्यवस्था बदलना शुरू कर दे – बिना बच्चों और शिक्षकों की दिक्कत जाने।

एक और पाठक ने मज़ेदार बात कही – "पुराने ऑफिस की मिसाल देकर कभी बदलाव मत शुरू करो। किसी को परवाह नहीं कि पिछली जगह क्या होता था।"

कुछ लोगों ने सलाह दी – "अगर रोज़ इतने लोग छुट्टी पर रहते हैं, तो कुछ अतिरिक्त लोग रख लो। ओवरटाइम रोकने का ये मतलब नहीं कि सबको काम से ही निकाल दो।" लेकिन असल दिक्कत ये थी कि इतनी मुश्किल और गंदी (मांस फैक्ट्री में खून, बदबू, ठंड) वाली नौकरी में नए लोग टिकते ही नहीं थे।

एक और पाठक ने हिंदी मुहावरेदार अंदाज़ में लिखा – "बॉब ने दही में मिर्ची डाल दी, पर खुद ही छाछ पीना भूल गया।"

सबक – बॉस बनना अलग, नेता बनना अलग

कहानी का असली सार ये है कि बॉस अगर ज़मीन से जुड़ा न हो, टीम की सुनने को तैयार न हो, तो उसका अंजाम बॉब जैसा ही होता है – तीन महीने में चलता कर दिया गया!

जैसे हमारे गाँव में प्रधान चुना जाता है, जो सबकी सुनता है, समझता है, वैसे ही दफ्तर में भी मैनेजर को पहले सबकी दिक्कतें समझनी पड़ती हैं। एक पाठक ने बड़ी अच्छी बात कही – "नेता बनो, बॉस नहीं।"

आप क्या सोचते हैं?

क्या आपके ऑफिस में भी कभी कोई 'बॉब' आया है, जिसने आते ही उल्टा-पुल्टा नियम बना दिए हों? या फिर कोई ऐसा लीडर मिला हो, जिसने सभी की सुनकर टीम को आगे बढ़ाया हो? अपने अनुभव कमेंट में ज़रूर साझा करें।

आखिर में, यही कहेंगे – "अगर नाव सही दिशा में चल रही हो, तो उसे पलटने की ज़रूरत नहीं।" अगली बार आपके दफ्तर में भी कोई बॉब आए, तो ये कहानी ज़रूर याद रखिएगा!


मूल रेडिट पोस्ट: Zero OT? You got it