जब बॉस को मिला रिटायरमेंट पार्टी में असली 'तोहफा' – ऑफिस की छोटी बदला-कहानी
कर्मचारी बनकर काम करना कभी-कभी ऐसे अनुभव देता है, जो ज़िंदगी भर याद रह जाते हैं। ऑफिस में हर कोई चाहता है कि माहौल अच्छा हो, लेकिन जब कोई बड़ा अफसर खुद को राजा समझने लगे और दूसरों पर बेवजह इल्ज़ाम डालकर अपना पल्ला झाड़ ले, तो दिल में चुपचाप बदले की आग सुलगने लगती है। ऐसी ही एक सच्ची घटना पढ़कर मेरी भी हंसी छूट गई – और शायद आपको भी मज़ा आएगा।
बॉस की चालाकी और कर्मचारियों की चुप्पी
आपने भी सुना होगा – "जैसा करोगे, वैसा भरोगे"। हमारे कहानी के हीरो (या कहें, पीड़ित) एक साधारण कर्मचारी थे, जिनका बॉस अपने आपको कंपनी का सबसे बड़ा खिलाड़ी समझता था। अगर ऑफिस में कोई गड़बड़ हो जाए, तो साहब झट से किसी और के सिर ठीकरा फोड़ देते। एक बार तो उन्होंने अपने ही अधीनस्थ को सीईओ के सामने इतना नीचा दिखा दिया कि उसकी इमेज ही खराब हो गई। हालत यह थी कि बॉस की पर्सनल असिस्टेंट भी रो पड़ी – सोचिए, कितना भारी अन्याय रहा होगा!
पर कहते हैं ना, वक्त का पहिया घूमता है। सालों बाद वही बॉस रिटायर होने वाले थे। अब कहानी में असली ट्विस्ट आया…
रिटायरमेंट पार्टी – बदले की मीठी शुरुआत
बॉस की विदाई पार्टी का जिम्मा उसी कर्मचारी को मिला, जिसे बरसों पहले बेइज्जत किया गया था। अब ये तो सोने पे सुहागा! पता चला कि साहब ने अपनी जवानी के दिनों में एक नामी विदेशी यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की थी, जहां नए छात्रों की अजीब सी स्टडी के तहत उन्हें लगभग नग्न अवस्था में फोटो खिंचवानी पड़ती थी (भई, पश्चिमी देशों के अपने ही चोंचले हैं!)।
इसी किस्से को पकड़कर, हमारे कर्मचारी ने ऑफिस के ग्राफिक्स एक्सपर्ट से एक मजेदार पोस्टर बनवाया – जिसमें बॉस का चेहरा एक बिकिनी पहने व्यक्ति की बॉडी पर लगा दिया गया, वो भी बीच पर मस्त पोज़ में! पूरा पोस्टर इतना झक्कास बना कि देखने वाले अपनी हंसी रोक न पाए। पार्टी के दिन सबके सामने पोस्टर पेश करते हुए कहा गया, "साहब, आपके कॉलेज के दिनों की फोटो मिल गई!" बस, फिर क्या था – पूरा कैफेटेरिया ठहाकों से गूंज उठा। बॉस का चेहरा देखने लायक था – शर्म, गुस्सा और हैरानी सब मिलाकर!
ऑफिस की छोटी-छोटी बदले की कहानियाँ
पश्चिमी देशों में तो ऐसी छोटी-छोटी बदले की कहानियाँ खूब चलती हैं, पर हमारे यहां भी ऑफिस में "गुडबाय" पार्टी कभी-कभी "गुड रिडेंस" पार्टी बन जाती है। एक कमेंट करने वाले ने लिखा था – "हमारे ऑफिस में भी एक चिढ़चिढ़े मैनेजर के जाने की खुशी में कर्मचारियों ने उसके लिए बॉडी कंडोम गिफ्ट किया, और सबने कहा – 'तुम सबसे बड़े कांटे हो, तो ये तुम्हारे लिए!'"
दूसरे ने बताया – "कभी-कभी तो रिटायर होने वाले को पार्टी में बुलाते ही नहीं! केक, पार्टी पॉपर्स, सब उनके जाने के बाद ही निकलते हैं। असली जश्न उसी वक्त शुरू होता है।" सोचिए, कैसा लगेगा जब आपकी विदाई पार्टी में ही आपको ही न्योता न मिले?
एक और ने अपनी मां के ऑफिस की कहानी साझा की – "विदाई पार्टी में सबने बेसिक कपकेक्स रखे, लेकिन जैसे ही रिटायर हो रही थीं, वो निकल गईं, सबने असली केक और पटाखे निकाले। असली जश्न तो उनके जाने के बाद हुआ!"
कर्मा का खेल और ऑफिस पॉलिटिक्स
इन सब किस्सों में एक बात साफ दिखती है – कर्मा का खेल कभी फौरन दिखता है, कभी देर से, लेकिन बचना मुश्किल है। कोई अपने पद का गलत इस्तेमाल करके दूसरों का करियर खराब करे, तो आख़िरकार उसके हिस्से में भी शर्मिंदगी और अकेलापन ही आता है।
किसी ने कमेंट में बिल्कुल सही कहा – "कर्मा कोई चुड़ैल नहीं… वो आईना है। जैसा दोगे, वैसा पाओगे।" ऑफिस की पॉलिटिक्स में अगर आप दूसरों को नीचा दिखाकर आगे बढ़ते हैं, तो एक दिन वही लोग आपकी विदाई में केक के बहाने ठहाके लगाएंगे या फिर पार्टी में ही न बुलाकर 'अंतिम विदाई' दे देंगे।
थोड़ी हंसी, थोड़ा सबक
इन कहानियों को पढ़कर एक बात तो पक्की है – ऑफिस में असली 'जयकारा' उन्हीं का होता है, जो लोगों के दिल में जगह बनाते हैं, ना कि डर से। विदाई पार्टी में अगर लोग सचमुच आपको मिस करेंगे, तो वो खुशी-खुशी आपके लिए केक काटेंगे, नहीं तो पोस्टर पर आपकी फोटो चिपकाकर हंसी उड़ाएंगे।
वैसे, हमारे देश में भी चाय-पान की दुकान पर, दफ्तर के गलियारों में, ऐसे किस्से खूब सुनने को मिलते हैं – "अरे, फलाने साहब चले गए? चलो मिठाई मंगाओ, असली पार्टी अब शुरू!"
क्या आपके ऑफिस में भी कभी ऐसी विदाई या बदले की कोई कहानी घटी है? कमेंट में जरूर बताएं – क्योंकि ऑफिस की राजनीति और हंसी-मज़ाक, दोनों ही कभी खत्म नहीं होते!
मूल रेडिट पोस्ट: I Waited Years For My Chance